Ritu Agrawal

Inspirational

4.5  

Ritu Agrawal

Inspirational

परिवार

परिवार

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शाम का समय था।काले घने बादलों के कारण अंधेरा थोड़ा ज्यादा गहरा लग रहा था।आकाश घने काले बादलों से ढकता जा रहा था।ऐसा लग रहा था कि अभी बहुत तेज बरसात हो जाएगी।


रेलगाड़ियों के आने- जाने से,इस छोटे से कस्बे के छोटे से रेलवे स्टेशन की नीरवता में खलल पड़ता था।ऐसे में बीस वर्षीय नवयुवक,मोहन अपने कंधे पर छोटा सा बैग टाँगे, रेलवे स्टेशन पर बहुत ही विचलित मन से चहलकदमी कर रहा था।इस समय उसका मन बहुत परेशान था।वह अपने इस कस्बे से भाग जाना चाहता था।वह अपनी सारी परेशानियों और तंगहाल जिंदगी से कहीं दूर चला जाना चाहता था।

मोहन के घर में जिम्मेदारियाँ ही जिम्मेदारियाँ थीं।पिता का देहांत बहुत पहले हो चुका था। माँ ने बड़ी मुश्किल से मेहनत - मजदूरी करके चारों बच्चों को, बहुत गरीबी में पाला। जैसे-तैसे मोहन के बड़े भाई की एक फैक्ट्री में नौकरी लगी।फिर माँ ने भी बीमारी में बिस्तर पकड़ लिया।अब वह पूरा समय खाँसती रहती है।


मोहन भी मेहनत मजदूरी करने लगा। उससे छोटी दो बहनें थीं।कभी - कभी मोहन के विद्रोही मन को,अपने माता पिता पर क्रोध आता कि इतनी गरीबी में भी उन्होंने चार-चार बच्चे पैदा किए।जब बच्चों को अच्छी परवरिश नहीं दे सकते थे तो क्यों उन्हें इस दुनिया में लेकर आए? पर मन में ही कसमसाकर रह जाता।


पिछले महीने मोहन के बड़े भाई के दोनों हाथ, फैक्ट्री में काम करते समय,एक मशीन में आकर कट गए और वह अपाहिज हो गया।तब से पूरे परिवार का भार, मोहन के कंधों पर आ पड़ा।मोहन अपनी जिम्मेदारियाँ दिल से निभाने की कोशिश करता रहा पर अब उसकी हिम्मत छूटने लगी थी।अब उसे ये जिम्मेदारियाँ बोझ लगने लगी थीं। कभी-कभी उसे अपनी जिंदगी बर्बाद होती हुई लगती थी। 

कभी-कभी उसके मन में,आत्महत्या का विचार आता लेकिन फिर अपने इस कायरतापूर्ण विचार पर खुद ही शर्मिंदा हो जाता। इसी सब उधेड़-बुन में, आज सुबह काम पर निकलने से पहले ही उसने फैसला कर लिया था कि वह ये शहर छोड़कर दिल्ली चला जाएगा और वहाँ जाकर कोई रोजगार करेगा।उसकी भी तो अपनी कोई जिंदगी है। उसे भी तो चैन से सुख पूर्वक अपने लिए जीने का अधिकार है। वह कब तक अपने कर्तव्य पूरे करता रहेगा ?


यही सब सोचकर वह रेलवे स्टेशन पर आ गया था। पर ज्यों- ज्यों रेलगाड़ी के आने का समय नजदीक आ रहा था, मोहन के दिल में विचारों की आँधी और तेजी से तूफ़ान के रूप में चलती जा रही थी।यकायक एक क्षण उसके मन में विचार कौंधा कि यदि पिता की मृत्यु के बाद,अपनी जिम्मेदारियों से परेशान होकर ,बड़ा भाई अपने कर्तव्य नहीं निभाता और उन सबको ऐसे ही मँझधार में छोड़कर कहीं चला जाता तो परिवार क्या करता?


परिवार तो होता ही इसलिए है कि एक-दूसरे को संबल देकर,हर कठिन परिस्थिति का मुकाबला साथ मिलकर कर सके।यह उसकी परीक्षा का समय है।वह कठिन परिश्रम करेगा और अपनी परिस्थितियों से लड़कर जीवन में सफलता पाएगा न कि उनसे भागेगा।

अचानक आसमान में छाए बादल छँटने लगे और आसमान साफ दिखने लगा।मोहन के मन में छाए हुए असमंजस के बादल भी अब छँट गए थे ,उसे भी अपनी मंजिल साफ दिख रही थी।


वो मंज़िल दिल्ली नहीं, उसका अपना परिवार था।मोहन आसमान को ताककर, दोनों हाथ जोड़कर, सद्बुद्धि देने के लिए ईश्वर को,धन्यवाद देता हुआ,तेजी से अपने घर की ओर चल पड़ा। जहाँ उसका परिवार बेसब्री से उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।


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