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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Romance

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

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गुलाबी रिश्ता

गुलाबी रिश्ता

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निधि कालेज में प्रोफेसर थी आज की उसने छुट्टी ले रखी थी । एकसार चली आ रही रूटीन से उसे घुटन सी हो रही थी । आज उसने पूरा दिन अपनी पसंदानुसार बिताने का सोचा था ।

नहा-धोकर फुर्सत होकर मनपसंद किताब पढ़ने का प्लान कर ,उसने सेल्फ से एक पुस्तक निकाली शीर्षक था एक बेनाम रिश्ता ।


किताब के अभी कुछ पृष्ठ ही पलटे थे कि एक करीने से रखा गुलाब दिखा। गुलाब देखते ही उसके अंदर एक कसक सी उठी काश एक बार ।


 निधि की आंखों में आज से 6-7 साल पहले का दृश्य चलचित्र की तरह घूम गया । कॉलेज में एडमिशन लिए अभी तो तीसरा ही दिन ही था ,अचानक सीनियर चार-पांच युवकों के समूह ने दो तीन लड़कियों को घेर लिया उसमें निधि भी थी । एक लड़के ने उसके पास आकर कहा, गुड नेम प्लीज ??उसने बढ़ती धड़कन पर काबू रखते हुए कहा ,"जी जी निधि "।

"आप मेरे पास एक गुलाब लेकर आइए मुझे देकर प्रपोज करिये आई लव यू "।


निधि एक मध्यम परिवार की लड़की थी । वह कभी ऐसा सोच भी नहीं सकती थी । घरवालों से बड़ी मुश्किल से उसे कालेज में एडमीशन की परमीशन मिली थी । क्या करे वह तो काठ की सी हो रही थी । उसको कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वह करे क्या ? तभी भीड़ को चीरता हुआ एक देखने में साधारण सा लड़का बड़ा ही स्मार्ट पीछे से आया उसने फुर्ती से सीनियर के हाथ से गुलाब लेते हुए निधि के सामने पहुंच घुटनों के बल बैठकर बोला," क्या मेरा यह गुलाब स्वीकार करेंगी मैं आपको तहेदिल से प्यार करता हूं !!

कह उसके हाथों में गुलाब थमा दिया , निधि कुछ कहती इसके पहले वह पलट कर सीनियर लड़के के पास जा चुका था और बोला , बड़े भाई जी क्या मैं आपकी बहन से शादी कर सकता हूं आपका आशीर्वाद चाहिए।


सीनियर को न कुछ कहते बन रहा था ना रुकते । आखिर वह अपने चमचों के साथ निकल ही गया ।यह सब इतना अप्रत्याशित हुआ कि कुछ समझ ही न आया ।

हर एक लड़की की नजरें उसी को खोज रहीं थीं पर वह जा चुका था । उसके बारे में किसी को पता नहीं था ।


सच कहा जाये वह एक मदमस्त झोकें की तरह सांसों के रास्ते निधि के दिल की धड़कनों में उतर गया था । प्रिंसिपल के आते ही सभी अपनी अपनी क्लास में चले गए ।


दूसरे दिन शाम को निधि अपनी सहेली रिया के साथ लान में बैठी थी तभी रिया ने कहा देख तेरा चहेता ।तब तक वह उन दोनों के पास आ चुका था आते ही शुरू हो गया पता नहीं कहां की जल्दी में था । "माफ करियेगा उस दिन आपकी हालत देख कर कोई उपाय नहीं सूझा मेरा आपको हर्ट करना उद्देश्य नहीं था । निधि की तो जबान ही तालू से चिपक गयी ।


आखिर रिया ने ही पूंछा " सर आप इस कालेज से तो हैं नहीं क्या मैं आपका नाम जान सकती हूं बेशक " मैं मिहिर थापा अभी मुझे जल्दी है कल मिलते हैं ।


 कहां से आया कहां चला गया ?उसका कल फिर आया ही नहीं । उसने निधि के शांत दिल में एक हलचल मचा तूफान ला दिया था ।सोते जागते उसके शब्द गूंजते I love you. I love you. उसने उस गुलाब के फूल को अपनी किताब में सहेज कर रख लिया ।


निधि ने बीएससी कम्पलीट कर बीएड कालेज में एडमीशन ले लिया पर फिर वह कभी न दिखा । समय कोई की कब प्रतीक्षा करता है साथ ही समय के साथ हर यादें धूमिल हो जाती हैं ।पर सुर्ख गुलाब देख आज फिर सब जीवन्त हो साकार हो गया था ।


तभी डोर वेल बजने से वह यादों के चक्रव्यूह से बाहर निकली , "ओह रमन आप !! छुट्टी लेकर जल्दी आ गए " "शायद तुम्हारा डिस्टर्ब हो गया " रमन ने कहा ।


 "चलो आज एक पार्टी है प्रिंसपल सर के पोते के बरहौं कार्यक्रम के उपलक्ष्य में, घूम कर आते हैं मिलना -मिलाना हो जायेगा"।

"आप होकर आओ मेरा मन न कर रहा है "।

निधि का मन पुरानी यादों में गुम था  भूल चुके इस संस्मरण को गुलाब ने एक बार फिर वह महक और कशिश दे दी थी ।

रमन को टालते हुए बोली," आज नहीं रमन मैंने इसी से तो छुट्टी ली थी कि थोड़ा सा आराम कर अपने ढंग से फ्री रहूं "।

"चलो ना कुछ मन बदल जायेगा हो सकता है कुछ नये लोगों से परिचय हो जाये ,वैसे भी सर 3-4 माह बाद रिटायर होने वाले हैं "।

 

रमन के बार-बार कहने को निधि टाल ना सकी , आखिर बेमन से तैयार हो निकल ली ।


उसने गुलाब की सुर्खी लिये कलर की साड़ी पहनी ।पार्टी में पहुंचते ही उसकी नजर स्टेज की तरफ गयी एक ऐसे शक्स को देख उसके कदम उस ओर खुद-बखुद उस ओर उठ गये वह मंत्रमुग्ध सी खिंची जारही थी वह सामने वाले को अपलक देखे जा रही थी ।रमन अपने साथ के प्रोफेसर को देख उनके पास चले गये थे ।


उस शक्स ने भी उसकी ओर देखा ही था कि खुशी मिश्रित आश्चर्य से बोला , " अगर मैं गलत नहीं हूं आप निधि "

निधि आज भी कालेज गोइंग लड़की की तरह हकलाते हुये बोली , "आप मिहिर थापा " । जी जी !!


मिहिर ने जी जी कह संक्षिप्त उत्तर देते हुए अपनी पत्नी से बोला , " रागिनी इनसे मिलो ,निधि वही निधि जिनके बारे में बताया था "।


आज निधि का मन सब जानने को व्याकुल था पर कैसे पूंछे ??

"कहां चले गये थे"?मिले भी तो इस मोड़ पर? उसने मन में बुदबुदाते कहा ।


तभी मिहिर की आवाज सुनाई दी "उस दिन मेरे पिता जी का ऐक्सीडेंट होने के के कारण वे 2 माह अस्पताल में रहे तबतक मामा जी का ट्रांसफर हो गया" काश कह बात अधूरी छोड़ दी ।


निधि मन में ही बोली मैं काश का मतलब भली प्रकार समझ सकती हूं नहीं तो आज मैं रागिनी की जगह खड़ी होती । बहुत बार हम संकोच में चाह कर भी दिल की बात नहीं कह पाते वक्त दुबारा समय नही देता ।


तब तक रमन उसे खोजते आ गये थे मुझे मिहिर से बात करते देख बोले ,"शायद आप दोनों पहले भी मिल चुके हैं "?

एक बार कालेज फंक्शन में आये थे ।कहने को तो निधि कह गयी पर क्या उस पहले दीदार को आज तक भूल पाई थी ।अपने आप से ही कहे जा रही थी वह प्यार का पहला गुलाब कैसे कोई भूल सकता है ? उस संक्षिप्त मुलाकात को कोई भी सुनेगा तो पागलपन कहेगा पर शायद यही हाल मिहिर का था उस समय अगर वक्त साथ देता ।

दिल तो पागल पहले प्यार का वो खुमार भरा अहसास और खुद ही अपनी सोच पर शर्मा मुस्कुरा उठी ।




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