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Tanha Shayar Hu Yash

Tragedy


4.7  

Tanha Shayar Hu Yash

Tragedy


कोरोना में लूट

कोरोना में लूट

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वो बहुत देर से मुझे देखे जा रहा था मैंने उसे भाप लिया था बस ये चाहता था की वो मुझे इस समय परेशान ना करे मैं पहले ही बहुत परेशान था। सारे देश में महामारी का ज़ोर चल रहा था। अमीरों को तो किसी चीज़ की कोई कमी न थी उनके पास तो इतना था की अगली पीढ़ी भी बैठकर खाये। असली समस्या तो हमारी थी जो रोज़ ही कमाते थे रोज़ ही खाते थे। ऊपर से जो रोज़ भी बड़ी मुश्किल से गुज़ारा करते थे उनका तो ना जाने क्या हाल होगा। मैंने उसकी तरफ ये ही सोचते हुए निचे निगाह करके देखा लगा बहुत गरीब सा रहा है पर ऐसे वक़्त में किसी का भरोसा कैसे किया जाये। ये सोच कर मैंने लकड़ी का तख्ता उठा कर कच्ची रोड से जंगल की तरफ मुँह किया और अपनी पोटली भी उठा कर एक तरफ में रख ली। 

दो ही मिनट हुए थे की वो मुझे जंगल में नज़र आने लगा मेरी और ही आता हुआ। मैं थोड़ा डर गया था। रात का वक़्त था ना इसलिए ! कोई नो दस का वक़्त रहा होगा ! हाँ , गहरी रात तो नहीं थी पर रात तो थी। आजकल आठ बजे के बाद ही बारह बजे जैसा समय हो जाता है। आदमी रोड पर कम ही दिखाई देता है और ना जाने किसको क्या बिमारी हो , किसी अनजान से मिलने का मतलब भी सीधी मौत ही है। ये खतरनाक वायरस छूने से भी फैलता है। 

वो आदमी थोड़ा और पास आया। मैंने ध्यान से देखा। आदमी तो नहीं था वो बच्चा लग रहा था कोई पन्दरह सत्रह साल की उम्र का होगा। आँखें सुर्ख लाल। ऐसी आँखें तो सिर्फ खुनी कातिल की होती है। कभी ये मुझसे मेरा सामान और रुपया पैसे तो नहीं छीन लेगा ? नहीं ऐसे तो नहीं कर पायेगा ये तो अकेला है पर हो सकता है इसके साथी भी आस पास हो और ये मोके का इंतज़ार कर रहा हो ? ये बस भी अभी तक क्यों नहीं आई। रोड की तरफ देखते हुए मैंने एक लम्बी सांस ली और देखा की एक बस आ रही है ये मेरी ही बस होगी मैंने सामान को समेटा और मैं ठीक से खड़ा भी नहीं हो पाया था की बस आई और चली गई। रोकने की बात तो दूर उसने हॉर्न भी मंदा नहीं किया। मै जैसे खड़ा हुवा वैसे ही बैठ गया। मैंने पीछे मुड़कर देखा तो लड़का गयाब था। 

अब तो मुझे यकीं हो चला था की शायद वो ज़रूर चोर उचका रहा होगा। उसे लगा होगा की अब यहाँ उसकी दाल नहीं गलने वाली। और शायद पकडे जाने के डर से भाग गया। अब रोड और जयदा सुनसान लगने लगी थी। खाने के ठेले वाला भी सामान पैक करके निकलने वाला था तो मैंने सोच की थोड़ा सफर के लिए खाना भी पैक करा लून जाने आगे रास्ता कैसे हो ? बस रुके या ना रुके ? और अगर रुक भी गई तो इस बात का क्या भरोसा है की खाना मिल ही जायेगा। मैं ठेले वाले से चार रोटी और सब्ज़ी भी पैक करा ली। करीब गयारह बज चुके थे पर कोई बस नहीं आई। अब तो जो दो चार आदमी थे वो भी अपने अपने रास्ते पैदल ही निकल चले। अब मेरी हिम्मत भी जवाब देने लगी थी ऊपर से दस कोस की यात्रा पैदल ही चलकर आया था गाँव से कच्ची पक्की रोड पर चल चककर थक भी गया था। थोड़ी दूर पर ही रोड पर एक खम्बे की लाइट से ही यहाँ बस स्टॉप पर थोड़ी रौशनी हो रही थी।  

मैंने ध्यान से देखा की कोई भागता मेरी ओर ही आ रहा था। मुझे समझते देर नहीं लगी ये वही लड़का था जो पहले रोड के उस ओर खड़ा था और फिर ये निचे जगल में से मेरी और चोर की नज़रों से देख रहा था। मुझे लगा की जंगल की तरफ तो ठीक नहीं होगा भागना वहा इसके साथी हो सकते है ? तो मैं रोड पर आगे भागता हूँ। मैंने अपना सामान कंधे पर टांगा और भागना शुरू कर दिया। लड़का मेरी और बड़ी ज़ोर से भाग रहा था पर मैं भी कम नहीं था। मैं भी उससे तेज़ नहीं तो कम से कम उसके बराबर नहीं तो उससे आगे तो भाग ही रहा था। थोड़ी दूर जाकर मेरी सांस उखाड़ने लगी। मैं हाफने लगा। अब वो लड़का मेरी ओर  और ज़ोर से भागने लगा। मुझे भी एक सुझाव आया की अगर मैं अपनी पॉकेट से पैसे निकाल कर फेक दूँ तो ये वंही रुक जाएगा। मैंने जल्दी से कुछ पैसे निकाले और पीछे फेकते हुए भागा। लड़का एक पल के लिए पैसो के पास रुका। और मेरी तरफ और ज़ोर से भागा। अब मेरी समझ आ गया ये मेरी जान और माल दोनों ही लेकर जायेगा। मैं थक गया था अब मुझसे भागा नहीं जा सकता था। लड़के के हाथ में एक चाकू था चाकू देखकर तो मेरी सांस चढ़ी की चढ़ी रह गई। उसके पास आते ही मैंने सामान की पोटली उसी की ओर फेक दी। और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। लड़का मेरी तरफ हफ्ते हुए बड़े ही गुस्से में देख रहा था। मुझे लगा इसे सारे पैसे दे देने चाहिए तभी ये जायेगा। वो मेरी तरफ चाकू कर रहा था। मैंने अपना पर्स भी फेक दिया और पीछे हट गया तभी दूर से बस आती दिखाई दी। मेरी जान में जान आई। लड़के ने जल्दी में पोटली उठाई और रोड की दूसरी और खुद गया , मुझे भी मुका मिल गया मैंने अपना पर्स उठा लिया और बस जैसे ही मेरे पास आकर रुकी। मैं भाग कर बस में जा चढ़ा। मेरे चढ़ते ही जैस ही बस चली , उस लड़के ने पोटली मेरी और फेक दी। पोटली बस के पायदान पर गिरी। मैंने भी गुस्से से उसकी और देखा और मुक्का बनाकर इशारा किया की मैं उसे देख लूंगा। 

बस ने अपनी रफ़्तार पकड़ ली और हवा से बाते करने लगी। मेरी भी सीट पर बैठते ही आँख लग गई। सुबह हुई सब नाश्ते के लिए उतरे मैंने भी पोटली खोली जिसमे चार रोटी और सब्ज़ी नहीं थी। बाकि मेरी सोने की चैन और मेरी नगदी में कोई कमी ना थी। मेरी आँखें भर आई। हे भगवन वो तो मुझे खाना खाता देखकर रोटी मांगने आया था ! वो तो सिर्फ भूखा था। वो रुपये और सोने की लूट नहीं बल्कि वो तो सिर्फ पेट की आग बुझाने के लिए रोटी लूट कर ले गया है।  


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