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Sushma s Chundawat

Drama Inspirational


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Sushma s Chundawat

Drama Inspirational


जहाँ चाह, वहाँ राह

जहाँ चाह, वहाँ राह

4 mins 122 4 mins 122

-"क्या कर रही हो बेटा ?"

-"कुछ नहीं पापा, बस ऐसे ही मूवी देख रही थी।"

-"तुम्हारा मन तो लग रहा है ना ?"

"हाँ पापा...और वैसे भी ऐसी संभावना तो नहीं दिख रही कि ये कोरोना और लॉकडाउन ज्यादा समय तक चलेगा तो फिर से ऑफिस के कामों में बिजी हो जाऊंगी, इसलिए अभी इंजॉय कर रही हूँ। "-मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

मैं, प्रियांशी...एमबीए करने के बाद मुझे अभी दो-तीन महीने ही हुए थे, कंपनी जॉइन किये हुए कि कोरोना महामारी के चलते सभी जगह लॉकडाउन लग गया।

अब मैं घर रहते हुए 'वर्क फ्रॉम होम' कर रही थी। मार्च माह में लग रहा था कि लॉकडाउन खत्म हो जाएगा मगर कहते हैं ना कि इंसान के हाथ में सब कुछ नहीं होता, कुछ चीजें सिर्फ कुदरत के हाथों में होती हैं !

एक छोटे से वायरस ने भारी तबाही मचाई थी और मानव जाति को घर में कैद होने को विवश कर दिया। 

मुझे घर आये हुए एक महिने से ऊपर हो गया था और लॉकडाउन अभी भी जारी था। उधर दुसरे देशों में भी कोरोना का प्रकोप बढ़ता ही जा रहा था। समूचे विश्व की अर्थव्यवस्था इस महामारी और अनिश्चित काल तक जारी लॉकडाउन की वज़ह से डांंवाडोल हो गयी थी। 

मैं जिस कंपनी में कार्यरत थी, उस कंपनी ने लॉकडाउन से हुए आर्थिक घाटे की वज़ह से पुराने विश्वसनीय कर्मचारियों को छोड़कर अन्य स्टाफ को कार्यमुक्त कर दिया। 

मेरी भी नौकरी चली गयी !

"अब?? ऐसे ही तो घर में पुरे-पुरे दिन, बिना कुछ किये नहीं बैठ सकती थी मैं ! पापा ने लोन लेकर अच्छे कॉलेज से एमबीए करवाया था, मगर इस कोरोना की वज़ह से ना जाने कब ज़िन्दगी वापस पटरी पर लौटे ।"- मैं सोच में डूबी हुई थी।

लॉकडाउन के पहले चरण में तो मैंने अपनी रूचि के बहुत सारे काम किये थे जैसे कहानी, कविता, लघुकथाएं लिखना... इनमें से कई रचनाएँ प्रकाशित और पुरस्कृत भी हुई थी। इसके अलावा कुकिंग, डांसिंग, सिंगिंग...हर उस काम को किया जिन्हें नौकरी के चलते पर्याप्त खाली समय ना मिलने की वज़ह से नहीं कर पा रही थी मगर अब मुझे कुछ ऐसा करना था जिससे इस विपरित परिस्थिति में भी कुछ आय हो सके।

मगर काफी माथापच्ची करने के बाद भी मुझे समझ नहीं आ रहा था कि कैसे अपने आपको सकारात्मक रखते हुए कोई आय का जरिया ढूँढू !

इस लॉकडाउन ने तो अच्छे-खासे बिजनेस भी डॉउन कर दिये थे तो मैं ऐसा क्या करूँ कि मुझे इस कठिन समय में भी मुनाफा हो।

मैं अपने घर की बाल्कनी में बैठी विचारों के सागर में गोते लगा रही थी कि तभी मेरी नज़र सामने रहने वाले पडौसी के बेटे मिन्टू पर जा टिकी।

वो रंगीन पेन से अपने घर के बाहर वाली दीवार को रंग रहा था।

"अरे ! पेंटर बाबू...ये क्या कर रहे हो??"- मैंने उसे आवाज़ लगायी।

वो खुश होता हुआ मुझे बताने लगा कि उसने क्या-क्या ड्रॉइंग बनायी !

मैं भी अपना मूड ठीक करने के लिए उससे बातें करने लगी। सच्ची, जब मन उदास हो ना, तब किसी छोटे बच्चे के साथ थोड़ा वक्त गुजारना चाहिए... सारी उदासी छू-मंतर हो जाती है ।

मिन्टू से बात करने के बाद मेरा मन थोड़ा हल्का हो गया था। शांत मन से मैं वापस अपने रूम में आयी और सोचने लगी कि क्या करूँ।

तभी मुझे मिन्टू का ख्याल आया, वो चित्र बना रहा था ! मुझे भी चित्रकारी बहुत पसंद थी और मैं अच्छी पेंटिंग भी कर लेती थी तो क्या मैं इस खाली समय में पेंटिंग बनाना शुरू कर दूं? क्या पता पेंटिंग्स की बिक्री हो जाए !

नहीं...नहीं...कोरोना काल में पेंटिंग कौन खरीदेगा !! ऑनलाइन बिकना भी मुश्किल है और इस समय तो बहुत से चित्रकार भी फ्री ही होंगे तो वो भी यही काम करेंगे... मुझे कुछ नया सोचना पड़ेगा ।

फिर क्या कर सकती हूँ...मन-मस्तिष्क में विचारों का झंझावत चालू था फिर आखिरकार एक आइडिया सूझ ही गया। 

मैंने कपड़े के सादे मास्क खरीदे और उन पर मधुबनी पेंटिंग बनाना शुरू किया।

अब तक मार्केट में इस प्रकार के मास्क बिक्री हेतु नहीं आये थे । तरह-तरह की खूबसूरत पेंटिंग से सजे ये मास्क युवा वर्ग को काफी पसंद आये और मुझे ऑर्डर मिलने शुरू हो गए।

अखबार में मेरे द्वारा बनाये मधुबनी पेंटिंग मास्क की तस्वीर भी प्रकाशित हुई थी।

 मेरे जैसे अनेक युवा थे जिन्होंने कोरोना महामारी के चलते नौकरियां खोई मगर ऐसी विपरित परिस्थितियों में भी धैर्य ना खोते हुए उन्होंने अपनी ऊर्जा को ऐसे कार्यों में लगाया जिससे उन्हें मुनाफा भी हुआ और व्यक्तित्व का विकास भी।

ऐसे युवाओं की वज़ह से ही इंडिया धीरे-धीरे आत्मनिर्भर भारत में तब्दील हो रहा है। 


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