anil kumar

Classics Fantasy


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श्रीराम की बहन

श्रीराम की बहन

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      ये कथा बहुत सी प्रचलित दंतकथाओं और समय – समय पर भिन्न भिन्न व्यक्तियों द्वारा लिखी गयी रामायण की कहानियों पर आधारित है । इसमें रचनात्मक स्वतंत्रता ली गई हैं । अभी तक विभिन्न भाषाओं में लगभग 300 से अधिक रामायण विभिन्न नामों से लिखी जा चुकी हैं । उन्हीं में से एक प्रसंग को आपके सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास किया है ।

 

    इसमें अगर कोई त्रुटि हो तो उसके लिए क्षमापार्थी हूँ ।ये प्रसंग श्रीराम की बहन से जुड़ा हैं । अधिकांशतः हम सबको यही पता है कि श्रीराम के तीन भाई थे, बहन कोई नहीं थी । परंतु शायद कुछ को पता है कि उनकी एक बड़ी बहन भी थी ।


     जनता के समक्ष राम की बहन ने कभी भी किसी को नहीं पता चलने दिया कि वो राजा दशरथ और कौशल्‍या की पुत्री हैं। यही कारण है कि रामायण या रामचरित मानस में उनका खास उल्लेख नहीं मिलता है।

    कहते हैं कि जीवन भर राम की बहन राह देखती रही अपने भाइयों की कि वे कभी तो उससे मिलने आएंगे, पर कोई नहीं गया उसका हाल-चाल जानने। मर्यादा पुरुषोत्तम भी नहीं ।


   कौन थी ये बहन ? क्या था इनका नाम? कहाँ रही ये जीवन भर ? चलिए जानते हैं इनके बारे में ।

   दक्षिण भारत में रचित एक रामायण के अनुसार राम की बहन का नाम शांता था, जिनका जन्म श्रीराम से भी पहले हुआ था अर्थात वो सभी भाइयो में बड़ी थीं। शांता राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री थीं ।

श्रीराम की बड़ी बहन का पालन-पोषण राजा रोमपद और उनकी पत्नी वर्षिणी ने किया, जो महारानी कौशल्या की बहन अर्थात शांता और श्रीराम की मौसी थीं। राजा रोमपद अंगदेश के राजा थे ।

 ऐसा क्या हुआ जो शांता का लालन पालन उनकी मौसी को करना पड़ा । राजा दशरथ की क्या मजबूरी रही जो वो अपनी पुत्री को अपने साथ नहीं रख सके ।


 शांता अत्यधिक सुंदर और वेद, शिल्प व अन्य कलाओं में निपुण थी । कहा ये जाता हैं कि शांता जब पैदा हुई, तब अयोध्‍या में कई वर्षों तक अकाल पड़ा । इससे राजा दशरथ बहुत ही चिंतित रहने लगे, उन्होंने इसका उपाय ढूंढने के बहुत प्रयास किए और लगभग सभी ने उनको सलाह दी कि उनकी पुत्री शां‍ता ही अकाल का कारण है। 


    यह सुन राजा दशरथ असमंजस में पड़ गए क्या किया जाए । तभी उन्हें राजा रोमपद को दिया वचन याद आया । कुछ समय पूर्व की ही बात है वर्षिणी नि:संतान थीं तथा एक बार अयोध्या में उन्होंने हंसी-हंसी में ही बच्चे की मांग की। दशरथ भी मान गए। रघुकुल का दिया गया वचन निभाने के लिए शांता अंगदेश की राजकुमारी बन गईं। राजा दशरथ ने अकाल दूर करने के लिए अपनी  पुत्री शांता को वर्षिणी को दान कर दिया। उसके बाद शां‍ता कभी अयोध्‍या नहीं आई। कहते हैं कि दशरथ उसे अयोध्या बुलाने से डरते थे इसलिए कि कहीं फिर से अकाल नहीं पड़ जाए।


    शांता का विवाह महर्षि विभाण्डक के पुत्र ऋंग ऋषि से हुआ था। एक बार इंद्रदेव का एक भक्त मदद मांगने के लिए राजा रोमपद के पास गया, तब राजा रोमपद ने उसकी बात पर ध्‍यान नहीं दिया। अपने भक्‍त के अपमान पर गुस्‍साए इंद्रदेव ने बारिश नहीं होने दी, जिस वजह से वहाँ सूखा पड़ गया। तब राजा ने ऋंग ऋषि को यज्ञ करने के लिए बुलाया। यज्ञ के बाद भारी वर्षा हुई। जनता इतनी खुश हुई कि अंगदेश में खुशी का पर्व मनाया गया। तभी वर्षिणी और रोमपद ने अपनी गोद ली हुई बेटी शां‍ता का हाथ ऋंग ऋषि को देने का फैसला किया।


   वहीं राजा दशरथ और इनकी तीनों रानियां इस बात को लेकर चिंतित रहती थीं कि पुत्र नहीं होने पर उत्तराधिकारी कौन होगा। इनकी चिंता दूर करने के लिए ऋषि वशिष्ठ सलाह देते हैं कि आप अपने दामाद ऋंग ऋषि से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाएं। इससे पुत्र की प्राप्ति होगी।


    दशरथ ने उनके मंत्री सुमंत की सलाह पर पुत्रकामेष्ठि यज्ञ में कई महान ऋषियों को बुलाया। इस यज्ञ में दशरथ ने ऋंग ऋषि को भी बुलाया। सुमंत ने ऋंग को मुख्य ऋषि बनने के लिए कहा। ऋंग ऋषि बहुत ही प्रतापी थे । उनके चरण जहाँ पड़ते थे वहाँ सदैव मंगल ही होता था ।


   पहले तो ऋंग ऋषि ने यज्ञ करने से इंकार किया लेकिन बाद में शांता के कहने पर ही ऋंग ऋषि राजा दशरथ के लिए पुत्रकामेष्ठि यज्ञ करने के लिए तैयार हो गए।



    परंतु दशरथ ने केवल ऋंग ऋषि को ही आमंत्रित किया लेकिन ऋंग ऋषि ने कहा कि मैं अकेला नहीं आ सकता। मेरी पत्नी शांता को भी आना पड़ेगा। ऋंग ऋषि की यह बात जानकर राजा दशरथ विचार में पड़ गए, क्योंकि उनके मन में अभी तक शांता को लेकर एक डर का भाव था, कि कहीं शांता के अयोध्या में आने से फिर से अकाल नहीं पड़ जाए।


    फिर उन्होंने विचार किया कि ऋंग ऋषि के बिना ये यज्ञ सफल नहीं हो पायेगा और मंत्रियों की सलाह पर, पुत्र कामना में आतुर राजा दशरथ ने संदेश भिजवाया कि शांता भी आ जाए। शांता तथा ऋंग ऋषि अयोध्या पहुंचे। शांता के पहुंचते ही अयोध्या में मेघ बरसने लगे और चारो ओर पुष्प वर्षा होने लगी । दशरथ कुछ समझ ना पाए ये कैसी माया है तब शांता ने दशरथ के चरण स्पर्श किए। दशरथ ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि 'हे देवी, आप कौन हैं? आपके पांव रखते ही चारों ओर वसंत छा गया है।' तब शांता ने बताया कि 'वो उनकी पुत्री शांता है।' दशरथ और कौशल्या यह जानकर अधिक प्रसन्न हुए। वर्षों बाद दोनों ने अपनी बेटी को देखा था।

 तब ऋंग ऋषि ने पुत्रकामेष्ठि यज्ञ किया तथा इसी से भगवान राम तथा शांता के अन्य भाइयों का जन्म हुआ। 



    ऐसा कथन प्रचलित हैं कि पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने वाले का जीवनभर का पुण्य इस यज्ञ की आहुति में नष्ट हो जाता है। इस पुण्य के बदले ही राजा दशरथ को पुत्रों की प्राप्ति हुई। ऋंग ऋषि फिर से पुण्य अर्जित करने के लिए अपनी पत्नी समेत वन में जाकर तपस्या करने लगे।

ऐसा कहा जाता हैं कि वनवास के समय श्रीराम अपनी बहन शांता के आश्रम के पास से भी गुजरे थे परंतु कभी भी बहन से मिलने नही गए ।

                

          



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