जब से मिले नैना
जब से मिले नैना
डाण्डियों की टकराहट के साथ ही साथ गौरी, शिव के दिल में उतरती जा रही थी, कितनी खूबसूरत और मासूम है ये, जानता तो इसे चार साल से हूँ, पर देखा तो आज पहली ही बार है।
चार साल पहले ऐसे ही नवरात्र में रंगारंग कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, जहाँ गायन प्रतियोगिता रखी गयी थी और मैं उसमें जीता था, मेरे आवाज की कशिश ने गौरी को शिव का दीवाना बना दिया था और उसी दिन से इसने मुझसे अपनी चाहत का इजहार करना शुरु कर दिया था, और मैं बड़ी निष्ठुरता से इसके प्रस्ताव को ठोकर मार देता था, पर गौरी तो गौरी ही थी एक बार जो ठान लिया फिर उसे तपस्या करके पाना ही था।
सच कहूँ गौरी प्रेम तो मेरे दिल में भी बहुत था तुम्हारे लिए पर डरता था कि जिसकी जिन्दगी में खुद अंधेरा हो वो तुम्हारे आँचल में खुशियाँ कहाँ से भरेगा, सबको जब तुम्हारी चाहत का पता चला तो सब खिलाफ भी तो थे तुम्हारे, पर तुमने किसी की नहीं सुनी और दिन-रात मेरी खुशियों के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती रही।
ये तुम्हारी पवित्र दुआओं का ही तो असर है, जो किसी सज्जन परिवार ने एक महीने पहले परमात्मा में विलीन हो चुके अपने पिता की आँखों को दान कर मुझ अंधे की जिन्दगी में उजाले की किरण फैला दी और शिव को गौरी से मिलने की राह दिखा दी।
"शिव, सुनो डांडिया खत्म होने के बाद हमारे एंगेजमेंट की अनाउंसमेंट है तुम खुश हो न शिव।"
"हाँ गौरी आज तुम्हें जो पूछना है मेरे नैनों से पूछ लो, तुम्हारे सारे सवालों का जवाब आज मेरे नैन ही देंगे।"
"तो फिर शिव जिन्दगी भर मेरा साथ दोगे न।"
"हाँ गौरी, शिव से गौरी को तो जिन्दगी के बाद भी कोई अलग नहीं कर पाया है फिर जिन्दगी भर कोई कैसे अलग करेगा।"
"ओहो, मेरे शिव"
"हाँ, मेरी गौरी सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा शिव।"

