कफन का इंतजार मायके से ही क्यो
कफन का इंतजार मायके से ही क्यो
दामोदर जी के घर के बाहर लोगों का जमावड़ा आपस में काना फूसी कर रहे थे " पूरे बारह घंटे हो गए बहु की लाश आंगन में पड़े पड़े पर दमोदार जी अपनी जिद्द पर डटे हुए थे कि जब तक बहु के मायके से उसके कफन का कपड़ा नहीं आएगा तब तक यहां से बहु की अर्थी नहीं निकलेगी......"!!
दरअसल बीते शाम को अचानक हृदयघात की वजह से दामोदर जी की बहू का देहांत हो गया था। एक तो ऐसे मां का साथ छोड़कर जाना और ऊपर से दामोदर जी की ऐसी बातें सुनकर दामोदर जी की सोलह साल की पोती श्रुति को बहुत आक्रोश के साथ दुख भी हो रहा था।
काफी देर तक अपने दादाजी की ऐसी जिद्द और अपनी मां के पार्थिव शरीर को देखकर वो जोर जोर से रोने लगी और फिर उसने कहा " कब तक मेरी मां की पार्थिव काया यूं ही आंगन में पड़ी रहेगी.....?? आप लोग इंसान है भी या नहीं.....? जिस औरत ने अपना सारा जीवन आप लोगों के नाम कर दिया आज उसी की ऐसी दशा.....?? मैं पूछती हूं अगर मां के मायके से कफन नहीं आया तो क्या ये यूं ही बीच आंगन में पड़ी रहेगी......?? आखिर क्यों इसलिए कि ये एक औरत हैं......?? क्यों ऐसे नियम सिर्फ औरतों के लिए ही बनाएं जाते है.....?? आंखों से आंसू बहे जा रहे थे और श्रुति बोले जा रही थी।
फिर वो अपने पापा के पास जाती हैं और कहती " पापा आप तो कुछ बोलो दादाजी को क्यों वो अपनी जिद्द पर अरे हुए हैं जबकि उनको भी पता है मां के मायके से उनका कफन नहीं आने वाला.....?? कब तक मेरी मां इस तरह पड़ी रहेंगी....?? क्या उन्हें इतना भी सम्मान नहीं दे सकते जाते जाते.....?? रोती बिलखती श्रुति रात से अपनी मां की पड़ी बेजान शरीर को देखकर कहती है।
फूट फूट कर रोती बिलखती श्रुति को देखकर श्रुति की दादी श्यामा जी उसे अपनी बांहों में समेटना चाही पर श्रुति ने अपना हाथ आगे बढ़ा कर रोक दिया और फिर कहने लगी " दादी आप तो एक औरत हैं आप तो समझा सकती है सबको पर नहीं आपको भी समाज के ढकोसले को बढ़ावा देना है।" अरे मां के मायके से नहीं आया तो क्या हुआ " मैं लाकर देती हूं अपनी मां का कफन "........कहते कहते श्रुति जमीन पर निढाल होकर अपनी मां के बेजान परे शरीर के पास गिर जाती है और मां के सीने पर सिर रखकर रोने लगती है।
तभी श्रुति के पापा राघव जी उसके पास आकर नम आंखों से कहते है " बेटा ये दुनिया की रीत है जिसे हम नहीं बदल सकते।" इसे हर हाल में निभाना ही पड़ता है। उठ बच्चा अब शांत हो जा। देख कुछ देर और हम लोग इंतजार करते है तेरे मामा मामी का फिर देखते हैं.......!!
पर क्यों पापा इंतजार करना.....? क्या हम खरीद के नहीं दे सकते अपनी मां के लिए अंतिम कपड़ा.....? क्यों हर ऐसी चीजों के लिए मायके वालों की राह देखनी पड़ती है ? मां ने अपना सर्वस्व आप लोगों पर निछावर किया पर क्या एक अंतिम कपड़ा देने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ मायके वालों का है.....?? ऐसा भेदभाव क्यों किया जाता है एक औरत के साथ......? कहने के लिए तो ये मां का घर है पर क्या उन्हें एक अंतिम कपड़ा पाने का हक भी नहीं है ससुराल से.....??
ये कैसा नियम है जो सिर्फ औरतों पर ही लागू होती है वो भी उस स्त्री पर जो अपने लिए जीवन नहीं जीती बल्कि दूसरों के लिए सांसे लेती है। जब जीवन से मरण तक सारे कपड़े मायके से ही आते है तो फिर ससुराल क्यों....?? सारी उम्र ससुराल के नाम करके भी उन्हें क्या मिलता है ? जिसका हक इस घर पर सबसे ज्यादा होता है उसे तो जिंदगी भर दूसरे घर का समझ कर रखते है तभी तो ऐसे खोखले नियम बनाएं गए है।
यदि ऐसा ही है तो फिर पापा जब मेरी शादी होगी तब मुझे शादी के समय ही कफन के कपड़े भी साथ दे देना ताकि मुझे भी अंतिम समय में मां की तरह लाचार नहीं होना पड़े......!!
श्रुति ये क्या बकवास किए जा रही है। बच्ची है बच्चे की तरह रह.....अब तू सिखाएगी हमें रीत रिवाज...दामोदर जी श्रुति के दादी जी चिल्लाते हुए कहते है।
हां दादाजी मैं सिखाऊंगी क्योंकि मैं अपनी मां का ये अपमान मृता अवस्था में नहीं देख सकती........।। किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ता मेरी मां के जाने से पर मुझे फर्क पड़ता है क्योंकि मैंने उन्हें उस वक्त देखा है जब वो अपने मायके जाने के लिए तड़प उठती थी पर आप लोग उन्हें जाने नहीं देते थे। कोई न कोई बहाना बनाकर उन्हें इस घर की चारदीवारी में कैद कर रखा था और ना ही किसी मायके वालों को इस घर में आने की इजाजत थी।
आपने ही माना किया था ना दादाजी हमारे नाना नानी और मामा मामी को की गलती से भी इस घर में कदम नहीं रखने वरना अपनी बेटी को सदा सदा के लिए अपने साथ ले जाएं। यही कहा था ना दादाजी.......फिर अब किस मुंह से राह ताक रहे है.....?? नाना नानी अगर जिंदा होते तो उम्मीद भी होती कि कोई न कोई लेकर आता पर मामा मामी से तो कोई उम्मीद भी नहीं कर सकता क्योंकि आप लोग ही इसके जिम्मेदार है ......??
घर के अंदर ऐसी बातें सुनकर बाहर खड़े लोगों में काना फूसी और तेज हो जाती है। लोग तरह तरह की बातें करने लगते हैं। सभी दामोदर जी को ही दोषी करार देने लगते है। दामोदर जी को ऐसा नहीं करना चाहिए था अब किस मुंह से बहु के मायके वालों का इंतजार कर रहे है.....?? बेचारी को कभी मायके जाने नहीं दिया और अब जब लेने की बारी आई तो नियम कायदे की बात कर रहे हैं। धिक्कार है ऐसे लोगो पर जो बहु बेटियों में भेदभाव करते है...... भीड़ में खड़ा एक आदमी बोल रहा था।
तभी समाज के सबसे बुजुर्ग आदमी देवेन जी जो वही पड़ोस में रहते थे आंगन में आते है और दामोदर को कहते है " दामोदर तूने आज तक अपने बहु के साथ जो भी किया गलत किया पर अब तो वो इस दुनिया से जा चुकी है तो कम से कम अब तो अपने कर्म सुधार ले। बहु को सम्मान के साथ अंतिम विदाई दे ताकि उसे मुक्ति मिल जाएं। ऐसे भी तूने तो बहु के मायके खबर भी भेजवाया होगा अब तो इतनी जल्दी तो वो लोग आना भी चाहे तो नहीं आ सकते इसलिए जैसा श्रुति बिटिया कह रही है वैसा कर नहीं तो मैं लाकर देता हूं बहु के लिए कफन.......!!
भाईसाहब आप कह रहे हैं ये सब...... दामोदर जी देवेन जी से कहते है।
हां दामोदर मैं कह रहा हूं.....! अरे जिनके माता पिता नहीं होते तो भी तो उसका अंतिम संस्कार होता ही है ना और यहां तो हमारी बहु हैं जिसने अपनी सारी उम्र तुम सबके नाम कर दिया। मैं लाकर देता हूं तेरी बहू के लिए अंतिम कपड़ा......!!
देवेन जी का बड़ा दिल देखकर श्रुति उनके गले लग कर फूट फूट कर रोने लगती है।
अब जल्दी से अपनी मां को सुंदर से तैयार कर जैसी कोई दुल्हन हो और मैं उसके पिता होने का फर्ज निभा कर आता हूं बेटा.......श्रुति के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए देवेन जी कहते है।
फिर श्रुति अपनी मां का सोलह श्रृंगार करती है और फिर नम्र आंखों से उन्हें अंतिम विदाई देती हैं।
प्रिय पाठकों आखिर क्यों एक औरत के कफन का इंतजार उसके मायके वालों से किया है ? कब तक औरतों के साथ ऐसा भेदभाव किया जायेगा ? जिसने पूरी उम्र अपने पति , बच्चों और परिवार को समर्पित कर दिया हो उसे अंतिम घड़ी इसलिए इंतजार करना पड़ता है क्योंकि उसके मायके से कफन का कपड़ा मंगवाया जाता है। ये कैसा रीत है ?कब तक स्त्री पुरुष को दो तराजू में तौलते रहेंगे ? कब मिलेगी ऐसे खोखले आदर्श नियम से छुटकारा औरतों ?? सवाल कई हैं पर जवाब अभी भी बाकी हैं......!!
इस कहानी के माध्यम से आप लोगों के समक्ष सिर्फ अपने विचारों को रख रही हूं। मेरा मकसद किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं है। ये रचना पूरी तरह से मेरी लिखी हुई है।
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