Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Tragedy


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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Tragedy


काश ! काश ! काश !

काश ! काश ! काश !

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हम सहकर्मी थे। जैसी मैं थी वैसे ही, तुम भी तो विवाहित थे। मेरी तरह तुम्हारे भी बच्चे हैं, हम दोनों ही यह जानते भी थे। 

कार्यालीन कार्यों में मुझे, तुमसे मिलते मार्गदर्शन के कारण मैं, तुमसे प्रभावित रहती थी। यही कारण था कि मुझे, तुमसे बात करना अच्छा लगने लगा था। 

तुमने, अपने घर पर डिनर पर मुझे, मेरे परिवार सहित आमंत्रित किया था। तुम्हारी पत्नी नेहा जी, इतनी सुंदर और समझदार थीं कि मुझे, उनसे मिलकर, अपने में हीनता बोध हुआ था। मेरे पति ऋषभ, तुमसे और मेरे बच्चे, तुम्हारे बच्चों में मिलकर कितने खुश हुए थे। 

नेहा जी ने भोज इतना स्वादिष्ट बनाया था कि आज तक मुझे लगता है कि इतना जायकेदार घर का भोजन मैंने, मेरी मम्मी के अतिरिक्त कभी किसी और के हाथों का बनाया, खाया ही नहीं है। 

फिर, मैं भी पीछे नहीं रही थी। अगली ही छुट्टी पर मैंने भी, सपरिवार तुम्हें दोपहर के भोजन पर आने का आमंत्रण दे दिया था। फिर दुर्भाग्य से, उसी दिन अचानक मेरी कुक छुट्टी कर गई थी। 

तब मुझे यह देख अत्यंत प्रसन्नता हुई थी कि उस दिन नेहा जी, ना सिर्फ लंच के समय से, घंटे भर पहले ही मेरे घर आई थीं बल्कि, सीधे मेरी रसोई में आकर उन्होंने, मुझे गाइड किया और भोजन तैयार करने में हाथ बँटा कर, मेरे घर का भोजन भी किसी होटल जैसा स्वाद देने वाला, तैयार करा दिया था। 

उस दिन मेरे मन में यह विचार आया था कि -

काश! में भी अर्निंग ना होकर, उनके जैसी गृहिणी ही रही होती। वे, अपने बच्चों के लालन-पालन में, मुझसे अधिक समय दे पाती थीं। साथ ही घर में स्वादिष्ट सामग्री तैयार कर, बच्चों एवं तुम्हारे लिए संतुलित आहार के साथ पौष्टिकता सुनिश्चित कर रहीं थीं। सचमुच नेहा जी से, मुझे एक तरह से ईर्ष्या हुई थी।

ऋषभ और मैं, दोनों अर्थ उपार्जन कर रहे थे। इससे हमारी आमदनी निश्चित ही तुमसे अधिक थी। लेकिन मैं जानती हूँ, अधिक आमदनी का एक अच्छा हिस्सा हमें, बार बार बाहर की तैयार खाद्य सामग्री (जंक फ़ूड) पर एवं गृह सेवक-सेविकाओं (कुक, नैनी एवं अन्य मेड-सर्वेंट) पर व्यय करना होता था। 

अर्निंग होने की कीमत मुझे, बॉस के सामने जब चाहे जब नोट पैड लेकर खड़े होने की मजबूरी झेल कर, अदा करनी होती थी वह हमेशा की अलग बात थी ही।

तब भी मैं स्वयं को समझा लेती थी कि नहीं! मेरा, नेहा जी से यों ईर्ष्या करना उचित नहीं है। मैं सोचती कि पता नहीं, खुद कमाऊ ना होने से नेहा जी, अपने जीवन में क्या और कैसी कमी अनुभव करती होंगी। 

हम दोनों के पारिवारिक संबंध हो जाने से मैं, तुमसे अधिक मुखर हो, बात करने लगी थी। तुमसे विभिन्न कार्यालयीन कार्यों में मिलते सहयोग से मैं, स्वयं को तुम्हारे एहसान से दबा महसूस करती थी। तब हमारा पद समान होते हुए भी मैं, तुम्हारा बॉस जैसा आदर किया करती थी।

अब मैं सोचती हूँ कि क्या, सभी पुरुष तुम जैसे होते हैं? 

कल संध्या कार्यालय से लौटते समय मेरी स्कूटी ख़राब होने से, पहली बार मैंने अपने घर तक छोड़ने के लिए तुमसे निवेदन किया था। तुम्हारे सहयोग के लिए, बाइक पर साथ बैठकर, मेरा मन फिर एक बार तुम्हारा धन्यवाद अदा कर रहा था। तब अचानक तुमने, हनुमानताल के किनारे कम भीड़ की जगह पर बाइक रोक दी थी। 

मैं कुछ समझ पाती उसके पहले ही, तुमने बाइक से विचित्र तरह से उतर कर, जबरन मेरे दोनों हाथ अपने हाथ में ले लिए थे और कामासक्त होकर कह दिया था - 

मेरी डार्लिंग, प्राणप्रिया, मैं, तुम को अपनी जान से ज्यादा प्यार करता हूँ। 

यह वाक्य सुनते ही मुझे लगा था कि मैं, अब तक किसी मूर्छा में थी। तुम्हारी घटिया हरकत एवं इन शब्दों ने मुझे, मेरी मूर्छा से जगा दिया था। 

क्या, ऐसे मौके के लिए ही तुम, मुझ पर एहसान लाद रहे थे? मुझे, यह तुम्हारी पूर्व नियोजित योजना लग रही थी।  

तब मैंने, तुम्हारी पकड़ से अपने हाथ छुड़ा लिये थे। अपनी पूरी शक्ति सँजो कर तुम्हें, अपने से परे धकेल दिया था। मैंने, दौड़ कर एक ऑटो रिक्शा को हाथ दिया था और उसमें रुआँसी बैठकर, विचार तंद्रा में चली गई थी। मेरे मन में कई विचार आ जा रहे थे। सहकर्मी के अप्रत्याशित हरकत से लज्जित थी मैं। तब मेरे भीतर अंतर्द्वंद चल रहे थे कि - 

कैसे नीच, घटिया व्यक्ति हो तुम? मैं सोचती थी कि आधुनिक आज के समाज में संकीर्णता खत्म हो रही है। अब पुरुष-नारी परस्पर अपने लिंग भेद को पृथक रखकर सच्चा मित्रवत पवित्र संबंध निभाने लगे हैं। 

काश! यह भ्रम मेरा, तुमने बना रहने दिया होता। 

काश! अपने मन की घटिया बात तुमने, अपने मन में रखी रहने दी होती। 

काश! तुमने अपनी गंदी सोच से, मुझे छुआ नहीं होता। 

क्या मेरे पति ऋषभ भी, घर के बाहर तुम जैसे ही होंगे? यह उचित या अनुचित ऋषभ पर मेरा संदेह, तुम्हारे ही छल की देन है। अब अकारण ही उनपर भी मेरी दृष्टि संदेह की हो गई है। 

तुम्हारे हाथों का, मेरे हाथों ने अनुभव किया गंदा स्पर्श यूँ तो, मुझे गंदा नहीं कर सका है। 

मगर, 

मैं सोचती हूँ कि निर्लज्ज तुम, मनुष्य कहलाने के योग्य हो भी या नहीं? तुम्हारी प्राणप्रिया नेहा जी, संपूर्ण समर्पण से तुम्हारे बच्चे एवं गृह को स्वर्ग का वातावरण देने के लिए मरी जाती हैं। 

जिन नेहा जी के सामने मुझे हीनता बोध होता है तुम्हारे जीवन में उनसी प्राणप्रिया होते हुए तुम, मुझ अन्य की पत्नी को, प्राणप्रिया कैसे कह सकते हो? 

जब तुमने अन्य (मुझ) को प्राणप्रिया कहा है तब स्पष्ट है कि नेहा जी तुम्हारी प्राणप्रिया नहीं हैं। 

तब भी वह इतनी प्यारी हैं कि मुझे प्राणप्रिया लगती हैं। 

मगर, 

मगर मेरी विवशता यह है कि नेहा जी से मैं, तुम्हारी यह करतूत कह ना पाऊँगी। 

मैं, क्षमा करती हूँ तुम्हें कि तुम्हारे, मुझ पर कुछ एहसान हैं। इससे भी अधिक इसलिए क्षमा करती हूँ तुम्हें कि तुम, एक ‘सुशीला’ नेहा जी के पति हो। 

मैं तो क्षमा कर रही हूँ तुम्हें मगर, क्या नेहा जी, यह जानकर तुम्हें क्षमा कर पाएंगी। अगर उन्होंने क्षमा नहीं किया तो वे (उनके) बच्चे जिनका कोई दोष नहीं है, क्या, उनके भविष्य प्रभावित ना हो जाएंगे?

काश! जैसा नेहा जी एवं मैं, तुम्हें समझते रहीं थीं। तुम वैसे सज्जन का ढोंग निभाते रहते। 

काश! तुमने अपने हृदय एवं हाथों में वह गंदगी ना भर ली होती। जिसके स्पर्श की गंदी अनुभूति के कारण मैं, अपने हाथों से भोजन करने एवं अपने पति एवं बच्चों को छूने में भी ग्लानि अनुभव कर रही हूँ। 

काश! तुमने हम नारी की नहीं किंतु अपने जैसे पुरुष (ऋषभ) का ही मान रखा होता। उनकी (मैं) अमानत में, खयानत का पाप तुमने नहीं किया होता। 

काश! आज सारी नारी जाति को मुझे यह परामर्श नहीं देना पड़ता कि वे, पराये पुरुष का एहसान बहुत सोच समझ के लिया करें क्योंकि कुछ होते हैं निकृष्ट पुरुष, जो गंदी तरह से अपने किये अहसानों की कीमत वसूल करते हैं।  

काश! नेहा जी के लिए मेरे मन में थोड़ी ईर्ष्या ही बने रहने देते। काश! मुझे, तुम उनके प्रति संवेदना के लिए मजबूर ना करते। 

काश! काश! काश! ...

अब मुझे लग रहा है कि नेहा जी के जीवन में, मेरी तुलना में बड़ी कमी है। उनके, प्राणनाथ (तुम) पति, विश्वास योग्य व्यक्ति ही नहीं हो। तुम उनके योग्य नहीं, एक अत्यंत घटिया पति हो।  


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