Gita Parihar

Abstract


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Gita Parihar

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एक गुमनाम जिंदगी

एक गुमनाम जिंदगी

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यह कहानी है बुधनी मझाइन की।उस समय वह केवल पंद्रह वर्ष की एक तेज- तर्रार आदिवासी लड़की थी। वह मानभूम इलाके की थी। रंग आबनूसी, जैसा कि संथालियों का अकसर होता है, लेकिन उसकी दो चमकीली आंखें उसे दूसरी लड़कियों से अलग ठहराती थीं । पत्थर में तराशी गई किसी मूर्ति सी थी वह, जीवंत प्रतिमा सी।वह बहुत मेहनती थी। सुबह उठकर जंगल में लकड़ी काटने जाती। घर आकर खाना पकाती।पानी भर कर लाती। फिर पत्थर तोड़ने जाती। इतने परिश्रम के बावजूद उसके चेहरे पर कोई शिकन न होती। 


जिस समय की बात हम कर रहे हैं वह आज़ादी के लगभग एक दशक बाद की है। देश नया- नया आज़ाद हुआ था। प्रथम प्रधानमंत्री ,पंडित नेहरू देश की बागडोर संभाले हुए थे। संविधान के लागू हुए भी पाॅच - छः वर्ष हो चले थे। देश विज्ञान और प्रौद्योगिक क्षेत्र में अग्रसर होने की कोशिश कर रहा था। शिक्षा के क्षेत्र में नित्य नए शिक्षण संस्थान खोले जा रहे थे।पं.नेहरु का सपना भारत को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विश्व में सर्वश्रेष्ठ बनाना था। उनके इसी सपने की पूर्ति हेतु 7 जुलाई 1948 को एक विशेष संसदीय सभा (1948 के अधिनियम संख्या 14) के तहत भारत की बहूद्येश्यीय नदी घाटी परियोजना, दामोदर घाटी निगम ( डी वी सी) अस्तीत्व में आई। 


 यह नदी तत्कालीन बिहार( अब झारखंड) तथा पश्चिमी बंगाल के राज्यों को आवृत्त करते हुए 15000 वर्ग कि॰मी॰ क्षेत्र तक फैली हुई है।


दामोदर घाटी में बाढ़ से तटीय क्षेत्र के लोगों को निरंतर विध्वंस का सामना करना पड़ता था। दामोदर की दो सहायक नदियाॅ बराकर और कूनार इस क्षेत्र से होकर गुजरती हैं। बाढ़ की इस प्रचंडता को रोकने हेतु डीवीसी ने इस क्षेत्र में चार पनबिजली योजनाएॅ बनवाईं। डीवीसी की पनबिजली योजना के रूप में पंचेत बाॅध, दामोदर नदी के ऊपर सन् 1959 ईं में अस्तित्व में आई। हमारी कहानी की नायिका बुधनी का संबंध इसी परियोजना से है।


बुधनी डीवीसी की कर्मचारी थी। एक बाॅध के निर्माण से पहले पत्थर काटने, सड़कें बनाने ,निर्माण एवं संरचना के कार्य हेतु आमतौर पर किसी भी परियोजना द्वारा स्थानीय लोगों की बहाली की जाती है। बुधनी भी इन्हीं में से थी। कहा जाता है कि इस तरह की नदी घाटी परियोजनाओं के चलते सन् 1947 से लेकर तब तक लगभग साढ़े छः करोड़ संथाल कबीले के लोग विस्थापित हो गए थे। इस हेतु बुधनी के गाॅव के लोगों ने काम करने से मना कर दिया था। वे लोग इस परियोजना के निर्माण के विरोधी थे। सरकार की ओर से दिए गए आश्वासन से जब कोई फर्क न पड़ा , और परियोजना लगभग रद्द होने के कगार पर खड़ी हो गई, तब जनश्रुति के अनुसार पंद्रह वर्षीय इसी संथाली बाला ने सबसे पहले फावड़ा उठाया था और बंद पड़े काम को दुबारा चालू करवाया था।


इसका पुरस्कार भी उसे हाथोंहाथ मिला था। जब 1959 में पंचेत बाॅध बनकर तैयार हो गया तो उसके उदघाट्न समारोह में पंडित नेहरू का पंचेत आगमन हुआ था। प्रधानमंत्री का स्वागत हार पहनाकर इसी बुधनी ने किया । पंडित जी ने इसके प्रत्युत्तर में बुधनी माझी के द्वारा बटन दबवाकर बांध का उद्घाटन संपन्न करवाया था। इसके बाद बुधनी ने ही पंचेत बांध का लोकार्पण किया था। इस अवसर पर उसने संथाली भाषा में उपस्थित लोगों को संबोधित भी किया।


 विश्व के इतिहास में यह एक घटना एक दृष्टांत बन गई। जहाॅ देश के प्रधानमंत्री की उपस्थिति में एक साधारण सी संथाल बालिका,एक डीवीसी कर्मचारी के हाथों बाॅध का उद्घाटन हुआ। लेकिन बुधनी के जीवन मे यह दिन एक घोर अभिशाप लेकर आया।


 बुधनी करबोना गाॅव की रहनेवाली थी।

करबोना संथाली कबीले की रीति के अनुसार फूलों का हार पहनाने के कारण बुधनी को पंडित नेहरू की ब्याहता समझा गया। और चूंकि नेहरू संथाली नहीं थे, इसलिए बुधनी को कबीले से निष्काषित कर दिया गया। मिडिया द्वारा उसे इस समय " नेहरू की संथाली पत्नी" नाम दिया गया।


कबिले से बहिष्कृत होकर कुछ समय के लिए बुधनी यहाॅ- वहाॅ मारी -मारी फिरती रही। फिर पंचेत निवासी सुधीर दत्ता के घर में उसे पनाह मिली थी। कहते हैं कि इसी सज्जन से बुधनी को एक बेटी भी हुई थी परंतु उस बेटी को भी संथाल समुदाय ने स्वीकार न किया। कुछ समय पश्चात् 1962 में उसकी डीवीसी के स्टाॅफ पद की नौकरी भी चली गई। फिर उसका क्या हुआ इसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं।


कहते हैं कि बुधनी अपनी नौकरी वापस पाने हेतु सन् 1985 में दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मिली थी। सर्वविदित है कि स्वर्गीय राजीव गांधी पंडित नेहरू के नवासे थे। उन्होंने उसकी सहायता करने का वायदा किया था। इसके पश्चात् डीवीसी में उसकी पुनः बहाली हुई थी, परंतु वह और उसकी बेटी कभी गाॅव करबोना के अंदर न घुस न पाईं , हमेशा गाॅव के बाहर ही रहीं।


फिर बुधनी का क्या हुआ इसका कुछ पता न चल पाया। वह और उसकी बेटी आजीवन गुमनामी की जिन्दगी जीती रहीं। सन् 2010 में एक पत्रिका द्वारा उसे मृत घोषित किया गया। परंतु हाल ही में एक जानीमानी मलयाली लेखिका साराह जोज़ेफ को उनके बारे में किसी सूत्र से पता चला। साराह बुधनी के जीवन पर एक पुस्तक लिखना चाहती थी। इस हेतु उन्होंने डीवीसी, मैथन के जनसंपर्क अधिकारी से संपर्क किया तो वे यह जानकर हैरान हो गई कि बुधनी अभी तक जीवित है। जनसंपर्क अधिकारी, श्री एम•विजयकुमार ने साराह की मुलाकात बुधनी से करवाई । परंतु साराह का कहना है कि बुधनी अपने अतीत को याद नहीं करना चाहती और आगे की जिन्दगी ऐसे ही जीना चाहती है। 


बुधनी के जीवन पर आधारित साराह की पुस्तक मलयाली भाषा में सितम्बर में प्रकाशित हो चुकी है। आगामी दिनों में इसके हिन्दी और अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित होने की संभावना है।



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