Bhavna Thaker

Tragedy Inspirational


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Bhavna Thaker

Tragedy Inspirational


हाँ सपने भी सच होते है

हाँ सपने भी सच होते है

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नींद से बोझिल पलकों के भीतर दिखने वाले आभासी सपनों में एक सपना मुझे बार बार झकझोर जाता था मेरे श्याम रंग और लघुताग्रंथी को लेकर समाज के हाथों और अपने ही परिवार के हाथों ज़लिल होते देखती थी सपने में खुद को तब सपने में भी हिल जाती थी।

और कोई मानें या ना मानें जो सपने में देखती थी बिलकुल वैसा ही व्यवहार कभी-कभी अपनों का रहता था मेरे प्रति, पर इस डरावने, उदास, कंटीले सपने के बीच एक रंगीन सपना भी झलक दिखला जाता था जैसे मेरी कामयाबी का जश्न मनाते मानो आसमान की चौखट पर दावत सजी है मैं कोई प्रसिद्ध व्यक्ति हूँ और सब मुझे बधाई देने के लिए बेताब है, मन के भीतर चाह तो पलती है काश की ये सपना कभी पूरा हो, 

पर दूर-दूर तक इस श्याम रंग को पोंछता हुआ एक भी रंग उत्सुक नहीं दिखाई दे रहा था हर पल दिलो दिमाग में असंख्य सवाल उड़ते रहते थे ज़िंदगी की दावत पर जन्मी मैं बस इतना एहसान रहा ज़िंदगी का मेरे उपर,फिर ज़िंदगी में कहीं ज़िंदगी दिखी ही नहीं मुझे।

एक अनचाही उम्मीद की तरह इस दुनिया में आई, हर किसी की आँखों में खटकती, एक तो मैं माँ-बाप की उम्मीदों से परे लड़के के बदले लड़की जन्मी उपर से श्याम वर्ण मेरा स्वागत मुस्कुराहटों की महफ़िल ने नहीं किया नहीं, मातम ओर उदासीन वातावरण में पहली साँस भरी। आँख खोलते ही दर्द की सांवली ओर गमगीन परछाइयों ने मुझे अपने वजूद में समेट लिया और शुरू हो गया जद्दोजहद से भरा जीने का सफर, जीना तो पड़ेगा ही, पर वो सपना मुझे हौसला दे जाता था कि शायद कोई चमत्कार हो और मेरा सपना सच हो जाए और मैं भी अपनों की नज़रों में ऊँची उठ पाऊँ।

बहुत बार एसा महसूस होता था कि

ज़िंदगी ऐसी है तो ये ज़िंदगी ही क्यूँ है ? सबकी नज़रों में उपेक्षित सी जीती रही, एक तो श्याम और कुरुप ऐसे में एक संकुचित मानसिकता से भर परिवार का हिस्सा होना मतलब अपने वजूद को पल-पल ध्वस्त होते देखना। 

मुझे जीने में कभी सुकून महसूस नहीं हुआ मैं अकेलेपन ओर तन्हाइयों के किले में कैद रही आज भी हूँ, लघुताग्रंथी से ग्रसित और मैं खुद को छोटी ओर बौनी समझती इस किले की चार दीवारी में सिमटकर रह गई थी, मैं खुद को एक नाकाम ओर दुनिया के ओर लोगों से बौना ही समझती रही।

मेरे खयालों ने, मेरे एहसासों ने कभी इन दीवारों को तोडने की, इनसे बाहर आने की कोशिश भी नहीं की,एक डर ओर झुंझलाहट दोनों से घिरी रहती थी हमेशा जैसे-जैसे बड़ी होती गई ये सारी नकारात्मक और गहरी होती गई।

जज़्बा तो था मेरे भीतर जो बाहर निकलने को बेताब था, सुंदर सपने के रोशन टुकड़े विद्रोह करते रहते थे उस डरावने सपने के साथ, पर जगी आँखों के साथ आगे बढ़ने की हिम्मत कहाँ से जुटलाऊँ मैं वो भोर हूँ जो रात के आधिपत्य के नीचे दबी उगने को बेकरार सी कोहरे की चादर लपेटे हमेशा धुँधली ही रही, ये मेरा वहम था या सच में थी मैं सबकी अनचाही कभी तय नहीं कर पाई।

कभी-कभी ऐसा महसूस होता था मेरी ज़िंदगी अंधेरी काली रातों की गुफा है जिसमें कोई रोशनदान नहीं, आसपास अपनों का मेला मगर कोई अपना नहीं। 

बस एक दर्द, एक तन्हाई है, और है एक बेमौत मरती-सी जिंदगी, जो मेरी साँसों के साथ- साथ अपना सफर तय कर रही है, बेमन से ढो रही हूँ खुद को। सच श्यामवर्ण ओर कुरुप होना कितना बड़ा गुनाह है हमेशा ऐसा ही समझती रही 

कई बार चाहा दिल ने की किस्मत कुछ ऐसा चमत्कार कर दें जो मेरे अस्तित्व को रेखांकित करे, मेरे अस्तित्व का आविष्कार हो मुझ में छिपे मेरे सकारात्मक वजूद को गौरवान्वित कर पाऊँ, मैं अपने रुप की कौन सी परिभाषा लिखूँ की जिसमें मुझे अपने श्याम होने पर शर्मिंदगी महसूस न हो सबकी नज़रों में उपर उठूँ।

वैसे उस हसीन सपने ने कभी मेरा दामन नहीं छोड़ा, उस सपने की आहट को कान हमेशा सुनते रहते थे कोई तो भोर ऐसी खिलेगी जो मेरे उस सपने को हक़ीकत में बदल कर मन के खालीपन को भर देंगी मेरी उदासियों को नोंचकर कहीं दूर फेंक देंगी और ख़ुशियों के लिबास से मेरे आज को, मेरे वर्तमान को सजा देंगी । 

और मुझे मुझ में बसी 'मैं' ने ही रास्ता दिखाया एक दिन मन उदास था कुछ सूझ नहीं रहा था तो अपनी अलमारी की सफ़ाई करने बैठ गई कपड़ों के नीचे दबी कुछ सालों पुरानी डायरी हाथ लगी, बचपन से एक डायरी में अपने अच्छे बुरे एहसास ओर अनुभव लिखती रहती थी पढ़ते-पढ़ते एक वाक्य पर आँखें अटक गई "मन का हारा मात खाता है, मन को जीता परचम लहराता है" कितने सारे सकारात्मक विचारों से सजी थी डायरी लिखने के लिए जब सोच इतनी विशाल तो असल ज़िंदगी में क्यूँ इतनी नकारात्मक हूँ मैं सोचने लगी।

हुनर को भीतर से उड़ेल कर तराशने की जरूरत है हर कोई तो दिखने में गोरे और सुंदर नहीं होते अपने व्यक्तित्व को आकर्षित करना पड़ता है पत्थर को हथौड़े और टंकण से तराशा जाता है तभी तो मूर्ति बनती है मैंने कभी खुद को तराशने की कोशिश ही नहीं की और एक ठोस निर्णय के साथ सबसे पहले पहुँच गई ब्यूटी पार्लर नखशिख तराश कर बदल लिया खुद को और आईने में देखा तो मानो मैं ही नहीं थी एक सुहाना रुप उभर आया था, आज पहली बार खुद के अंदर आत्मविश्वास महसूस हो रहा था 

खुश होती ऑटो लेकर घर जा रही थी कि रास्ते में सिग्नल पर ऑटो रुकी तो एक बोर्ड पर नज़र ठहरी, "लेखन प्रतियोगिता" पहला इनाम पाँच हज़ार रुपये, दूसरा तीन हज़ार, और तीसरा इनाम डेढ़ हज़ार रजिस्ट्रेशन के लिए इस नंबर पर काॅल करें, फ़टाफट नंबर मोबाइल में सेव कर लिए और घर आकर पहला काम फोन करने का किया दिल ज़ोर से धड़क रहा था सारी माहिती के साथ ऑनलाइन प्रतिभागिता की रस्म पूरी कर ली, अभी समय था अपनी रचनाएँ पहुँचाने के लिए बीस दिन थे मेरे पास बीस दिनों में एक से बढ़कर एक रचनाएँ लिखकर ईमेल कर दी अब बस इंतज़ार था एक महीने बाद निकलने वाले नतीजे का।

दिलो दिमाग में असंख्य भाव उठ रहे थे अपनी लेखनी पर एतबार तो था पर इतने सारे मंजे हुए लेखकों के बीच मैं नई नवेली क्या कोई गुल खिला पाऊँगी ?

पर अपने उस सुहाने सपने पर भरोसा था तो एक महिना कश्मकश में कट गया इनाम की राशि की परवाह नहीं थी बस एक बार विजेताओं की सूची में अपना नाम देखना चाहती थी।

और वो दिन आ भी गया सुबह आँख भी ठीक से नहीं खुली थी की मोबाइल पर ट्रिन की आवाज़ के साथ मैसेज ने दस्तक दी, लेखन प्रतियोगिता का परिमाण ही घोषित हुआ था काँपते हाथों से ईमेल खोला तो दूसरे विजेता की जगह अपना नाम पाकर समझ ही नहीं आया कि क्या प्रतिक्रिया दूँ, होंठों पर हंसी और आँखों में आँसू थे बस मुझे मेरी मंज़िल तराशने का रास्ता मिल गया था।

कहते है ना ज़िंदगी की राहों में पड़ा बदनसीबी का पत्थर हट भी सकता है, धीरे-धीरे मेरी लेखनी रंग लाती गई और एक एक प्रतियोगिता मेरे लिए मील का पत्थर साबित हो रही थी, कितने सारे प्रशस्ति पत्र और अवॉर्ड से सम्मानित तो हुई साथ में अपनी आत्मकथा भी लिखकर पब्लिशर्स को दे दी, कुछ ही दिनों में मेरी किताब छपकर आ गई ओर मार्केट में धूम मचाकर बेस्ट सेलर साबित हुई। 

मानों मेरी कलम मेरा खूब साथ दे रही थी, जैसे-जैसे मेरा बैंक बेलेंस बढ़ रहा था वैसे-वैसे मेरे अपनों के दिल में इस अनमनी के लिए प्यार ओर अपनेपन का ढकोसला भी बढ़ रहा था। 

मैं जानती थी ये मेरे रुप रंग का नहीं मेरे काम, नाम ओर दाम का करिश्मा था 

पर जो भी था जिसके लिए पूरी ज़िंदगी तरसती रही वो अब जाके मिला था मुझे, तो ढोंग ओर बनावटी अपनापन भी भाने लगा था,आज मेरा सुहाना सपना सच हो रहा था।

सच कहूँ ज़िंदगी में निराश नहीं होते मन की धरा पर बोए हुए सपनों पर यकीन रखकर उसका दामन थामे रहना चाहिए, "हाँ सपने भी सच होते है" बस सपने का उद्गम ढूँढने की देर है, आज मैंने अपने वजूद के बिखरे कतरों को समेट कर खुद को पूर्णतः पा लिया है, आज दुनिया में मैंने अपनी एक अलग ही जगह बना ली है अब मुझे ज़िंदगी भाने लगी है, सुहाने सपने आज भी देखती हूँ और उसी सपने की परवाज़ संग अपनी कल्पनाओं को शब्दों में ढालती हूँ और अपनी मंज़िल की तरफ़ आगे बढ़ रही हूँ एक आत्मविश्वास के साथ।। 



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