Win cash rewards worth Rs.45,000. Participate in "A Writing Contest with a TWIST".
Win cash rewards worth Rs.45,000. Participate in "A Writing Contest with a TWIST".

Pawan Gupta

Horror Tragedy Thriller


4.7  

Pawan Gupta

Horror Tragedy Thriller


कर्ज़दार 2

कर्ज़दार 2

7 mins 682 7 mins 682

आज भी याद है, पूजा के पापा का १० मई को निधन हो गया था, और आज ठीक 6 महीने बाद पूजा की माँ भी चल बसी !

वो १२ नवंबर था, जिस रात पूजा मुझसे मिलने आई थी, उस रात उसकी आखों के आंसुओ की बड़ी - बड़ी बुँदे मुझे और भी असहाय बना रही थी !

वही शक्ल वही मासूमियत जो की पहली बार में मुझे नज़र आई थी ! 

मैं रूम में अकेला सोया हुआ था, वो रात १२ नवंबर २००१ था !

वो मेरे सिरहाने काफी देर अपनी आखों में आंसू लिए बैठी रही, कोई भी बात नहीं की !

मैंने कई बार उससे पूछने की कोशिश की, कि पूजा बात क्या है, तुम क्यों इस कदर उदास हो, पूजा सायद तुम्हे नहीं पता पर तुम्हारी आखों में ये आंसू मुझसे बर्दाश नहीं होते है !

प्लीज पूजा इन आसुंओ का कारण बताओ, कुछ तो बोलो, देखो मुझे बहुत दर्द हो रहा है तुम्हें इस क़दर दुखी देख कर !

पूजा ने अपनी चुप्पी तोड़ी ( उसने अपने वही प्यारे हाथो को मेरे होठो पर रखते हुए )

पूजा - पवन तुमने बिना स्वार्थ इतने दिन माँ पापा के साथ रहे, मैं भी बहुत खुश होती थी, जब भी तुम पापा मम्मी के साथ खुश होते थे, मैं तुम्हारे लिए कुछ कर तो नहीं सकती थी, पर माँ के साथ - साथ तुम्हारे लिए खाना बनाने में मदद करती थी, माँ मेरी आवाज तो नहीं सुन सकती थी पर शायद माँ को एहसास होता की तुम्हारे लिए मैं क्या बनाना चाहती हू!

माँ उसी तरह खाना बनाती जैसा मैं चाहती थी, तुम्हारा वो माँ की तारीफे करना, मैं सुनकर शर्मा जाती थी, क्योकि आखिर कार वो खाना मैंने स्पेशली तुम्हारे लिए ही बनाया होता था !

इसी तरह तुम जब तक खाते मैं तुम्हे एक टक देखती रहती थी !

याद है तुम्हे एक रात तुम्हारे लिए माँ ने आलू के पराठे बनाये थे, और तुम उन पराठों को खाकर मुझे ढूंढने लगे थे, फिर बोले जिसने भी ये आलू के पराठे बनाये है, जी करता है, कि उसके हाथ चुम लू !

जब तुम ये बोल रहे थे मैं तुम्हारे करीब ही थी, मैं अपनी हाथो को देखते हुए रो पड़ी थी !

मैं मरने के बाद भी इन रिश्तो में जुडी रही, कभी मेरे मरने का मुझे एहसास नहीं हुआ !

6 महीने पहले जब पापा गुजरे तो, पता नहीं क्यू पर मेरी आखों में आंसू नहीं थे, शायद तुमने पापा की जगह लेली थी !

मैं एक टक आखों को खोले बस तुम्हे ही देख रही थी, कि मई के उस गर्म दिनों में तुम कैसे पापा के देहावसान में कार्यरत थे !

वो तुम्हारे चेहरे पर आती पसीने की बुँदे जो सूरज की किरणों से टकराकर किसी बहुमूल्य मोती से कम न लगती थी, शायद तुम्हे पता ना हो पर मैं हर कदम पर छाओ देने की कोशिश करती रही पर कभी कामयाब ना हो सकी !

 मैंने सोचा उस मोती के समान बूंदो को अपने आँचल में समेट लू पर वो भी न कर सकी !

मेरा अस्तित्वा ही कहा था ......

रात को मेरी माँ को एक बेटे की तरह सहारा देना, ऐसा लगता था मानो मुझे भी तुमने ही संभल रखा है !

तुम्हारे प्यार और समझदारी से हम बहुत जल्द पापा को भूल गए, और फिर से हमारी जिंदगी नार्मल हो गई !

 फिर से चेहरों पर हंसी लौट आई, पर अब फिर से १२ नवंबर को माँ भी चली गई !

 मैं माँ के सहारे तुमसे जुडी थी, तुम्हे हस्ता देख हस्ती, तुम्हे खाता देख खुश होती, तुम्हारे साथ बैठ कर टीवी देखती ! वो तुम्हारी बच्चो वाली खिलखिलाती हसी जो मुझे जून की गर्मी में दिसंबर की सर्दियों की शांति देता था ! 

 आज वो कड़ी भी टूट गई जो माँ के सहारे तुमसे जुडी थी !

अब माँ भी नहीं रही, अब तुम भी अकेले हो गए, तुमने मेरे लिए अपनी जिंदगी का एक लम्बा हिस्सा बर्बाद कर दिया है, ( उसकी आँखे डबडबा रही थी ) वो अपने हाथो को मेरे बालो पर फिरा रही थी, मैं बेसूद सा हुआ मैं उसके दर्द में सिमटता जा रहा था !

उसने कहा मैं तो तुम्हारे मोह में अब तक आजाद नहीं हो पाई, मैं स्वार्थी थी, कि वो पल पल भर की खुशियों को छोड़ नहीं पाई, और आज तुम्हे अकेले होने का दुःख भी इन्ही आँखों से देख रही हू !

ये कहते - कहते पूजा फफक फफक कर रो पड़ी !

मेरी आवाज घुट गई थी, जैसे की मैं बेहोश पड़ा था, और मेरे आँखों के दोनों कोरो से अश्रु धारा निकल रही थी !

ये दर्द प्यार का अच्छा होता है, या बुरा कोई समझ नहीं पाया है, आँखों का क्या है, आँखों का तो ऐसा लगता है कि इनको भींगने का कोई भी बहाना चाहिए !

 पूजा फिर अपने डबडबाये हुए आँखों को संभालते हुए बोली !

 अब तक तो जो हुआ ठीक हुआ, पर अब तुम अकेले हो गए हो, और उसकी दोषी भी मैं हू,  

प्यार में मैंने अपना स्वार्थ ही देखा है, मुझे माफ़ कर दो !

 मैंने पूजा की उन नरम - नरम हाथो को अपने हाथ में लिया, उसकी हथेलियां पूरी तरह आंसुओ से भींग चुकी थी !

 मैंने उसकी आंसुओ को पोछते हुए कहा -

ऐसा तुम क्यों सोचती हो पगली मैंने भी तुमसे प्यार किया है !

जब भी माँ खाना खिलाती तो उसमें तुम्हारी ही खुशबु होती, मुझे भी तुम्हारा शरारते करना, मुझे छिप छिप कर देखना, इन सबका एहसास मुझे हुआ करता था, जिस दिन मैंने तुम्हारे हाथ के बने आलू के पराठे खाये थे मैं पहचान गया था तुम्हारे हाथो का स्वाद इसलिए मैंने ये बात कही थी कि मैं तुम्हारे हाथो को चुम लू मुझे पता था की तुम मेरे बगल में हो, मेरे भी आँखों में आंसू उमड़ पड़े थे उस रात पर मैं तुम्हे दुखी नहीं देखना चाहता था इसलिए हस्ता रहा !

मुझे पता था तुम मुझे देख रही हो !

क्या मैं स्वार्थी नहीं था कि उस प्यार और निच्छल भाव रूपी एहसास को जीने के लिए हमेशा तुम्हारी फॅमिली के करीब रहा !

 पूजा यही हमारी नियति थी, और है !

पूजा - नहीं पवन ! ये हमारी नियति नहीं है, और अगर ये नियति है तो मैं इसे बदलूंगी !

" पूजा की आँखों में गुस्सा उतर आया था "

मैंने कहा नहीं पूजा हम कुछ नहीं कर सकते हैं,  

पूजा ने फिर से अपनी आँखों को पोछते हुए बोली " पवन तुम शादी कर लो मैं तुम्हे इस तरह अकेले नहीं देख सकती, प्लीज तुम मेरी बात मानो..

मैं ये सुन के सन्न रह गया मैंने ये कभी नहीं सोचा था ! पूजा के सिवा मेरा दिमाग कही गया ही नहीं, मुझसे ये हो पाना मुश्किल था, मैंने पूजा को समझाया की ये मुझसे नहीं हो पायेगा, और सिर्फ इस बात के एहसास से की पूजा मेरी जिंदगी में ना होकर कोई और होगी, मेरे आँखों से आँशु बह निकले !

मैं पूजा से माफ़ी मांगता रहा, रोता रहा, मेरे आँखों के सामने सब अँधेरा सा हो गया था !

 बस आवाज आती रही मैं वापस आउंगी......मैं वापस आउंगी ........मैंने सिर्फ अभी अपने माँ पापा का क़र्ज़ उतारा है, पर अब मैं तुम्हारी कर्ज़दार बन गई हू !

ये क़र्ज़ भी मैं उतरूंगी मैं वापस आउंगी .....मैं वापस आउंगी...!

आवाज मुझसे दूर जाती रही, और मैं नींद से बाहर आता रहा, जब मेरी नींद खुली तो पास कोई भी नहीं था !

बस भींगी पलकों का एहसास मेरी आत्मा को तर कर रहा था, मेरे सिरहाने का बिस्तर भिंगा हुआ था, मेरी आखे सुर्ख लाल डबडबाई सी थी !

मेरे अंदर एक तूफान सा उमड़ रहा था !

कहाँ जाऊ, क्या करू, कैसे मिलु पूजा से ...

क्या वो सच में छोड़ गई, पर वो तो कभी पास थी ही नहीं,

उसका एहसास ही था जो मेरे इर्द गिर्द सिमटा सा लगता था !

 पर अब वो एहसास भी ख़त्म हो जायेगा !

क्या पूजा मुझे सच में मुझे छोड़ गई, या ये सब मेरा वहम था, समझ नहीं पा रहा हू !

बस सीने में एक दर्द की लहार उमड़ रही है, और पूजा के नाम से थम रही है !

 शायद अब पूजा अपनी दुनिया में चली गई, मुझसे सारे मोह के धागो को तोड़ कर, आज शायद पूजा चली गई ...यही कह कह कर मैंने मन को शांत कर लिया पर दर्द ने एक अपनी जगह बना ली थी पूजा के रूप में !

जिंदगी कटने लगी पूजा के इस एहसास के साथ कि मैं वापस आऊँगी.....


Rate this content
Log in

More hindi story from Pawan Gupta

Similar hindi story from Horror