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Shubhra Varshney

Romance

4  

Shubhra Varshney

Romance

गेंदे के फूल

गेंदे के फूल

6 mins
724

ऑफिस के हेक्टिक रूटीन ने मुझे आज लंच टाइम तक ही पस्त कर दिया था।

जब से मेरा प्रमोशन हुआ तब से मानो मेरी घड़ी ने भी प्रमोशन कर लिया था मुझसे ज्यादा तेजी भाग रही थी वह और भगा रही थी मुझे भी अपने साथ।

जब से कंपनी के इस ब्रांच का एरिया मैनेजर बना था दिन-रात का भेद मिट गया था , जब मिली थी नई जिम्मेदारियां तो मिल गया था नया केबिन भी।

सरसरी निगाह से देख आया था बहुत शानदार था नया केबिन।

पिछले पांच साल पुराने केबिन में काटे थे, इन सालों में यह केवल कमरा न होकर मेरे जीवन का हिस्सा बन गया था।

जीत में मेरे उत्साह निराशा के पलों में मेरे दुख भरे आंसुओं का साक्षी जो बना था तो यह कमरा मुझ से छूटे नहीं छूट रहा था।

आज जब थक गया तो केबिन शिफ्ट करने के बहाने आ कर बैठ गया अपनी पुरानी प्यारी चेयर पर।

टेबल का ड्रायर खुलते ही मानो खुल गया यादों का पुलिंदा भी।

अपने पियून सखाराम से कहकर एक गर्म कॉफी मंगवाई।

कॉफी के हर घूंट में मुझे अपने पुराने दिन याद आ रहे थे जो मैंने इस केबिन में बिताए थे ।सैकड़ों कप तो पी ही गया होंंगा मैं।

ड्रायर से सामान निकालकर टेबल पर रखता जा रहा था तभी हाथ में आए कुछ सूखे गेंदे के फूल।

उन्हें भी निकाल कर बस मेज पर रख ही पाया था कि बुक्स के बीच में से हाथ आ गई मेरी प्यारी डायरी जिसे तो मैं भूले बैठा था।

डायरी लिखने का शौक ना जाने कहां से आया था ।पर ताज्जुब है मैं तब भी लिखता था जब इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था।

कॉफी के सिप और डायरी के पलटते पन्नों के साथ मेरी यादों के पन्ने भी पलट रहे थे। मेरे पहले प्यार की साक्षी जो थी यह डायरी।

बेहद पढ़ाकू मैं कॉलेज का सबसे बोर लड़का घोषित था । बोर होने के बावजूद भी मेरे आसपास लोगों की कमी नहीं थी और होती भी कैसे हमेशा टॉप करने वाला मैन जीनियस ही नहीं बहुत हेल्पफुल भी था।

उस दिन भी बैठे लाइब्रेरी में एक किताब में गोते लगा ही रहा था कि तभी एक खनखनाती आवाज ने मुझे बुक से बाहर निकाला ,"आप ही राजीव हो ?"

एक छोटे कद की दुबली पतली लड़की जिसके हाथ में कई सारी फाइलें और कंधे पर भारी बैग था उसको पहली बार देख रहा था मैं।

"हां मैं ही हूं कहिए क्या काम है ?" मैंने थोड़ा उदासीन आवाज में कहा।

"न्यू एडमिशन हूं मैं.... शिल्पी नाम है मेरा ,भल्ला सर ने मुझे आपसे मिलकर पुराने नोट्स तैयार करने को कहा है।"

एक बार को सोचा उसे मना कर दूं पर उस कमजोर को भारी बैग उठाए देख थोड़ी दया आ गई थी मुझ में।

बस वह दया ही भारी पड़ गई अब तो वह हर रोज बस मेरी सीट पर बैठना चाहती।

चंद दिनों में मैं जान गया था कि वह एवरेज स्टूडेंट थी।

उसका मेरे सीट पर बैठना मानो मेरी शान के खिलाफ था।

मैं कितना भी कोशिश करता लेकिन वह घूम फिर कर फिर मेरे पास ही आ कर बैठ जाती।

और सबसे ज्यादा अजीब बात मुझे यह लगती उसके बैग में अक्सर गेंदे के फूल होते।

पूछने पर बताती कि यह पीले पूछने पर बताती कि यह पीले रंग के फूल उसे जिंदगी की खुशबू देते थे।

बस मुझे उससे और भी चिढ हो जाती कैसी लड़की थी वह ,जहां सबको गुलाब कारनेशन आर्किड पसंद थे यह अभी गेंदे के फूल पर ही अटकी पड़ी थी।

मेरे दोस्त भी उसे मेरे पास बैठता देख मंद मंद मुस्काए करते और मैं बस कुढता।

एक दिन मुझे सुबह से ही बधाइयां मिलने लगी।

कॉलेज में मुझे आया देख कर सो हस रहे थे तभी मेरे दोस्त समीर ने बताया ,"मुबारक हो दोस्तों तुम रोमियो बनने वाले हो।"

"क्या बकवास कर रहे हो ?" मेरे स्वर में आश्चर्य कम गुस्सा ज्यादा था।

"तुमने बोर्ड पर लिस्ट में अपना नाम नहीं देखा एनवल फ्लेकशंन में होने वाले प्ले में तुम रोमियो और शिल्पी जूलियट बनी है।" समीर हंसते हुए बोला।

मैं उसकी बात काटते हुए बोला, "मैं कब प्ले में भाग लेता हूँ ?"

"यार बोर्ड पर तो यही नाम चस्पा है जहां तक मुझे पता है हमारे यहां तो तू ही राजीव है।"

समीर अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था मैं भागता हुआ बोर्ड तक पहुंचा।

मेरा ही नाम लिखा था।

सर के पास पहुंचा तो तो पता चला हम दोनों के नाम शिल्पी कल दे गई थी।

गुस्से से भरा मैं अब शिल्पी के आने का इंतजार कर रहा था। उसके आने में देर हो रही थी और मेरे गुस्से में भी उबाल बढ़ता जा रहा था।

" किस से पूछकर तुमने मेरा नाम दिया ?" वह कुछ बोल भी पाए उससे पहले मैं दोबारा बोला।

" मैं रोमियो और तुम जूलियट बनोगी कभी देखा भी है कुछ खुद को शीशे में। और पढ़ाई में कैसी हो तुम कहां मैं कहां तुम, मैं कुछ कहता नहीं हूं तो तुमने सीमा पार कर दी।"

मैं एक सांस में अपना गुबार निकाल चुका था।

मेरे आस-पास लड़के लड़कियों की भीड़ जमा हो रही थी शिल्पी सबको देखकर रुआंसी हो गयी।

प्ले तो ना होना था और ना हुआ साथ में ही शिल्पी ने भी मेरे पास आकर बैठना बंद कर दिया।

वह सामने पड़कर भी जैसे मुझे नहीं देखती थी।

पर पता नहीं क्यों मेरा मन बेचैन हो उठा था।

वह मुझे क्यों इग्नोर कर रही थी कारण तो मुझे भी पता था पर मेरा दिल यह मानने को तैयार नहीं था।

शिल्पी अब बहुत कम बोलती थी इतने ध्यान से लेक्चर अटेंड करते तो मैंने उसे कभी नहीं देखाि था।

सेमेस्टर एग्जाम के बाद मेरा रिजल्ट पूर्ववत था। मैंने इस बार भी टॉप किया था।

पर टाप फाइव में शिल्पी का नाम देखकर सबके मुंह खुले रह गए थे।

अब नजारा उल्टा था मेरी कोशिश होती कि मैं शिल्पी के पास जा बैठू पर उसे तो जैसे मुझ से जैसे एलर्जी सी हो गई थी।

वह मुझसे जितना दूर जाती मेरा मन उसके लिए ही व्याकुल होता।

प्यार हो गया था शायद मुझे उससे।

एक दिन मैंने उसे रास्ता रोककर पूछ लिया," क्या परेशानी है तुम्हें मुझसे ?"

वह तो जैसे मेरे बोलने का इंतजार कर रही थी उसने बैग से निकालकर एक लेटर मुझे थमा दिया।

उसने लिखा था, "मैंने रोमियो बदल लिया है।"

मेरे हाथ से लेटर छूट गया और मैं धम्म से वही कुर्सी पर बैठ गया।

मैं जानता था यह मुझे चिढ़ाने के लिए लिखा था शिल्पी ने।

मैं डायरी में यह सब पढ ही रहा था की सखाराम की आवाज ने मुझे वर्तमान में ला दिया।

मैं अभी एक स्टूडेंट नहीं एक परिपक्व व्यक्ति था जिसकी अपनी एक फैमिली थी और एक अदद बीवी।

"एक कप कॉफी और लानी है क्या ?"

" नहीं मैं घर जा रहा हूं ।", अब सब सामान समेट कर ड्रायर में रखते हुए कहा ।मैं तेजी से पार्किंग की तरफ बढ़ रहा था कार लेकर जल्दी ऑफिस से निकल गया।

लेटर को लिए सोचता हुआ मैं घर तक आ गया था।

मेरी पत्नी ने अपनी चिर परिचित मुस्कान के साथ दरवाजा खोला।

मैं अंदर घुसा ही था की गेंदे की खुशबू ने मेरा मन खुशी से भर दिया।

अपनी पत्नी को बाहों में लेते हुए मैंने पूछा, "यह तो मैं पूछ ही नहीं पाया तुमने दूसरा रोमियो कौन सा चुना था।"

अब मेरे घर का वह कमरा मेरी और शिल्पी की हंसी से गूंज रहा था और मेज पर रखे गेंदे के फूल मुस्कुरा रहे थे।


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