इत्तफ़ाक
इत्तफ़ाक
बराबर ट्रेन छुटने ही वाली थी की मैं रेल्वे स्टेशन में दाख़िल हुई बोगी भी ढूँढनी थी टिकट भी लेना था, तो भागंभागी में पता नहीं किसीसे टकरा गई वो सौरी सौरी बोलता रहा पर मेरा सिफ़ोन का दुपट्टा उसकी घड़ी में एैसे उलझ गया कितना झोर लगाया निकल ही नहीं रहा था फटने लगा तो वो बोला आराम से कोशिश करते है निकल जाएगा, मेरी आँखों में आँसू आ गये मेरे पास इतना समय नहीं मेरी ट्रेन छूटने वाली है ओर मेरा जाना ज़रुरी है..!
ओर स्लीवलैस ड्रेस था बिना दुपट्टा रह नहीं सकती थी तो उस अजनबी ने मेरी द्विधा समझ ली, मेरे आँसू पौंछते घड़ी उतारकर मेरे हाथ में रखकर बोला please go Harry up मैं किसी भी किंमत पर ट्रेन मिस नहीं कर सकती थी क्यूँकि पापा को हार्ट अटैक आया था मम्मी को मेरी ज़रुरत थी, तो बिना कुछ सोचे दुपट्टे के साथ बंधी घड़ी लेकर ट्रेन में चढ़ गई,जैसे ही सीट पर बैठी ट्रेन चल पड़ी..!
साँस हल्की होते ही दिमाग चलने लगा अरे ये मैंने क्या कर दिया किसीकी इतनी मेहंगी घड़ी उठाकर चली आई।
क्या सोचता होगा वो की कैसी लड़की थी घड़ी लेकर चली गई, पर उसका ख़याल आया तो दिल राजधानी की रफ़्तार से धड़क उठा, हाये कितना हेन्डसम लड़का था काश कि किसी ओर परिस्थिति में मिला होता।
ना नाम, ना पता, ना मोबाइल नं घड़ी वापस भी कैसे करुंगी,
पर अब क्या हो सकता है दिल को टपार दिया ओये पगले यूँ अजनबी से इतनी प्रीत अच्छी नहीं,
काश कभी उसे मिल पाऊँ तो थेंक्स भी बोल दूँ ओर घड़ी भी वापस कर दूँ पर
मुंबई जैसे शहर में दोबारा उसका मिलना संभव भी तो नहीं, उसके हसीन खयालों में ही सफ़र कट गया..!
मैं अहमदाबाद पहूँच गई पापा को मिली, तो जान में जान आई डोक्टर से भी मिली अब पापा खतरे से बाहर थे ओर कुछ ठिक भी थे, मम्मी के चेहरे पर भी कुछ सुकून आ गया।
मैं मुंबई में जाॅब कर रही हूँ माँ पापा की इकलौती संतान हूँ, पापा का मन नहीं था पर MBA पूरा करने के बाद मुंबई की एक बढ़िया कंपनी में जाॅब आॅफर हुई तो मैंने ज़िद करके पापा को मना लिया ओर चली गई,
स्टेशन पर हुआ वाकिया मोम पापा को सुनाया तो दोनो हंस पड़े ओर पापा बोले कहीं घड़ी वाले कोे मेरी बेटी पसंद तो नहीं आ गई की इतनी महंगी घड़ी लूटाकर चला गया।
मैं मन ही मन बोली पापा उसका तो पता नहीं पर आपकी बेटी को वो ज़रुर पसंद आ गया था, एक आह निकल गई बस..!
पर इस बार मैं टाल नहीं सकी मम्मी पापा बहुत ज़ोर देने लगे, बेटी शादी के लिए हाँ बोल दे तुझे अच्छा घर ओर वर मिल जाए तो हम दोनों की चिंता कम हो जाए,
तो मैंने बोल दिया ठिक है आप लोग अभियान शुरु किजिए कोई ढ़ंग का लड़का पसंद आएगा तो चली जाऊँगी ओर क्या..!
पापा के ठिक होते ही मैं वापस मुंबई आ गई।
लगभग ६ महीने बाद मोम का फोन आया की कुछ दिनों की छुट्टी लेकर आ जा तीन चार लड़को से तेरी बात चला रखी है मिल लो ओर फिर पसंद आए तो आगे बढ़ेंगे,
उम्र भी तो हो रही थी ओर मोम पापा की चिंता भी हल्की करनी थी तो सोचा चलो मिल तो लूँ क्या पता अब शादी वाले ग्रहों को जल्दी हो सो कोई चक्कर चल जाए।
ओर कुछ दिन की छुट्टी लेकर आ गई घर, रोज एक लड़के से मुलाकात होती रही, ठिकठाक थे एक दो दिल को भा भी रहे थे, बस आज आख़री लड़के से मिलना था पर ये बंदा कुछ हटके था, उसने कहलवाया की वो किसीके घर में नहीं बल्कि किसी रेस्टोरेंट में मिलना चाहता है वो भी सब घर वालों के सामने नहीं वो ओर मैं अकेले, हमने कहा ठिक है चलो इस अजीब इंसान से भी मिल लेते है..!
उसने टेबल बूक करवाकर रेस्टोरेंट का नाम पता ओर टेबल नं. भेज दिया शाम ६ बजे एकदम झक्कास तैयार होके मैं भी पहूँचे गई वेटर से पूछा टेबल नं, टेबल पर एक लड़का बैठा हुआ था पीठ पीछे से तो अंदाज़ लग रहा था की हाँ दिखने में हेन्डशम होगा, चलो देखते है मैं धीरे से टेबल की ओर बढ़ी ओर हाय I m vini sharma बोलते उसके सामने गई वो नज़र नीची किये मोबाइल में गेम खेल रहा था मेरी आवाज़ सुनकर चौंककर खड़ा हो गया ओह हैलो I m vivan Singh हम दोनों एक दूसरे को देखते ही ६ महीने पीछे रेल्वे स्टेशन पे पहूँच गये दोनों के मुँह से एक जैसे ही शब्द निकल पड़े omg तुम ?
ज़िंदगी में इत्तेफ़ाक भी होते है..!
हम दोनों को ही क्या बोले क्या नहीं कुछ समझ नहीं आ रहा था, तो उसने बड़े अदब से कुर्सी खिंचकर बड़े रिस्पेक्ट के साथ मुझे बैठने को बोला, में बैठ गई, बंदी तो ६ महीने पहले ही फ़िदा हो चली थी आज तो मन में लड्डू क्या सारी मिठाईयां फूट रही थी, फिर तो सेन्डविच ओर कोफ़ी पीते दोनों घंटा भर बातें करते रहे एक दूसरे को जाना, पहचाना वो बार-बार मेरी आँखों में खो जाता था हम दोनों ही इस इत्तेफाक से खुश थे..!
बहुत देर हो गई तो मोम का फोन आया तो विवान ने ही मेरे हाथ से मोबाइल लेके मोम को बोला मम्मी जी don't worry अब से ये तूफ़ान आपकी नहीं मेरी ज़िम्मेदारी है।
मैं कायल हो गई मेरे विवान की उसने मेरे गाल पर थपकी लगाते पूछा क्यूँ ये बंदा चलेगा ना तुम्हारा bodyguard बनने के लायक है की नहीं..!
मैं शरमाकर इतना ही बोली जब मेरे दुपट्टे से तुम्हारी घड़ी ने बंधन बाँध ही लिया है तो ये रब जी की ही मर्ज़ी है,बाकी मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था की इस जन्म में तुमसे कभी दोबारा भी मुलाकात होगी..!
ओर अलग-अलग आये हुए दो हमसफ़र साथ साथ एक नये सफ़र की ओर हाथ थामें चल निकले रेस्टोरेंट से निकलकर अपनी मंजिल की ओर....(तो ज़िंदगी में कभी मायूस मत होना होते है इत्तफ़ाक भी कभी-कभी।

