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Moumita Bagchi

Romance Tragedy


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Moumita Bagchi

Romance Tragedy


एक लड़की को देखा तो-- ऐसा लगा

एक लड़की को देखा तो-- ऐसा लगा

6 mins 97 6 mins 97

मैं तब मेडिकल काॅलेज का एक स्टूडेन्ट था। एम॰ डी॰ ( opthalmology ) कर रहा था और अंतिम वर्ष में था। कलकत्ता शहर से दूर एक छोटे से टाउन के अस्पताल में पार्ट टाइम काम किया करता था।

एकदिन अपने काॅलेज ( Calcutta Medical College)से घर लौटते कुछ लड़कियों के एक झुंड को हमारी बस में चढ़ते हुए देखा। उनमें से एक लड़की बेहद खूबसूरत थी। साधारण सलवार कुर्ते में सजी,एक कंधे पर टंगी बैग और दूसरे हाथ में मोटी जिल्द वाली कुछ पुस्तकें लेकर जैसे ही उसने अपना पहला कदम बस के पायदान पर रखा था, उसे देखते ही मानों मैंने अपना होश खो दिया !! थोड़ी देर बाद मेरी बगल वाली सीट खाली हुई तो उसकी एक सहेली ने उससे कहा,

" मानसी, तू वहाँ बैठ जा!"

मानसी--- मानसी-- यह नाम सुनते ही जैसे मेरे दिल में वीणा की मधुर ध्वनि बज उठी थी। वह उसदिन बड़ी शालीनता से बीच में दूरी बनाकर मेरी पासवाली सीट पर बैठी थी, ऐसे कि जरा भी जरा भी उसका स्पर्श न लगे।

कुछ देर बाद उसकी सहेली ने उससे कुछ कहा, परंतु उसे मैं न सुन पाया। क्योंकि मैं तो मानसी में ही खोया हुआ था। और वह खिल- खिलाकर हँस पड़ी थी। उसकी हँसी उससे भी कहीं ज्यादा मधुर लगी थी, मुझे!! ऐसा लगा कि जैसे जलतरंग की मधुर आवाज़-सी हो।

उसदिन रातभर मुझे नींद नहीं आई। मेरा मानस पूरे समय मानसी में ही खोया रहा। सुबह दो घंटे के लिए सो गया था, उस समय भी मैंने उसी का सपना देखा।

अगले दिन काॅलेज गया तो पढ़ाई में बिलकुल भी मन न लगा, मेरा। ऐसा लगा जैसे मेरा कुछ खो- सा गया है। और मैं वैसा ही खोया- खोया फिरता रहा। सारे प्रोफेसर मेरे अमनयोगी होने की शिकायत करने लगे थे। और सहपाठी?? हँसने लगे थे--

" अरे, आज डाॅ॰ मानस को क्या हो गया है?

" लगता है, उनको उनकी मानसी प्राप्त हो गयी है"

कहकर सब मुझे चिढ़ाने लगे। अब उन कमबख्तों को क्या पता था कि आखिर उनका अनुमान अक्षरशः सच था!!

खैर, साढ़े चार बजते ही मैं बस स्टाॅप की ओर तेजी से भागा। एक आखिरी क्लास थी, पर मुझे उसे बंक मारने में जरा भी मुश्किल न हुई। मुझे कलवाली मिनिबस पकड़नी थी जिसमें मानसी मुझे मिली थी।क्या पता आज भी वह उसी बस से वापस जाए??!!

बस स्टाॅप पहुँचते -पहुँचते मिनिबस मेरे सामने से निकल गई। मैंने उसके दूसरे स्टाॅप तक उसका पीछा किया। गनीमत थी, कि सामने पैसेन्जर देखकर वह थोड़ी दूर पर ही जाकर रुक गई थी। और मैं कूदकर उसपर चढ़ गया।

मेरी इतनी जद्दोजहद का फल भी मुझे हाथोंहाथ मिला। मानसी आज भी उसी बस में बैठी थी। और वह बिलकुल अकेली थी। उसकी संगी - साथियाँ एक भी नहीं दिखी। उसकी ओर देखा तो वह खिड़की के पासवाली सीट पर बैठकर बाहर का नज़ारा देख रही थी।

 काॅलेज स्क्वेयर का स्टाॅप आते ही उसकी पास वाली सीट खाली हो गई और मैं लपक कर वहाँ जा बैठा। मेरे बैठते ही मानसी ने अपना चेहरा इधर घुमाया और खिसककर मेरे लिए उसने जगह बना दी।

इसके बाद हम रोज़ यूँ ही बस में मिलते रहे। दोनों का काॅलेज एक ही जगह पर था और घर भी एक ही दिशा में। अतः अकसर बस में हम मिल जाया करते थे।

नहीं, आप लोग जैसा सोच रहे हैं वैसा कुछ भी नहीं हुआ! हम लोग कभी बोले भी नहीं एक- दूसरे से। मैं जिस जमाने की बात कर रहा हूँ, उस जमाने में लड़के - लड़की काफी शर्मीले हुआ करते थे।

इसके बाद मेरे काॅलेज में एक्जाम के दिन आ गए। और फिर हम मिल नहीं सके क्योंकि फिर काॅलेज आने- जाने का मेरा वक्त ही बदल गया था।

एग्जाम के कुछ दिनों के बाद मैं किसी वजह से काॅलेज गया था। उसदिन घर लौटते समय संयोग से बस में फिर मानसी मिल गई थी,मुझे! उसे देखकर मुझे इतनी खुशी हुई कि क्या कहूँ? आज मुझ से रहा नहीं गया। मैंने सोचा कि चलकर देखा जाए कि वह कहाँ रहती है?

फिर क्या था, मैं लगा उसका पीछा करने!! उसके काॅलोनी के गेट तक गया था, बस! फिर आगे और जाने की हिम्मत न पड़ी। वहीं से लौट आया था, उसदिन।

परंतु घर आकर मेरी बेचैनियाँ बहुत बढ़ गई थी!रात को भी करवटें बदलता रहा। नींद पूरी गायब!! लगा कि अगर मानसी मुझे नहीं मिली तो मुझे फिर कभी नींद ही नहीं आएगी!!

अगले दिन इतवार था। मैं फिर मानसी के हाउसिंग काॅम्प्लेक्स तक गया और वहाँ जाकर गेट पर पूछताछ करने लगा। मानसी का हुलिया बताकर सबसे पूछने लगा कि वह लड़की कहाँ रहती हैं? परंतु कोई कुछ न बता पाया!

संयोग से एक अंटी वहाँ से जा रही थी। मैंने उनको रोककर अपना प्रश्न दोहराया। शायद मेरा परेशान चेहरा देखकर अंटी को कुछ दया आ गई थी। उन्होंने मुझसे इसका कारण पूछा। मैंने उनको अपना परिचय दिया और बताया कि मैं मेडिकल काॅलेज का पढ़ा हुआ एक डाॅक्टर हूँ और एक विशेष कारण से इस लड़की को ढूँढ रहा हूँ।

डाॅक्टर शब्द सुनते ही अंटी जी बड़ी खुश हो गई और मेरी मदद करने को तैयार हो गई। उन्होंने मुझे बताया कि कुछ दिन पहले ही उनकी बड़ी वाली बेटी की शादी हुई है। तब पूरे काॅम्प्लेक्स के लोगों को उन्होंने न्यौता दिया था। उस दिन गेस्ट में से जो भी आए थे सबकी तस्वीरें ली गई थी। क्यों न एक काम करें? अंटी जी के घर चलकर उनका एलबम देखा जाए? शायद उस लड़की की तस्वीर भी उसमें हो। तस्वीर मिलने पर शिनाख्त करने में बड़ी आसानी हो जाएगी।

आइडिया मुझे अच्छी लगी और मैंने ऐसा ही किया। संयोग से लड़की अंटी जी के बिलकुल next door neighbour निकली। मैं तो खुशी से उछल पड़ा। मेरी मानसी अब बिलकुल मेरे पास थी। मैं उससे मिलने को उतावला हो उठा।

पर अंटी ने मुझे रोक लिया। पूछा,

" बताओ जरा, कि आखिर मामला क्या है? मैंने तुम्हारी इतनी मदद की, अब मुझे पूरी बात बताओ।"

इसके बाद मैं अंटी जी से कुछ नहीं छिपा पाया। दिल का सारा हाल उनको बता दिया।

" तो अब, क्या करना चाहते हो?" सारी बात सुनने के बाद उन्होंने गंभीर स्वर में पूछा।

" शादी! अगर उसके पैरेन्ट्स राज़ी होते हैं, तो मैं मानसी से, मेरा मतलब--- शादी करना चाहता हूँ।" शर्म और नर्वसनेस से पसीना- पसीना होते हुए मैंने अंटी जी से कहा।

" नहीं ऐसे नहीं। वे मेरे पड़ोसी है। वह लड़की मेरी बेटी जैसी है। एकबार मैं पहले उनसे बात कर लूँ। अगर वे तुमसे बात करना चाहेंगे, फिर तुम चले जाना। अपना फोन नंबर छोड़कर जाओ। जैसा भी होगा मैं तुम्हें फोन करके बताऊंगी"

मैं और क्या करता? अंटी जी की बात मानकर उसदिन घर चला आया।

अगलेदिन मैं गया था, मानसी के घर। उसकी मम्मी ने nighty पहने- पहने मेरा स्वागत किया।

नहीं, बात नहीं बन पाई थी, उसदिन। मानसी की मम्मी ने उन लोगों के उच्च-जात का होने का गर्व से चूर होकर मेरी योग्यताएँ इत्यादि को परे रखकर मेरे मुँह पर ही मुझे अपना दामाद बनाने से इंकार कर दिया था।

आज वर्षों बाद जब उस घटना को सोचता हूँ तो अपने आपसे सिर्फ एक ही प्रश्न पूछता हूँ कि क्या शादी के लिए जाति ही सबसे अहम होता है?

कल को मेरी बिटिया अगर किसी को पसंद करके घर ले आएगी, तो क्या उस लड़के को केवल दूसरी जाति का होने के कारण ही मैं इंकार कर पाऊँगा ?


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