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बेज़ुबानशायर 143

Abstract Fantasy Inspirational

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बेज़ुबानशायर 143

Abstract Fantasy Inspirational

कौन बुझाए उनके दिल की आग

कौन बुझाए उनके दिल की आग

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तपती गर्मी पसीने से थे बैचेन

बारिश ही बुझाए तन की आग। 

सावन की रिमझिम बारिश तो

फकत लगाए दिल की आग।। 


बादल बीच चकवा चाॅंद निहारे

पपीहा जी पीहू-पीहू सुर में गाए। 

कोयल की कुहू-कुहू मन भाए

मयूर पंख फैलाय नृत्य दिखाए। 


बिरहा की मारी मन में विचारती

पिया बुझा दे मेरे दिल की आग।

सीमा पर तैनात गीत वह भेजे्

प्रियतम आन मिलो सुन लो राग।। 


साहित्य श्रेत्र में कितना कमाल है

रचनाकार उगलते दिल की आग।

पढ़कर पाठक की इंद्रियाँ भी जी

घोर निद्रा से चटपट जाए जाग।। 


किसान चले खेतों में हल लेकर

कर्मयोग में लीन गातेआल्हा राग। 

अन्नदाता का इंतजार करें गृहणी

हलधर आए बुझे दिल की आग।। 


आग लगे हैं अनैतिकता देखकर

क्या इसिलिए थे आजादी के राग। 

भारत का भविष्य चिंतित आज है

कौन बुझाए उनके दिल की आग।। 


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