anil kumar

Classics Inspirational


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anil kumar

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तुलसीदास-राम मिलन

तुलसीदास-राम मिलन

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        तुलसीदास जी परम् राम भक्त थे, वो प्रतिदिन रामचरित मानस गाते थे, जिस जगह वे रामचरित मानस गाते थे वहाँ प्रतिदिन बहुत से लोग सुनने आया करते थे । जहाँ वो गाते थे वो जगह थी अस्सीघाट, काशी में हैं ये जगह, अभी भी विद्यमान हैं ।

        तुलसीदास जी रोज सवेरे स्नान इत्यादि करके जब गंगा जी से बाहर आते थे तो अपने साथ एक लौटे में जल लेकर निकलते थे और रास्ते मे एक पेड़ पड़ता था, प्रतिदिन उस पेड़ पर जल चढ़ाकर उसका सिंचन करते थे । उस पेड़ पर एक प्रेत रहता था ।

        एक दिन तुलसी जी ऐसे ही प्रतिदिन की तरह जा रहे थे पेड़ पर जल चढ़ा कर, तभी अचानक वो प्रेत उनके सामने आ गया और बोला तुम ये रोज जो इस पेड़ पर जल चढ़ाकर इसका सिंचन करते हो ना इससे मैं बड़ा प्रसन्न हूँ। मांगो जो मांगना हैं ।

        तुलसी जी तो प्रभु राम के परम् भक्त, भक्त शिरोमणि थे । उनको तो बस प्रभु राम के दर्शन करने थे । उन्होंने मन ही मन सोचा आज अच्छा अवसर मिला हैं अपने मन की बात कह ही देता हूँ । ये सोचकर तुलसी जी बोले – भैया, हमारे मन तो केवल एक ही चाह है कि प्रभु श्रीराम जी के दर्शन हमें हो जाए। राम की कथा तो हमने लिख दी है, गा दी है। पर दर्शन अभी तक साक्षात् नहीं हुए हैं। ह्रदय में तो होते हैं पर साक्षात् नहीं होते। यदि दर्शन हो जाए तो बस बड़ी कृपा होगी।

          ये सुनकर प्रेत कुछ सोच में पड़ गया और बोला अगर में प्रभु श्रीराम जी के दर्शन करा सकता तो स्वयं दर्शन करके प्रेत योनि से मुक्त ना हो जाता ।

        तुलसीदास जी बोले – फिर भैया हमको कुछ नहीं चाहिए।

तो उस प्रेत ने कहा – सुनिए महाराज! मैं आपको दर्शन तो नहीं करवा सकता लेकिन दर्शन कैसे होंगे उसका रास्ता आपको बता सकता हूँ।

तुलसीदास जी बोले कि बताइये।

बोले आप जहाँ पर कथा कहते हो, बहुत सारे भक्त सुनने आते हैं, अब आपको तो मालूम नहीं लेकिन मैं जानता हूँ आपकी कथा में रोज हनुमानजी भी सुनने आते हैं। मुझे मालूम है हनुमानजी रोज आते हैं।

और हनुमान जी ही हैं जो प्रभु के दर्शन करा सकते हैं ।

         इस पर तुलसी जी बोले - मैं उन्हें कैसे पहचान पाऊँगा ?

           प्रेत ने बताया कि सबसे पीछे कम्बल ओढ़कर, एक दीन हीन एक कोढ़ी के स्वरूप में व्यक्ति बैठता है। उनके पैर पकड़ लेना वो हनुमान जी ही हैं।

        तुलसी जी बड़े खुश हुए और वहाँ से खुशी खुशी प्रभु दर्शन की इच्छा मन में लिए चल दिये कथा सुनाने अस्सीघाट पर ।

         आज जब से कथा शुरू हुई , तुलसीदासजी की नजर उसी व्यक्ति पर है कि वो कब आएंगे? और जैसे ही वो व्यक्ति आकर बैठे पीछे, तो तुलसी जी अपने आसन से कूद पड़े हैं और दौड़ पड़े। जाकर चरणों में गिर गए ।

           वो व्यक्ति बोला कि महाराज आप व्यासपीठ पर हो और मेरे चरण पकड़ रहे हो। मैं एक दीन हीन कोढ़ी व्यक्ति हूँ। मुझे तो न कोई प्रणाम करता है और न कोई स्पर्श करता है। आप व्यासपीठ छोड़कर मुझे प्रणाम कर रहे हो?

         तुलसीदास जी बोले कि महाराज आप सबसे छुप सकते हो मुझसे नहीं छुप सकते हो। अब आपके चरण मैं तब तक नहीं छोडूंगा जब तक आप प्रभु श्रीराम से नहीं मिलवाओगे। जो ऐसा कहा तो हनुमानजी अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हो गए।

        आज तुलसीदास जी ने कहा कि कृपा करके मुझे प्रभु श्रीराम जी से मिलवा दो। अब और कोई अभिलाषा नहीं बची हैं। राम जी के साक्षात दर्शन हो जाए हनुमानजी, आप तो राम जी से मिलवा सकते हो। अगर आप नहीं मिलवाओगे तो कौन मिलवायेगा?

         हनुमानजी बोले कि आपको रामजी जरूर मिलेंगे और मैं मिलवाऊँगा लेकिन उसके लिए आपको चित्रकूट चलना पड़ेगा, वहाँ आपको भगवन मिलेंगे।

        तुलसीदासजी चित्रकूट गए हैं। मन्दाकिनी जी में स्नान किया और अब घूम रहे हैं कहाँ मिलेंगे? कहाँ मिलेंगे?

            

         सामने से घोड़े पर सवार होकर दो सुकुमार राजकुमार कांधे पर धनुष बाण लिए हुए आये। एक गौर वर्ण और एक श्याम वर्ण और तुलसीदासजी इधर से निकल रहे हैं। उन्होंने पूछा कि हमको रास्ता बता तो हम भटक रहे हैं।

          तुलसीदासजी ने रास्ता बताया कि बेटा इधर से निकल जाओ और वो निकल गए। अब तुलसीजी पागलों की तरह खोजते हुए घूम रहे हैं कब मिलेंगे? कब मिलेंगे?

हनुमानजी प्रकट हुए और बोले कि मिले?

               तुलसीदासजी बोले – कहाँ मिले? मुझे तो अभी तक दर्शन नही हुए और आप पूछ रहे हो कि मिले क्या प्रभु, क्यो हंसी उड़ाते हो मेरी ।

             इस पर हनुमान जी बोले कि मैं हंसी नही उड़ा रहा आपकी, अभी जो दो राजकुमार आपसे रस्ता पूछ रहे थे वो ही तो थे रघुबीर और लक्षमण जी । आप चूक गए तुलसी जी, प्रभु को पहचान नही पाए। ऐसे ही पता नही प्रभु कितनी बार कितने रूपो में हमसे मिलने आते हैं और हम मूर्ख उन्हें पहचान नहीं पाते हैं ।

          इसलिए कहा गया है कि -

          सबका कर आदर सम्मान जो तेरे घर आये।

          न जाने किस रूप में नारायण मिल जाये।।

          तुलसीदास जी ने हनुमान जी के पैर पकड़ लिए और कहा कि आज बहुत बड़ी गलती हो गई। फिर कृपा करवाओ। फिर मिलवाओ।

           

           हनुमानजी बोले कि थोड़ा धैर्य रखो। एक बार फिर मिलेंगे। प्रभु भक्तों को निराश नहीं करते हैं ।

          

           अब अगले दिन फिर से तुलसीदास जी मन्दाकिनी के तट पर स्नान करके बैठे हैं और घाट पर चन्दन घिस रहे हैं। मगन हैं और प्रभु श्रीराम जी के भजन गा रहे हैं। श्री राम जय राम जय जय राम। ह्रदय में एक ही लग्न है कि भगवान कब आएंगे।

           और प्रभु श्रीराम जी एक बार फिर से कृपा करते हैं। प्रभु जी एक बालक के रूप में आते है और कहते हैं बाबा.. बाबा… चन्दन तो आपने बहुत प्यारा घिसा है। थोड़ा सा चन्दन हमें दे दो… लगा दो।

            तुलसीदास जी को लगा कि कोई बालक होगा। चन्दन घिसते देखा तो आ गया। तो तुरंत लेकर चन्दन प्रभु श्रीराम जी को दिया और प्रभु श्रीराम जी लगाने लगे ।

        हनुमानजी महाराज समझ गए कि आज तुलसी जी फिर चूके जा रहे हैं। आज राम जी फिर से इनके हाथ से निकल रहे हैं।

          तभी हनुमानजी तोता बनकर आ गए और घोषणा कर दी कि-

          चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीर।

          तुलसीदास चंदन घिसे, तिलक देत रघुवीर।

           हनुमानजी की ये वाणी सुन कर तुलसीजी समझ गए कि जो उनसे चंदन ग्रहण कर रहे हैं वो साक्षात प्रभु श्रीराम जी हैं उनके आराध्य हैं । अब चूक नहीं होनी चाहिए इतना सोचकर तुलसीदास जी चरणों में गिर गए राम जी के, वो तो चन्दन लगा रहे थे। बोले प्रभु अब आपको नहीं छोडूंगा। जैसे ही पहचाना तो प्रभु अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हो गए हैं और कुछ ही पल में प्रभु श्रीराम जी अंतर्ध्यान हो गए और वो झलक तुलसी जी की आखों में बस गई ह्रदय तक उतरकर गई ।

            फिर कोई अभिलाषा जीवन में नहीं रही है। परम शांति। परम आनंद जीवन में आ गया श्रीराम जी के मिलने से।

            और इस तरह से आज तुलसीदास जी का राम से मिलन हनुमानजी ने करवाया है। जय सियाराम!!

     समय खाली मिले तो, एक काम कर ले ।

     भज ले नाम राम का , तू राम राम कर ले ।।

              

           यह घटनाक्रम विभिन्न दंतकथाओं और पुराणों के आधार पर लिखा गया हैं, इसमे रचनात्मक स्वतंत्रता ली गई हैं।

किसी भी त्रुटि के लिए क्षमापार्थी हूँ ।

              जय सियाराम

           


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