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Dr Sanjay Saxena

Horror

4  

Dr Sanjay Saxena

Horror

खौफ कजरी और प्रेम 5

खौफ कजरी और प्रेम 5

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इस धारावाहिक रचना के पिछले भाग में आपने पढ़ा कि मयंक कजरी को लेकर घर आ जाता है और अपने घर जाने के बारे में सोचता है । अब आगे.....

      रात हो चुकी थी। मयंक ने कजरी से कहा... कजरी कल बाजार चलकर तुम्हारे लिए कुछ कपड़े और सामान ले आते हैं । शाम को मयंक के लिए टिफिन आया । दोनों ने उसमें से मिलकर भोजन किया और सो गए। मयंक के मन में अब अपने मां-बाप को लेकर शंका उठने लगी। वह सोचने लगा कि.... क्या मेरे माता-पिता और घरवाले मेरे इस निर्णय को स्वीकार करेंगे?? इसी सब उधेड़बुन में उसे नींद आ गई!

सुबह का सूरज कजरी और मयंक के वैवाहिक जीवन का पहला सूरज था। उन्होंने उठकर साथ-साथ सूर्य देव को नमन किया। मयंक अब कजरी को वह सभी संस्कार सिखा देना चाहता था जो उसके परिवार द्वारा विरासत में उसे मिले थे। इसी कारण उसने कुछ दिन रुकने के बाद अपने घर जाने का निश्चय किया था। मयंक, कजरी की दुख भरी दुनिया को जल्द से जल्द बदल देना चाहता था। वह कजरी को बाइक से बाजार ले गया और उसकी जरूरत के सभी सामान, वस्त्र इत्यादि दिला लाया। वह चाहता था कजरी जल्द सामाजिक मर्यादाओं में अपने को ढाल ले। वह उसको अधिक से अधिक समय और प्यार देना चाहता था । वहजल्द से जल्द उसकी जिंदगी से उन काले अध्यायों को हटा देना चाहता था। कजरी भी मयंक के प्रेम और दया भाव से अपने को उसका कृतज्ञ समझती। वह उसकी सभी बातों को ध्यान से सुनती और उसी रूप में पूरा करने की कोशिश करती ।

       दोनों के कुछ दिन यूं ही बीते। दीपावली का त्यौहार निकट आने लगा ।मयंक ने मन बना लिया कि वह इस पावन पर्व पर ही कजरी को अपने घर लेकर जाएगा। वह दीपावली आने में बाकी कुछ दिनों के बीत जाने का बेसब्री से इंतजार करने लगा ।

    कुछ दिन यूं ही बीत गए...! आखिर दीपावली के वे दिन भी आ गए जब स्कूल की छुट्टियां हो गई! मयंक आज अपने घर को रवाना हुआ । बस में बैठा मयंक कजरी के साथ बहुत खुश था। उसकी आंखों में अपने परिवार से मिलने की प्यास बढ़ती जा रही थी। वह सोचने लगा... उसके द्वारा किये गए इस नेक कार्य पर उसके परिवार वाले गर्व महसूस करेंगे। उसके बापू उसे अपने सीने से लगा लेंगे और गर्व से कहेंगे.... शाबाश बेटा ।। आज तूने एक शिक्षक और ब्राह्मण होने का फर्ज पूरा कर दिया। तूने समाज को एक नई दिशा दी इस तरह की बातें उसके मन में तैरने लगी। कब रास्ता कट गया उसे पता ना चला ।जल्द बस स्टॉप पर बस रुकी और वे दोनों उतरकर थ्री व्हीलर में बैठकर अपने घर पहुंचे। लेकिन तब तक दिन गुजर चुका था।

शाम की बेला थी। मयंक ने घर पर पहुंचते ही खुशी से आवाज दी... मां ...मां....!!

मां भी अपने लाडले के आने की प्रतीक्षा कर ही रही थी। दौड़ी-दौड़ी द्वार खोला!! सामने देखा तो मयंक था! उसने मयंक को गले लगा लिया!! मेरा बच्चा... बहुत दिनों बाद आया रे तू ।।।तेरी नौकरी क्या लगी.... तू तो हम सबको भूल गया!! चल अंदर आ जा... तब तेरी खबर लेती हूं.. मां की आंखों में शिकायत कम प्यार अधिक दिखता था! मयंक ने कजरी को अंदर आने के लिए कहा और स्वयं कजरी के साथ मां के पैर छूने लगा!

   दोनों के साथ पांव छूने से मां का ह्रदय धक से कर गया। मां सोचने लगी ....साथ-साथ पांव तो लड़का और बहू छूते हैं ।....पर क्या यह मेरी बहू है...? क्या मयंक ने शहर में शादी कर ली....? क्या इसने हमें भी न पूछा....? पर दूसरे ही पल सोचने लगी ...नहीं ....नहीं... मयंक.. मेरा बेटा है!! वह ऐसा हरगिज़ ऐसा न करेगा। यह इसके साथ की कोई दोस्त होगी । खैर मां दोनों को लेकर कमरे में पहुंची और कहने लगी... मयंक के बापू देखो कौन आया है?? अपना मंकू आया है!! बापू भी उठे और मयंक को गले लगाते हुए बोले.... तू ठीक तो है ना बेटा!! तुझे वहां कोई परेशानी तो नहीं है??

     बेटा , बाप के गले से लग कर गर्व महसूस कर रहा था। उसने कहा बापू ....आप सब का आशीर्वाद है ...और उन दोनों ने बापू के भी पांव छू लिए।

कजरी इतनी समझदारी रखती थी कि जिसके पांव मयंक छुए उसे भी उसके पांव छूकर उनसे आशीर्वाद लेना होगा। मां ने सभी के लिए खाने पीने की तैयारी की और खाना बनाया ।सभी लोग खाने की मेज पर बैठे मां के हाथों का स्वादिष्ट भोजन खा रहे थे। मां ने भी मयंक की पसंद की सारी चीजें बनाई थी। खाना खा लेने के बाद मयंक सामान के साथ कजरी को अपने कमरे में ले गया और आराम करने के लिए कहा।

      इधर बापू ने मयंक की मां से पूछा... अजी सुनती हो.. यह अपने मंकू के साथ कौन आया है? मयंक की मां बोली. मुझे तो कुछ बताया नहीं.... होगी उसके... स्कूल की कोई.. टीचर ...!!पर दोनों को चैन न मिला रहा था! उन्होंने मयंक को आवाज दी ... "मंकू.... ओ.. मंकू... बेटा.. सुनो.. तो !"

बापू की आवाज सुनते ही मयंक उनके पास पहुंचा और कहा ... "बापू... कहो... कैसे याद किया ??"

" कुछ नहीं बेटा... तूने अपने साथ आई लड़की का परिचय हमसे नहीं कराया!!"

मयंक बोला.... "बापू... मैंने सोचा अभी हम लोग हारे थके हैं! सुबह फ्रेश होकर आपको सारी बात बताऊंगा!"

बापू ने कहा... "अच्छा ठीक है... जैसा तू उचित समझे। उस लड़की के सोने का इंतजाम ठीक से कर दियो... जिससे अपने घर की बदनामी ना हो और तू चाहे तो मेरे या मां के कमरे में सो जइयो।

मयंक अभी कुछ बात करने के मूड में नहीं था इसलिए उसने बापू की हां में हां मिलाई । सुबह हुई कजरी जल्दी उठ गई और नहा धोकर उसने मां और बाबू जी का चरण स्पर्श किया। उसके बाद पूजा अर्चना करके कहा... मां आप मुझे रसोई दिखा दीजिए... जिससे मैं सभी के लिए चाय नाश्ता तैयार कर सकूं!! मां ने औपचारिकता निभाई और कहा... अरे ...काहे तकलीफ करती हो बेटी..... तुम यहां मेहमान हो!! एक-दो दिन के लिए आई हो! आराम करो! हमें अपनी मेहमानवाजी का मौका दो !! तुम्हारा यहां आना बार-बार थोड़े ही होगा!!"

पर कजरी की जिद के आगे वे बेबस हो गई। उन्होंने कजरी को रसोई दिखा दी। मयंक सभी लोगों के साथ नाश्ते की टेबल पर बैठा नाश्ते का इंतजार कर रहा था। तभी मां ने कहा... मंकू अब बता "बेटा ..यह कौन है??"

" अरे ..यह... कौन नहीं ...मां यह तुम्हारी बहू है!!"

मां और बापू चौंक पड़े!! "क्या... क्या... कहा.... बहू..... हमारी बहू......!! तू काहे मजाक करता है! मंकू पराई लड़कियों के साथ ऐसा मजाक शोभा नहीं देता बेटा! यह धर्म विरुद्ध है!"

"अरे.... नहीं... बापू... मै कोई मजाक नहीं कर रहा। यह पराई नहीं बल्कि सचमुच मेरी पत्नी कजरी है।"

" तेरी पत्नी ....क्या कहता है बेटा....!! तूने कब विवाह कर लिया? हमें बताया तक नहीं ??" मां बोल रही थी

बापू बीच में ही बोले .. "भला यह कैसा विवाह? न मां-बाप और ना कोई रीति रिवाज??"

"अरे बापू सुनो तो ... इन्हीं सब बातों में के लिए तो मैं यहां आपके पास आया हूं ....जिससे आप हम दोनों का विवाह पूरी रस्मो रिवाज के साथ कर सकें!!"

" पर बेटा इस लड़की को यहां लाने की क्या जरूरत थी?? हमें बता देता... तो ...हम लोग इसके मां-बाप से मिल आते।" मयंक ने अपने मां बाप को सारी बातें विस्तार से बताना ही उचित समझा । तब तक कजरी नाश्ता तैयार करके टेबल पर रख चुकी थी ।

क्या मयंक के बापू इस रिश्ते को स्वीकार करेंगे? क्या होगा कजरी का आगे?? जानने के लिए पढ़ते रहिए अगला भाग क्रमशः....



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