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Bhawna Kukreti

Abstract


4.5  

Bhawna Kukreti

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लाल बिंदी

लाल बिंदी

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सुबह के करीब 8 बज रहे थे, घनी बस्ती के ,8×8 के उस छोटे से सीले कमरे के अंदर , दो औरतें और दो बच्चे थे।


"लो माथे पर इसे चिपका लो" जायरा ने अपनी बचपन की सहेली नाज़नीन के माथे पर लाल बिंदी को लगाते हुए कहा। " क्या करती हो?!" ,कह कर नाज़नीन ने फौरन माथे से बिंदी हटा दी। "तुम नाज़नीन नहीं, अब लक्ष्मी हो समझीं, चुपचाप लगा लो।" मगर नाज़नीन ने मुँह फेर लिया। जायरा ने लहजे में सख्ती लाते हुए कहा।


"आयी किसलिए फिर यहां ? वहीं पड़ीं रहतीं भूखों। कैसे-कैसे तो तुमको वहां से यहां लाये और ..."


नाज़नीन और जायरा, भारत-बंगलादेश बॉर्डर पर बसे गांव से थीं। आधा गाँव नदी के उस पार बांग्लादेश और आधा इस पार भारत मे था। हर साल बाढ़ की वजह से जायरा का घर , खेती सब तबाह बर्बाद हो जाता था तब नाज़नीन के घर वाले उनके घर को बनाने , खेती किसानी करने में मदद किया करते थे। मगर फिर एक दिन जायरा के अब्बा ने ठान लिया कि वे दिल्ली आ बसेंगे। पिछले 12 साल से वो इस शहर में थी यहीं के बाशिंदे से उसका निकाह भी हो गया।


" ये कुफ्र है.." नाज़नीन और कुछ कहती इस से पहले जायरा ने उसके दो नन्हे बच्चों की ओर उंगली से इशारा किया " या तो इन दोनों को पाल लो या ..." और उसके माथे पर जबरदस्ती बिंदी लगा दी।


मन ही मन तौबा करती नाज़नीन के ठीक सामने उखड़े फर्श पर उसके दोनो बच्चे, झूठ मूठ बिस्किट को खाली कटोरी में डुबा-डुबा के खाने का खेल कर रहे थे । "खाबो ?" मां को अपनी ओर देखते नन्हे फ़िरोज़ ने अपनी बंद मुट्ठी उसकी ओर बढ़ा कर कहा। उन बच्चों की माँ ने 'ना' में सर हिलाया "न ,तुम खाओ" और भर आयी आंखों को पोछ कर उस बड़ी सी लाल बिंदी को छूआ।


कुछ ही पल में जायरा, कमरे के बाहर बैठे उसके भाई वसीम के

हाथ 20 रुपये रख कर , बच्चों को कुछ खाने का लाने और ख्याल रखने को कह नाज़नीन के साथ इलाके की सबसे पॉश कॉलोनी की तरफ निकल गयी।


"नमस्ते दीदी" जायरा ने शहद सी आवाज में बड़ी कोठी की मिसेज तिवारी से कहा। "अब आ रही हो गंगा, जब सारा काम मैने कर लिया!", मिसेज तिवारी ने तंज किया।जायरा ने तुरंत नाज़नीन की ओर इशारा कर कहा " दीदी आपका ही ध्यान रहता है मुझे, इसलिए आज इसे लेकर आई।"


5 मिनट के अंदर जायरा उर्फ गंगा ने दीदी को अपने 3-4 महीने के लिए कोलकाता जाने और नाज़नीन उर्फ "लक्ष्मी चोकरोवर्ती " की दुख भरी दास्तान सुना दी। ये भी बता दिया कि लक्ष्मी को हिंदी कम आती है पर समझ लेती है और उसकी जगह पर अब लक्ष्मी काम किया करेगी।दीदी ने तीखी नजरों से लक्ष्मी की ओर देखा। सूख कर कांटा हुई सांवली लक्ष्मी पर गंगा की "सताई औरत " की कहानी पूरी फिट बैठ रही थी जिसमे लक्ष्मी और उसका शराबी पति था जो आए दिन मार पीट करता था।"ये देखो दीदी आपको भरोसा नही होता होगा" कहते हुए उसने लक्ष्मी की बांह में आधा भरा जख्म दिखाया।


हालांकि जायरा जानती थी कि ऐसा कुछ भी नही था । ये जख्म नाज़नीन को रात में छुपते छिपाते बांग्लादेश से हिंदुस्तान आने के दौरान नदी पार करते समय लगा था , उस रात साथ की टोली में कुछ और लोग ,मवेशी वग़ैरह भी थे उन्ही में से किसी की दरांती का मुंह खुला रह गया था। नाज़नीन और बच्चों पर जान छिड़कने वाले आसिफ, उन तीनों को भुखमरी और गाँव के अमीर औरतखोर लोगों से बचा कर किसी तरह इधर निकाल लाये थे ।मगर जब जख्म के लिए डिस्पेंसरी में दवा लेने गए तो वापस लौटे ही नहीं। उस टोली में जायरा का भाई वसीम भी साथ था सो उसी के साथ ट्रेन में धक्के खाते नाज़नीन और बच्चे यहा तक पहुंचे।उनके पहुंचते ही जायरा, नाज़नीन के लिए ढंग के काम की तलाश में जुट गई थी।


आज इसी जख्म को देख दीदी की तीखी आंखों में नरमी उत्तर आयी थी ।"ये भी अच्छा है कि तुम बामिन हो, वैसे सच कहूँ तो मुझे जात पात से कोई एतराज नहीं बस अम्मा जरा पुराने जमाने की हैं और बहुत अच्छा किया जो अपने राक्षस पति को छोड़ बहन के पास चली आयी, चलो फिर ..अब शाम से तुम ही आना ,जितना इसको देती हूँ वही दूंगी और हां अपना आधार कार्ड भी लेती आना।" ,"ठीक है दीदी " कह कर दोनो चली आयीं।


दोपहर खाना खाते समय नाज़नीन बोली " तुम साफ झूठ कैसे बोल गई?! मेरी तो जान हलक में थी,और आधार कार्ड ये क्या है?"," सब सीख जाओगी" , बच्चों की ओर देखते हुए जायरा ने कहा " अब यही सच है ,अब जीना यहीं मरना भी यहीं ..लक्ष्मी !" नाज़नीन सामने बैठी सुन रही थी ,"जानती हो क़ानूनन तुम्हारा यहां होना ही गुनाह है..पर" जायरा ने अपना खाना खत्म कर उठते हुए कहा "चलो जल्दी करो बाबा से तुम्हारा आधार कार्ड बनवा लेते हैं।" नाज़नीन ने भी जल्दी से मुंह मे आखिरी निवाला डाला, दो घूंट पानी से हलक तर किया और उठ गई।


बाबा यानी आस-पास की कई झुग्गी बस्ती का मसीहा ।वो कौन है ? कब से यह काम कर रहा? ज्यादातर को नहीं पता था मगर हर बांग्लादेशी प्रवासी को उसका पता ठिकाना पता चल ही जाता था। 500 रुपये में वह हर काम कर देता था।जो एकमुश्त न दे पाए उनसे किश्तों में लेता। बाबा ने नाज़नीन को बहुत गौर से देखा " तुमि बांग्लादेशी न.. ?! " नाज़नीन को जैसे सांप सूंघ गया। जायरा हंसते हुए बोली" हां बाबा जैसे तुम ,चलो इसका आधार बना दो।" ," नाम ? ",""लक्ष्मी चोकरोवर्ती" दो दिनों से नाज़नीन इस नाम को रटे जा रही थी। बाबा के पूछते ही उसके मुंह से तेजी से निकला ।"धुतत्त ..चोक्रोवोर्ति ...ऐसे बोलै जाता है, इसको समझा देना अच्छे से " बाबा ने मीठी झिड़की देते हुए जायरा को कहा , नाज़नीन के चेहरे पर बड़े दिनों बाद एक हल्की सी मुस्कान आ गयी। "हिंदुस्तान इतना खतरनाक भी नहीं है। सीधे मानुस हैं ।" ,बाबा ने टोकते हुए कहा "इधर लोग हिंदुस्तान नहीं इंडिया या भारत कहते है, दुबारा मत बोलना नही तो पकड़ा जाओगी, कम बोलो बस्स।"


बाबा ने झट पट उसकी फोटो खींची और आधे घंटे में उसका आधार कार्ड तैयार था । "इसको ऐसे ही दिखा देना दूर से फिलहाल ,दे मत देना , सी ए ए की हवा है आजकल और घुसपैठिये बर्दाश्त नही अब , "बाबा ने जायरा की ओर देखते हुए कहा " समय है, अभी भी वापस लौट जाओ नहीं तो ख़ुद जिम्मेदार होगी बाकी रुकोगी तो ...कुछ दिन में असल बना दूंगा" बाबा ने समझाते हुए नाज़नीन को कहा।


नाज़नीन के कानों में बाबा की बातें घूम रहीं थीं "..वापस लौट जाओ।" , पर अब उसके पास कोई चारा न था, आसिफ जिंदा भी है या नही इसका पता नहीं ,पास में रुपया नहीं ।शाम को नाज़नीन ने मुह धोया,बाल बनाये , बच्चों को एक एक रस्क और पानी का गिलास थमाया ,अल्लाह को शुक्र अदा किया और तेजी से अपने नए नाम के साथ , काम की ओर चल पड़ी।


कोठी पर दीदी ने आधार कार्ड को पूछा ही नहीं।कहीं जाने की तैयारी में थीं। उसने धीमे से कहा,


" बउदी ,आधार कार्ड..!"

"तुम्हारे पास है न ?! काफी है ।जब वेरिफिकेशन आएगा तब लेती आना ।सुनो!बर्तन अच्छे से करना और रैक पर पोछ कर लगा जाना, और हां ! हो सके तो अम्मा को आंगन में टहला देना "


लक्ष्मी ने वो कार्ड अपने ब्लॉउज़ मे वापस रख लिया ।वो निश्चिंत हो चुकी थी की अब आधार कार्ड का झंझट खत्म।और वह किचेन की ओर बढ़ने लगी। मगर ,"लक्ष्मी.... ?! एक मिनट ठहरो तो ?! " दीदी ने पीछे से आवाज लगाई। ये क्या दीदी वापस अंदर आ रही हैं क्या?! कहीं नजदीक से देखना तो नहीं चाह रही?! बाबा कुछ सी ए ए का कह रहे थे। हिन्दुस्तान का नया कानून है कुछ । नाज़नीन का दिमाग़ सुन्न हो गया ।


उसने मन ही मन दुआ पढ़ते हुए पलट कर देखा। दीदी ने अपने पर्स से एक पैकेट सा कुछ निकाला, "माना तुम्हारा पति तुम्हारे साथ मार पीट करता है पर हो तो तुम सुहागन ही न ,"कहते कहते दीदी ने उस पैकेट से एक बड़ी सी लाल बिंदी निकाल कर उसके माथे पर सजा दी। उसे पकड़ कर दीवार पर लगे आदम कद शीशे की ओर मोड़ा और कहा,


"कितनी फबती है तुम पर लाल बिंदी, आइंदा बिना बिंदी के न निकलना घर से समझीं। और हां सुनो ईमानदारी से काम करना ,मेरे लिए वो ज्यादा मायने रखता है। बाकी आज से तुम परिवार का हिस्सा हो। और हां कल सुबहअपने बच्चों का आधार भी लेती आना ,सरकारी स्कूल में भर्ती करवा दूंगी।"


यह कह कर मुस्कराते हुए दीदी ने आदमकद शीशे के बगल में बने मंदिर को प्रणाम किया। झिझकते हुए लक्ष्मी ने भी वैसा ही किया। दीदी ने उसे' झिझकते हुए' ,कनखियों से देखा ,मुस्करायीं और उसके हाथ पकड़ कर बोलीं " एक बात कहूँ लक्ष्मी ,तुम गैर हिन्दू भी होती तो मुझे कोई दिक्कत नही होती,सब अपने हैं। "लक्ष्मी सर झुकाये सुन रही थी ,"यहां ज्यादातर काम वालियां हिन्दू नही हैं ,सिर्फ नाम सीता गीता हैं, सब तो नहीं... पर ज्यादातर घुसपैठिया हैं, तुम तो नहीं न?! .....न हो तो अच्छा है वर्ना ख़ुद सरकार इलाज कर देगी "कह कर दीदी ने फिर तीखी नजरों से उसे देखा।"... चलो मुझे देर हो गयी।" कहते हुए उसके कंधे को प्यार से दबा कर तेजी से बाहर चली गयीं।


उस दिन काम से लौटते हुए लक्ष्मी , सीधे बाबा के पास आयी, उसे जल्द से जल्द दो और नए नाम से आधार कार्ड बनवाने थे, " कन्हैया और रानी "।मगर आज बाबा का असली चेहरा नजर आया ,वो एक नंबर का घटिया इंसान निकला, एक मजबूर औरत से बड़ी कीमत लेनी चाही।


उस रात घर लौटते वक्त उसके मन मे औरतों का शोर चल रहा था।एक तरफ सिर्फ औरत बोल रही थी "काश मैं औरत न होती, मां न होती, उस दिन अपनापन दिखाने वाला बाबा कैसा ...छी। अल्लाह उसे दोजख में जलाए। " और दूसरी तरफ उसके अंदर की नाज़नीन और लक्ष्मी सवाल-जवाब में उलझ रही थी, " क्या वो वाकई मुझे सरकार को सौंप देंगी? लेकिन जब कागज बन जायेगा तो कैसे ? क्या मैने गलत किया ? क्या मुझे, मेरे बच्चों को जीने का अधिकार नहीं? क्या मुझे वापस लौट जाना चाहिए था? नही ,इतना सब जो गया..अब हिन्दुस्तान ही हमारा देश , कागज हो जाएंगे तो हम भी हिंदुस्तानी हो जाएंगे। फिर कोई डर नहीं। "


देखते देखते 3 महीने बीत गये।लक्ष्मी के सारे कागज तैयार हो चुके थे ,बच्चे भी सरकारी स्कूल में थे। बाबा की करतूत जान कर जायरा ने लड़ झगड़ कर उसकी बच्चों का आधार कार्ड, और सबका मतदाता पहचान पत्र तैयार करवा कर अपने भाई के साथ शादी करा दी थी। अब वह और उसके बच्चे हिंदुस्तान के नागरिक थे।


आज फिर उसी शहर में,10x8 के कमरे में दो ओरतें थीं।नये शीशे के सामने खड़ी बाल संवारती हुई लक्ष्मी ने सामने पलंग पर बैठी औरत से कहा "ये लो यास्मीन " आज लक्ष्मी ने जायरा की तरह लाल बिंदियों का डिब्बा यास्मीन की ओर बढ़ाया था। "ये क्या है नाज़...?! ","अं..अं..अब लक्ष्मी ..याद रहे , मुझे यहां सब लक्ष्मी कहते है, ख़ैर यहां काम करना है तो तुम बिंदी को मुहर की तरह लगाने की आदत डाल लो, इस से चेहरा खूबसूरत लगता है ।" लक्ष्मी ने अपने माथे की बिंदी को भँवो के बीच मे करते हुए कहा और तेजी से तिवारी दीदी के घर को चल दी।


आज गंगा, लक्ष्मी,तिवारी दीदी औऱ कॉलोनी की महिला मंडली अपनी-अपनी काम वालियों के साथ सी ए ए के खिलाफ एक धरने में शामिल होने जा रहीं थी।









*अप्रकाशित व अप्रसारित कहानी।


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