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anil kumar

Horror Action Thriller


4.3  

anil kumar

Horror Action Thriller


काली परछाई

काली परछाई

13 mins 946 13 mins 946

जेठ की गर्म दोपहरी में अचानक दरवाज़े पर हुई दस्तक से मैं घबराकर उठ बैठा, सोचा इस तन को चीर देने वाली

लू भारी दोपहरी में कौन है, जिसने मेरे दरवाजे पर दस्तक दी है। थोड़े सहमे कदमो से मैं दरवाजे की तरफ गया और पूछा

कौन है ? कौन है ? पर उस तरफ से कोई जवाब ना पाकर मैं समझ गया कि पड़ोस के शरारती बच्चे होंगे, दरवाजा पीट कर

चले गए होंगे। और फिर मैं कमरे में जाकर अपने ख़्यालों में गुम हो गया। तभी अचानक दरवाजे पर फिर वही दस्तक हुई,

अबकी बार मैं तेजी से दरवाजे की तरफ बढ़ा ये सोचकर कि इस बार इन शरारती बच्चो को पकड़ कर ही रहूंगा। और तुरंत ही मैंने

दरवाजा खोल दिया, दरवाजा खुलते ही मेरी मेरे होश उड़ गए, लगा कि जैसे किसी ने मुझे कुछ क्षण के लिए प्राणहीन कर दिया हो,

क्योकि जो मैंने देखा उसके बाद मेरा बेहोश होना लाजमी था।

 और जब मुझे होश आया तो मैंने देखा मेरे सामने बगल वाले शर्मा जी खड़े है, उन्होंने मुझे पानी पिलाया और पूछा क्या हुआ ?

आलोक भाई आप दरवाजे पर बेहोश पड़े थे, वो तो अच्छा हुआ मेरी नजर पड़ गई आप पर वरना इस दोपहरी में यहां पर कोई घर

से बाहर कदम भी नही रखता है। क्या आपको मालूम नही आलोक भाई !

मैं आश्चर्यचकित सा शर्मा जी को देखने लगा, और धीमे स्वर में बोला क्या मालूम नही मुझे, और मालूम भी कैसे होगा, मैं तो अभी 5 दिन पहले ही इस शहर में आया हु, अभी अभी बदली हुई है मेरी, सालभर बाद कही और चला जाऊंगा, इसलिए अकेला ही रह रहा हु। शर्मा जी हल्की सी मुस्कुराहट के साथ बोले कुछ नही आलोक भाई, अभी मैं चलता हूं, आप आराम करें और हा चाहे कुछ भी हो जाये आप दोपहर 12 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक दरवाजा ना खोलना, कल मिलता हु आपसे अभी घर पर कुछ काम है मैं चलता हूं अभी। बस इतना समझा कर शर्मा जी अपने घर चले गए। मैं भी खाना खा कर सोने चला गया, पता ही नही चला कब रात हो गई शर्मा जी से बात करते हुए।

रात में बिस्तर पर लेटे लेटे मैं खुद को समझा रहा था कि जो घटना दोपहर में हुई वो बस मेरा वहम था, पर डर से में अभी भी अंदर तक सहमा हुआ था, नींद भी आंखों से ओझल हो चुकी थी, डर था या वहम इसी कशमकश में सहमा सा मैं अपने ही बिस्तर पर सिमटा जा रहा था। सोच रहा था कि किसी को बताऊ या नही की दोपहर को क्या हुआ मेरे साथ जो आंखे बंद करते ही वो मंजर सामने आ जाता है और मैं डर से कांपने लगता हूँ। रह रह कर शर्मा जी की बात भी दिमाग मे घर कर रही थी कि क्यो शर्मा जी ने मुझे हिदायत दी कि दोपहर को दरवाजा नही खोलना है, ऐसा क्या है इस शहर में, क्यो इस शहर के लोग दोपहर को घर से बाहर नही निकलते है। मैं ये सोच ही रहा था कि मेरे दाएं कान में कुछ फुसफुसाहट सी हुई मैं सहम सा गया और फिर वही हलचल बाएं कान में महसूस की और उसके बाद सामने की दीवार पर नजर गई, मेरे होश उड़ गए। देखते ही देखते मेरी अपनी परछाई एक भयानक विकराल काली परछाई में बदलने लगी, चेहरा इतना डरावना की आदमी दिन के उजाले में देख ले तो भी बेहोश हो जाये।

ये तो काली अंधियारी अमावस की रात थी, वो एक भयानक काली परछाई ही थी और कुछ नही, ना कोई भूत-प्रेत, ना जिन्न चुड़ैल

देखते ही देखते मंजर बदल गया मेरी अपनी परछाई अब मेरी नही रही, वो मुझसे जुदा हो चुकी थी और मैं ये सब देखते देखते बेहोश हो चुका था।

सुबह सुबह दरवाजे की दस्तक़ से मेरी बेहोशी टूटी और मैं घबराकर उठा सबसे पहले मेरी नज़र मेरी परछाई पर गयी देख कर दिल को तसल्ली सी हुई परछाई मेरे साथ ही है, रात की बात को मैं एक भयानक सपना समझ कर भूलना चाह रहा था, परंतु वो मंजर इतना भयानक था कि उसको ज़िन्दगी भर भुला पाना नामुमकिन था। खैर मैं दरवाजे की तरफ गया, जैसे ही दरवाजा खोलने वाला था मेरे दिमाग मे शर्मा जी की बात घूमने लगी और मेरी नज़र घड़ी पर गई, मैंने समय देखा और राहत की सांस ली घड़ी में सुबह के 10 बजे थे। और फिर तभी बाहर से आवाज आई आलोक भाई दरवाजा खोलो मैं हु तुम्हारा पड़ोसी शर्मा जी। फिर मैंने भी बिना देरी किये तुरंत दरवाजा खोल दिया।

शर्मा जी ने पूछा सब ठीक तो है ना सुबह के 10 बज रहे है अभी तक आपका अख़बार और दूध गेट पर ही है, तबियत तो ठीक है। मैंने थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा सब ठीक है वो मैं रात को देर तक जाग रहा था इसलिए नींद देर से खुली। मैं शर्मा जी को कल की घटना बताना चाहता था पर कैसे बताऊ मुझ पर यकीन भी करेंगे यही सोच कर कुछ बोल नही पा रहा था। शर्मा जी मेरे साथ कुछ देर बैठे फिर हम बाते करने लगे डेढ़ घन्टा कैसे बीत गया पता ही नही चला, मेरे मन मे शर्मा जी की कही एक बात चल रही थी जो उन्होंने कल बताई थी कि दोपहर में दरवाजा नही खोलना है मैं पूछ ही रहा था तभी शर्मा जी बोल पड़े आलोक भाई चाय नही पिलाओगे, मैंने कहा क्यो नही अभी लो शर्मा जी, कहकर में किचन में चला गया। शर्मा जी वही बैठे बैठे मुझसे बाते करते रहे। बातो बातो में पूछने लगे शादी हो गई आपकी ? मैंने जवाब दिया जी 3 साल हो गए शादी को एक बिटिया भी है, शर्मा जी बोले फिर है कहाँ, साथ क्यो नही लाये ?

मैंने बताया कि थोड़े समय के लिए आया हु इस शहर में जल्दी बदली करवाकर वापस चला जाऊंगा, इसलिए अकेला ही आ गया। शर्मा जी ने पूछा कि ऑफिस नही जाते क्या ? क्या टाइमिंग है ऑफिस का? मैंने जवाब दिया कि 10 बजे का है जी कल से जॉइन करना है और मैं चाय और नमकीन की ट्रे लेकर किचन से बाहर आ गया और शर्मा जी को चाय का कप पकड़ाया शर्मा जी चाय की चुस्की लेते हुए बोले कि आप भाभी जी को ले ही आओ, मैंने कहा क्यो क्या हुआ चाय सही नही बनी क्या ? शर्मा जी बोले अरे नही नही वो बात नही है, चाय तो बहुत अच्छी बनी है, पर इस शहर में कोई भी पुरुष अकेला नही रहता है, मैंने तुरंत पूछा ऐसा क्यों ? वो बोले बात ऐसी है कि, उनके इतना बोलते ही घड़ी ने दोपहर 12 बजे का घन्टा बजाना शुरू कर दिया, शर्मा जी ने घड़ी की तरफ देखा और बोले 12 बज चुके है मैं चलता हूं बाद में बताता हूं सब बात, और हड़बड़ी में उठकर दरवाजे की और चल दिये।

मैंने भी दरवाजा बंद करने के लिए जैसे ही उठने का प्रयास किया मैं उठ नही पाया, जैसे किसी ने मुझे जकड़ लिया हो , तभी मेरी नजर अपनी परछाई पर गई, और मैंने देखा कि मेरी परछाई को उसी भयानक काली परछाई ने अपने हाथों से जकड़ा हुआ है जिस वजह से में हिल भी नही पा रहा हु, और वो काली परछाई मेरी परछाई पर हावी हो रही है उसको खुद में समेट रही है। मैंने डर कर अपनी आंखें बंद कर ली और हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा। कुछ देर बाद आंखे खोली तो मेरी परछाई काली परछाई की कैद से आज़ाद थी, मैंने तुरंत उठकर दरवाजा बंद किया और राहत की सांस ली।

अब मैंने सोचा कि ये क्या बला है क्या राज है और शर्मा जी की बातों का इनसे कही कोई लिंक तो नही है। ये सोचकर मैंने शर्मा जी के उस नंबर पर फोन लगाया जो उन्होंने मुझे तब दिया था जब वो पहली बार यहाँ आये थे और अपना नम्बर देते हुए कह गए थे कि कोई भी काम हो तो इस नम्बर पर कॉल करके बुला लेना, मैंने फ़ोन लगाया पर फ़ोन लगा नही मैंने कई बार कोशिश की परंतु हर बार एक ही जवाब मिलता की जिस नम्बर पर आप संपर्क करना चाहते है वो अभी नेटवर्क कवरेज क्षेत्र से बाहर है, आखिर में मैंने सोचा चलो बाद में बात कर लूंगा और अपने कमरे में जाकर सो गया।

शाम को फिर दरवाजे पर दस्तक होती है, क्योकि अब शाम के 6 बज चुके थे तो मैंने बेझिझक दरवाजा खोल दिया और सामने शर्मा जी को पाकर खुश हो गया और सोचा आज नही जाने दूंगा सारे राज़ जानकर ही रहूंगा। शर्मा जी अंदर आये और हम दोनों सोफे पर बैठकर बाते करने लगे। मैंने पूछ लिया शर्मा जी आपका नम्बर बहुत मिलाया पर लगा नही उन्होंने कहा कि नेटवर्क प्रॉब्लम बहुत है यहाँ पर इसलिए अक्सर ऐसा होता है। फिर मैंने कहा खैर छोड़िये ये बताये की 2 दिन से आप मुझे जो सलाह दे रहे है कि दोपहर में दरवाजा मत खोलना अकेले मत रहना इन सब के पीछे क्या राज़ है !

शर्मा जी बोले बताता हूं, सुनो ये शहर शापित है, कोई यहाँ रहना नही चाहता है क्योंकि इस शहर पर एक भयानक काली परछाई का साया है, इस कारण से कोई शहर छोड़कर जा नही सकता। जो शहर छोड़ेगा उसको अपना शरीर छोड़ना पड़ेगा ऐसा श्राप है। मैंने पूछा ये काली परछाई है क्या चीज़ और ये श्राप क्यो है। शर्मा जी बोले कि कई सालों पहले शहर बहुत सुंदर था इस पर कोई श्राप नही था, परंतु कुछ ऐसा हुआ कि शहर शापित हो गया।

मैंने पूछा ऐसा क्या हुआ ! क्या राज़ है खुलकर बताएं।

शर्मा जी बोले – शहर में एक विधवा महिला थी, वो लोगो के घरों में काम करके अपना गुजारा करती थी, उस पर कई बार घरों में चोरी करने के इल्जाम भी लगे पर कुछ साबित नही हो पाया, फिर उस पर इल्जाम लगा कि ये पुरुषों को वश में करने के लिए तंत्र मंत्र भी करती है ये डायन है, शहर के लोगो ने बाहर से एक बड़े तांत्रिक को बुलाया उसने उस औरत की परछाई को एक आईने में कैद कर दिया, बताते है कि ऐसा करने से उसकी शक्ति कम हो गयी और फिर उस औरत को चौराहे पर बांधकर डायन करार देकर जला दिया।

मरते समय उसने शहर को श्राप दिया कि मेरी काली परछाई सदा इस शहर पर मंडराती रहेगी और जो भी पुरुष अकेला होगा वो ही मेरा शिकार होगा, ये सारी घटना जेठ की दोपहरी में हुई थी इसलिए ये समय सबसे खतरनाक माना जाता है, आइना शहर से बाहर ले जाते समय गिरकर टूट गया जिससे उसकी काली परछाई आज़ाद हो गयी। ये काली परछाई जेठ की दोपहरी में मुख्यद्वार से प्रवेश करती है और अमावस की रात को पुरुष की परछाई को जकड़ा शुरू कर देती है और हर दिन पुरुष की परछाई का आयाम घटने लगता है और चौहदवे दिन पुरुष की पूरी परछाई गायब हो जाती है हमेशा हमेशा के लिए और पंद्रहवे दिन यानी कि पूर्णिमा की रात को उसकी मृत्यु निश्चित है। जब ये 101 परछाईयो को अपने कबजे में ले लेगी तो उन सबकी आत्मा भी इसमें मिल जाएगी और फिर ये बहुत शक्तिशाली हो जाएगी, कहते है कि फिर वो डायन फिर से जिंदा हो जाएगी।

मैंने पूछा इस काली परछाई से बचने का इसको खत्म करने का कोई उपाय नही है, शर्मा जी बोले उपाय है, बचाव के लिए अपने साथ सरसो के दाने रखो उसकी महक ये काली परछाई सहन नही कर सकती है क्योंकि तांत्रिक ने इसको जब आईने में कैद किया था तब आईने को सरसों के दानों से ही ढका था। और अगर इस परछाई पर पूर्णिमा के चांद की रोशनी पड़ जाए तो ये काली परछाई भस्म हो जाएगी, और अगर मृत्यु हो जाये तो जीवन पाने का एक उपाय और भी है मैंने पूछा वो क्या, शर्मा जी बोले अगर तुम्हारी मृत्यु हो जाती है तो मृत्यु के बाद तुम खुद इस शहर और काली परछाई की कहानी के सारे राज़ बिल्कुल सही सही बिना कुछ छुपाये किसी ऐसे व्यक्ति को सुना दो जिस पर काली परछाई का साया हो, वो भी अमावस के दूसरे दिन, फिर तुम्हे जीवन और तुम्हारी परछाई वापस मिल जाएगा, ऐसा सुना है मैंने, इतना कहकर शर्मा जी बोले अब में चलता हूं। और वो उठकर चल दिये मैंने भी दरवाजा लगाया और तुरंत किचन से मुट्ठी भर सरसो के दाने लेकर लेट गया और अब सब कुछ साफ हो चुका था, उस अमावस की दोपहर को दरवाजे पर वही काली परछाई दिखी थी ये सोचते सोचते मेरी नज़र परछाई पर गयी और क्या देखता हूं मेरी परछाई का आयाम घटकर आधा रह गया है, मैं घबरा गया अब क्या होगा आज तो दूसरा दिन है, उन्होंने आज ही सब कहानी क्यो बताई, आज क्यो आये वो पहले दिन ही सब कुछ क्यो नही बताया? ये सोच ही रहा था तभी याद आया कि मैंने आजतक शर्मा जी की परछाई तो देखी ही नही, अब मेरा डर सातवे आसमसन पर था। डरते डरते मैंने हनुमान चालीसा का मनन किया और कब आंख लगी पता ही नही चला।

ऐसे ही डर के साये में चौहदवा दिन भी आ गया , मैं रोज अपनी परछाई के आयाम को घटता हुआ देख रहा था। शर्मा जी उस दिन के बाद दुबारा दिखे नही, अपनी परछाई पर नज़र डाली तो उसका आयाम अब शून्य हो चुका था, मैं घबरा गया कल पूर्णिमा की रात है और कल मेरी मृत्यु निश्चित है, मैंने हिम्मत बांधी और सोचा चलो शर्मा जी से उनके घर पर ही मिलकर आता हूं वो ही अब कुछ उपाय बता सकते है, मैंने उनके घर का दरवाजा खटखटाया एक महिला ने दरवाजा खोला,मैंने उनसे पूछा शर्मा जी है घर पर वो बोली शहर में नए आये हो ,आखिरी बार कब मिले थे शर्मा जी से। मैंने कहा यही 12 दिन पहले, वो रोते हुए बोली क्यो मजाक करते हो उनको तो साल भर पहले ही काली परछाई अपने साथ ले गयी काश की उस समय मैं शर्मा जी को अकेला छोड़कर अपने पीहर ना जाती तो वो आज हमारे साथ होते।

मैंने कहा नही मैं सच बोल रहा हु, आप अपने शर्मा जी की तस्वीर दिखाए कौनसे शर्मा जी है आपके। फिर में अंदर गया सामने शर्मा जी की तस्वीर थी उस पर उनके मृत्यु की तारीख लिखी थी और फूलों की माला पड़ी थी , वो बोली कल इनकी बरसी है, और उनकी तस्वीर की परछाई की और इशारा करते हुए कहा शायद कल ये वापस आ जाये, मैंने तस्वीर की परछाई को देखा वो परछाई पूरी हो चुकी थी पूरी शर्मा जी जैसे दिख रही थी और मुझको कुटिल हँसी वाले चेहरे से घूर रही थी, महिला बोली जाओ आलोक भाई कल की तैयारी करो काली परछाई तुम्हे लेकर मेरे शर्मा जी वापस कर देगी। अच्छा हुआ जो उस दिन दोपहर को मैं तुम्हारा दरवाजा खटखटाकर वहा से चली गयी और तुम्हारे दरवाजा खोलते ही वो काली परछाई तुम्हारे घर मे प्रवेश कर गई।

 मैं डरा सहमा मायूस सा घर वापस आ गया, और अपनी मृत्यु की घड़ियां गिनने लगा। तभी मेरी नज़र अखबार पर पड़ी, उसमे कल होने वाले चन्द्रग्रहण की खबर पढ़कर मैंने सारी योजना बना ली। और अगले दिन का इन्तेजार करने लगा ।

आज पूर्णिमा की रात थी काली परछाई ने अपना खेल दिखाना शुरू कर दिया था, मेरी परछाई तो अब उसके कब्जे में थी, अब उसे मेरी आत्मा चाहिए थी, उसने मुझ पर हमला शुरू कर दिया वो बहुत विकराल हो चुकी थी, में उससे छुपते हुए बचते हुए चन्द्रग्रहण का इन्तेजार कर रहा था, किचन से सरसो के दाने साथ रखे थे मैंने जिससे वो मेरे नजदीक नही आ पा रही थी , पर उसके प्रहार जारी थे, मेरी नज़रे घड़ी पर थी कब चन्द्रग्रहण का समय होगा और कब में अपने पीछे उसको छत पर ले जाऊंगा क्योकि पूर्णिमा के चांद की रोशनी में वो कभी मेरे पीछे नही आएगी, और इतने में वो समय आ गया मैं तेज़ी से छत की और भागा हड़बड़ाहट में सरसों के दाने मेरे हाथ से गिर गए, मैं जैसे तैसे छत पर पहुँचा चन्द्रग्रहण हो चुका था वो भी मेरे पीछे छत पर थी। क्योकि अब मेरे पास बचाव के लिए सरसो के दाने नही थे तो वो मुझ पर हावी होने लगी और मेरी आत्मा को मुझसे अलग करने लगी, उसी क्षण चन्द्रग्रहण पूर्ण हुआ और चंद्र की पहली किरण से वो जलने लगी और कुछ ही पल में वो भस्म हो गयी।

इस तरह मेरी जान भी बची और शहर भी श्राप मुक्त हो गया।


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