खौफ कजरी और प्रेम भाग 7
खौफ कजरी और प्रेम भाग 7
इस रचना के पिछले भाग में आपने पढ़ा के मयंक अपने मां-बाप को सारी बातें विस्तार से बता रहा है। क्या कहा उसके मां-बाप ने पढ़िए इस भाग में....
मयंक ने अपने मां बाप को सारी बातें विस्तार से बताना प्रारंभ कर दिया। कजरी नाश्ता तैयार करके टेबल पर रख चुकी थी। मयंक के मां तथा बापू मयंक की बातों को गौर से सुने जा रहे थे। नाश्ता सामने रखा हुआ था। मां और बापू ने आलू और पालक से बनी गरमा गरम पकौड़ी को खाने के लिए हाथ में उठा लिया। मयंक के द्वारा घटित घटनाओं के वर्णन में जैसे ही अछूत शब्द आया ...उन्होंने पकौड़ी प्लेट में वापस रख दी। उनके चेहरे गंभीर हो गए। वह मयंक को टोकते हुए बोले... क्या कजरी एक अछूत कन्या है ??
मयंक ने कहा... हां... बापू वह एक अछूत और किस्मत की मारी लाचार कन्या है। मैंने उसे सहारा देने के लिए ही उससे विवाह किया है।
तू कैसी बात कर रहा है। तू अपने होश मैं तो है?! हम सनातनी ब्राह्मण एक अछूत कन्या को इस घर की बहू बना लें। ...असंभव.... ऐसा हरगिज ना होगा..! ले जाओ इस नाश्ते को और डाल दो कुत्तों को। मंकू की मां.... इस मंकू ने तो हमारा धर्म भ्रष्ट कर दिया! क्या मुंह दिखाएंगे हम अपने घर वालों को ? हमारे पूर्वज भी स्वर्ग में बैठे ऐसी संतान के लिएहम पर हस रहे होंगे। मयंक ने कहा.. बापू छूत अछूत ...यह समाज के बनाए ताने बाने हैं। गरीब ,दरिद्र ,पतित, सभी की मदद करना,.. उन को राह दिखाना... हम सभी का कर्तव्य है! यदि हम अपने व्यवहार से ऐसा न कर सके तो कौन हमें फॉलो करेगा!! हमें अपने व्यवहार से लोगों के लिए मार्गदर्शक बनना चाहिए ,ना कि इन रूढ़िवादी विचारों को पकड़े रहना चाहिए।
मयंक के बापू पुराने विचारों के सनातनी ब्राह्मण थे। उन्होंने मयंक से इस प्रकार के व्यवहार की तो कल्पना भी न की थी। उन्होंने मयंक की एक भी दलील न मानी और स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि मयंक या तो इस लड़की को छोड़ो या यह घर।
पूरे घर में मायूसी छा गई। सुबह का बना नाश्ता.. यूं ही पड़ा रहा! न तो मां, बापू ने खाया और ना कजरी और मयंक ने!! अपने अपने विचारों को पकड़े घर में दो धड़े हो गए!! दीपावली की रौनक फीकी पड़ती नजर आ रही थी। बेचारी कजरी की जान अधर में लटकी थी। उसके भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ था!! वह सोचने लगी... अगर मयंक ने छोड़ दिया तो.. वह कहीं की न रहेगी। मां का सहारा भी अब जा चुका है कहां जाएगी इस दुख भरी दुनिया में...! डर कर उसने अपने सिर को मयंक के सीने पर रख दिया आंखों से टपकते आंसू मयंक के धड़कते सीने की आग को शांत करने का प्रयास कर रहे थे। चारों ओर सन्नाटा और खामोशी पसरी हुई थी।
मां बेचारी क्या करे...!! कुछ समझ ना पा रही थी। तभी मंकू के बापू ने कहा.. मंकू की मां... मंकू से कहो.. वह या तो कजरी को बाहर निकाले या खुद चला जाएइस घर से!!
मां का दिल कांप उठा। अगर मंकू ने कजरी को ना छोड़ा तो...! तो.... क्या वह हमें छोड़ कर चला जाएगा..! हमेशा हमेशा के लिए ! उसने कहा..... मंकू के बापू जरा धीरज से काम लो। तनिक ठंडे दिमाग से सोचो। कि इस संध्याकाल में बेचारी कजरी कहां जाएगी?? वह भी तो एक अनाथ बच्ची है?
अनाथ है तो अनाथालय जाए ना?! यह घर कोई अनाथालय तो नहीं ! मयंक के बापू ने पलट कर जवाब दिया।
धीरे बोलो जी.... मंकू को बुरा लगेगा! जवान बेटा को ज्यादा गुस्सा दिलाना ठीक नहीं। मैं उसको समझा बुझा कर बात करूंगी।
बात करूंगी.... तू क्या बात करेगी ....अगर उसने तेरी बात ना मानी तो...
तो ...क्या बच्चा तो हमारा ही है ना!! हम लोग बड़े हैं! उससे प्यार से बात करेंगे तो कुछ ना कुछ रास्ता जरूर निकल आएगा!
मयंक के बापू को लाजो की बात को समझ आई। लाजो ने मंकू को आवाज दी और अपने कमरे में ले जाकर उससे कहा... बेटा यह सब क्या है ?? तू तो जानता है ना अपने घर के रीति-रिवाजों को। आज तक इस घर... खानदान में कभी किसी ने अपने बच्चे की शादी गैर ब्राह्मण बच्ची से नहीं की? मगर तूने... तूने तो आज सारी हद पार कर दी? गैर ब्राह्मण ही नहीं अछूत कन्या से... विवाह कर लिया तूने? एक पल भी ना सोचा कि तेरे बापू इस रिश्ते को स्वीकार न करेंगे भी या नहीं। तूने तो बड़ा धर्म संकट उत्पन्न कर दिया बेटा! मेरी मान तो इस लड़की के लिए कोई सुंदर सा लड़का, इसकी जाति का ढूंढ कर विवाह कर देंगे। औरअब तू इसे ले ही आया है तो सारा खर्च हम लोग उठा लेंगे ! अपनी इज्जत भी बच जाएगी और इसका घर भी बस जाएगा!
मयंक बोला... मां यह तो सरासर धोखा देना हुआ! मैंने ईश्वर का आदेश मानते हुए इसकी मां की आत्मा के सामने इसे अपनी पत्नी स्वीकार किया!! मैं तो ईश्वर को भी मुंह दिखाने के लायक न रहूंगा! लोगों को लोगों से झूठ बोलते देखा है पर ईश्वर और आत्मा से झूठ बोलते मैंने किसी को नहीं सुना।
मां. .. मयंक की बात सुनकर निराश हो गई! उसने सारी बातें मयंक के बापू को बता दीं। मयंक के बापू भी सख्ती बरते जा रहे थे। उनका अनुमान था कि उनके संस्कार मयंक को बदलने के लिए पर्याप्त है।पर जब बात ना बनी तो मयंक और कजरी अपने कमरे में अपना सामान उठाने चल दिए।
इधर मां का दिल तेजी से धड़कने लगा। वह समझ ना पा रही थी कि बेटा और पति किस को समझाए। कोई भी अपनी जिद्द छोड़ने को तैयार नहीं। दीपों की दिवाली बुझी बुझी सी लगती नजर आने लगी। यह बातें उसके दिल को कचोटे जा रही थी कि अचानक से वह बेसुध होकर बैठ गई। मयंक के बापू के कदम की तेज चाल उनके क्रोध को बयान कर रही थी। उन्होंने जब लाजो को बेसुध होकर बैठते देखा तो घबरा गए। उन्हें अपने बुढ़ापे की दुनिया वीरान नजर आने लगी वह लाजो के सिर पर हाथ रखकर सोचने लगे.... क्या होगा यदि यह और मयंक मुझे छोड़ कर चले गए तो? ऐसे रीति रिवाज और छुआछूत के आचार विचार किस काम के! जो आदमी को परिवार से अलग कर दें!! उन्होंने ठंडे दिमाग से सोचना शुरु कर दिया !! उनका चेहरा खुशी से खिल उठा। उन्होंने लाजो को उठाते हुए कहा.सुन... लाजो... सुन... जाकर रोक ले मंकू को!!... मैं उसे और तुझे जाने ना दूंगा। ......
क्या करेंगे मयंक के बापू मयंक को रोकने के लिए। जानने के लिए पढ़ते रहिए धारावाहिक रचना का अंतिम भाग......

