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Rajeev Rawat

Romance


5.0  

Rajeev Rawat

Romance


एक अंजुरी प्यार की-एक कथा

एक अंजुरी प्यार की-एक कथा

11 mins 470 11 mins 470

आज एक तारीख थी! आज से उसकी पारिवारिक जिम्मेदारी और बढ़ गयी थी। घर का एकमात्र कमाऊ सदस्य जो था। उसका मन काम करने में नहीं लग रहा था, बार बार उसकी निगाहें दीवार पर लगी घड़ी की ओर उठ जाती थी। आफिस बंद होने में अभी आधा घण्टा बाकी था! आज तो समय था जो काटे ही नहीं कट रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे रेगिस्तान में पानी की प्यास में भागते भागते बाबड़ी नजर आ गयी हो और दौड़कर वह नीचे जा रहा हो और शीतल पानी पीने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि अचानक बड़े बाबू की कर्कश आवाज सुनाई दी-

"क्यों वेतन नहीं लेना है क्या?"

वह हड़बड़ा गया। उसने अपना सिर उठाकर देखा। सभी बारी बारी से वेतन ले रहे थे! वह भी हड़बड़ाकर लाइन में खड़ा हो गया, आज पहली बार वेतन की राशि उसके हाथों में आनी थी! अभी तक वह छोटे मोटे काम करता रहा था, पहली बार फैक्टरी में पर्मानेंट बाबू बना था, वेतन के कड़कड़ाते नोटों को उसने जेब में डाल लिया!

एक अजीब सी सरसराहट हो रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई मेढक सा उसकी जेब में कूंद रहा हो और वह जोर से पकड़कर उसे भागने नहीं देना चाहता हो! वह जानता था नोंटो के बजन को तो बढाया नहीं जा सकता हां आवश्यकताओं की टोकरी में काट छाट करनी होगी। क्योंकि बोझ तो जिम्मेदारियों का होता है जो सबको उठाना ही पड़ता है।

मेंढक की याद आते ही उसके होठों पर हल्कि सी मुस्कान आ गई, उसे याद आया वह करीब दस बारह साल का रहा होगा, पड़ोस में शालिनी नाम की एक लड़की रहती थीं! उससे उम्र मे उससे चार पांच साल बड़ी रही होंगी। एकदम दूध जैसी फक्क सफेद परी जैसी हमारी कल्पना की परी। हम बच्चे उन्हें किसी न किसी बहाने ताकते रहते थे, एक दिन उन्होने इशारे से उसे बुलाया। बचपन में वह दूर से ताकने की शरारत अपनी जगह पर थी लेकिन जब उन्होने इशारे से पास आने के लिए कहा तो उसका गला सूख गया, पसीने की बूंदे छलकने लगीं, हिम्मत जबाव देनें लगी-, आज तो सारा ताकना धरा का धरा रह जायेगा। पास जाते ही उसके मुंह से निकला था।

"जी दीदी आपने बुलाया"

शालिनी दीदी के चेहरे पर मुस्कान देखकर थोड़ा सा मन को अच्छा लगा।

"तुम्हारा नाम क्या है?"

"मेरा नाम?"

अचानक हुए प्रश्न से वह अपना नाम ही भूल गया-

"जी - - जी मुझे--,"

मेरी हड़बड़ाहट देखकर शालिनी दीदी जोर से खिलखिलाकर हंसने लगी। उसकी श्वेत दंत पंक्ति आभा बिखेर रही थी।

अचानक मुझे याद आया कि मेरा नाम रवि है - - "रवि शर्मा"

उसने अपनी हंसी रोकते हुए कहा कि -

"रवि मेरा एक काम करोगे? मुझे प्रैक्टिकल के लिए मेढक चाहिए, पीली धारी वाला राना टिगरीना चाहिये, तालाब के किनारे से ला दोगे?"

"जी दीदी ला दूंगा"

सारे बच्चों पर अपना इम्प्रेशन जमाने का अच्छा मौका मिल गया था! शाम होते होते दो मैढक पकड़ लिए थे, एक मेढक को कुर्ते की जेब में डाल लिया था और दूसरा हाथों में पकड़कर शालिनी दीदी के पास बच्चों के जुलूस के साथ ऐसे पहुंचा जैसे शेर का शिकार करके आया हूं! यहां तक तो ठीक था।

रात मे बाबूजी का जब सटाका मेरे पिछवाड़े पर पड़ा तब मेरी समझ में नहीं आया कि आखिर हुआ क्या है? यह तो बाद में पता चला कि मां ने रात में मेरा कुर्ता धोने के लिए निकाला अचानक जेब मे कुछ भारी भारी सा लगा, उन्हें लगा कि मैने कुछ चुराकर जेब में रखा है! उन्होनें जेब में हाथ डालकर जैसे ही सामान निकाला उनके मुंह से चीख निकल गई और डर के मारे एक सीढी से नीचे गिर गयीं। हीरो बनने के चक्कर में मै भूल गया था कि एक मेढक मेरी जेब में ही रह गया था---और बचपन का निश्छल प्यार दम तोड़ गया।

जब वह कालेज में पढ़ रहा था, फाइनल ईयर था। एक दिन जब कालेज से लौटा तो पड़ोस के घर में किसी लड़की की खिलखिलाहट सुनाई दी। यह मकान तो कुछ माहों से खाली था, शायद कोई नया पड़ोसी आ गया। मन एक जिज्ञासा सी उठ गयी कि इतनी मधुर आवाज किसकी है। अपना फोल्डर कमरे में रख ही रहा था कि मां चाय लेकर आ गयी। उसने पूछां - -

"मां! यहां पड़ोस में कोई आ गया है क्या? "

तब मां ने बताया की एक मिश्रा परिवार आया है और उनके एक लड़की है।उस दिन शाम को कोशिश करता रहा कि कोई बहाना वहां जाने का मिल जाये लेकिन समझ में नहीं आ रहा था। तभी डोरबैल बजी, उसने झपट कर दरवाजा खोला, सामने एक खूबसूरत लड़की खड़ी थी। वह दरवाजे पर खड़ा उसे देखता ही रह गया, उसे लगा जैसे डोरबैल उसके दिल कमरे की बज गयी हो। उस लड़की ने उसकी आंखों के सामने चुटकी बजाते हुए कहा--।

"मैं कमला, आपके पड़ोस में रहने आयी हूं, आंटी जी हैं?"

वह एक पल के लिए हड़बड़ा गया-

"आंटी! यहां तो कोई आंटी नहीं है।"

तभी अंदर से मां की आवाज आई कौन है।वह उसके साइड से निकल कर अंदर चली गयी।

"आंटी, मैं कमला, हमारे घर पर दूध फट गया, यदि आप एक कप दें दें तो--"

"क्यों नहीं बेटा"--उन्होंने ने रवि को आवाज लगाई

"रवि बेटा, मेरे हाथ में आटा लगा है, तुम कमला को दूध दे दो।"

वह तुरंत किचिन में गया और भगोनी लेकर कप में दूध देने लगा, नजर अब भी कमला की ओर ही थी कि कप भरने से दूध नीचे गिरने लगा, वह खिलखिला कर हंसते हुए दूध लेकर चली गयी थी।पता नहीं उसे क्या हो गया था। कमला को देखने का मन बार बार करता था।


एक दिन जोर से पानी गिर रहा था और वह कालेज से वापिस आ रहा था। रोड पर पानी भरा हुआ था, साइकिल चलाते हुए उसने पर्दा हटा कर झांकते हुए कमला को देखा यानि वह भी मेरे आने का इंतजार कर रही थी। वह उसको देखने के चक्कर में भूल गया कि सामने पानी के नल का गड्डा है और वह साइकल सहित उसमें गिर गया। तभी तुरंत दौड़कर कमला आ गयी थी ओर भींगते हुए उसे उठने में सहायता की थी।

उसकी जिन्दगी बदल गयी थी। अभी प्यार की पहली पायदान ही चढ़ पाया था कि उसके पापा का ट्रांसफर हो गया और अश्रुपूरित नजरें जाते हुए उसे देखती रहीं।

उसने अपनी जेब को जोर से पकड़ लिया पूरे शरीर में हल्की हल्की गर्माहट हो रही थी! घर अभी दो किलोमीटर दूर था।पहले बाबूजी का चश्मा ठीक करवाना होगा, अभी कुछ दिनों पहले ही सब्जि लाते समय अपनी खानदानी एटलस साईकिल से गिर गये थेऔर चश्मा का एक लेंस टूट गया था बिचारे एक लेंस का चश्मा पहने घर लौटे तो मां ने खूब खरी खोटी सुनाई, उन्हें इसका दर्द तो बाद में हुआ कि बाबूजी के हाथ और कूल्हे में चोट लगने गयी थी, पहले तो गरीबी का आटा गीला नजर आया, तीनसो रूपये का चश्मा टूट गया था।

घर में बाबूजी, मां, छोटी बहिन और पत्नि कमला थी। अभी नौकरी पत्र आते ही बाबूजी ने शादी करवा दी थी। उसने लाख मना किया लेकिन खानदानी मनमानी के आगे वह भी बेवस हो गया था। लेकिन जब दुल्हन के रूप में कमला को देखा तो दंग रह गया यानि मां की नजरें सब भाप गयीं थीं और नौकरी लगते ही उन्होंने शादी का प्रस्ताव भेज दिया था।

 बाबूजी की सीमित पेंशन और मेरी आय इतनी नहीं थी वह पूरी तरह पैर फैलाकर लिहाफ को ओढ सकें लेकिन गठरी में सिमटकर भी जीने की आदत हो गयी थी या यह कहूं आदत डालनी पड़ी।उसने कमला से कहा भी था कि - -

"तुम्हें तो बहुत अच्छे लड़के मिल सकते थे लेकिन तुमने मुझे क्यों चुना?"

तब कमला ने उसके होठों पर हाथ रख कर बोला था कि--

"मुझे तो तुम चाहिए थे और अभी तुम्हारी और अच्छी नौकरी लग जायेगी तो देखना धीरे धीरे यह घर स्वर्ग हो जायेगा।"

मैं शाम को थक कर आता तो कमला भी दिन भर बाबू, मां और घर काम करके इतनी थकी रहती कि चुपचाप उसके सीने पर सर रख कर सो जाती। उसकी बिखरी जुल्फों को वह अपने हाथों से संभारना चाहता था, उसको हर सुख देना चाहता था लेकिन जानता था सपनों की दुनिया इतनी आसानी ने कहॉं बनती है।

कमला ने भी घर को अपना मानकर अपना लिया था उसने कभी मुझे महसूस ही नहीं होने दिया कि मैं उसकी आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पा रहा हूं! जब अड़ोस पड़ोस मे सज औरतों को धजकर जाते हुए देखता तो एक टीस मन में उठती कि मेरी कमला भी ऐसी ही तैयार होकर निकले! शाम को जब वापस लौटूं तो आंखों में काजल, होंठो पर लाली और अधरों पर मुस्कान हो, आशाओं के पंखो पर बैठाकर मैं भी ले जाना चाहता था लेकिन आंकाक्षों की आवृत्ति तो होती थी लेकिन पूर्ति?

उस दिन शाम के समय सबके सो जाने के बाद कमला जब कमरे आई तो बोली-

"इस बार आपको जब वेतन मिल जायेगा तब हम मेला चलेंगे, कुछ छोटा मोटा सामान मै भी ले लूंगी और हां कोने वाली दुकान के समोसे भी खाऊंगी, जब भी वहां से निकलती हूं, एक अच्छी गंध सी आती है-"

-मैने एक बार उसके चैहरे को देखाखिड़की से आ रही चांद की रोशनी में ऐसा लग रहा था कि चांद की रोशनी से उसका चैहरा नहीं चमक रहा बल्कि चांद उसकी रोशनी से चमक रहा है, वह तृप्ति का आंचल ओढकर वह सो गई थी! मुझे नींद नहीं आयी थी। किस मिट्टि की बनी है यह, मेरी खुशी में खुश, मेरे दुख मे दुखी--

शाम हो गयी थी। चारों ओर स्ट्रीट लाइट जल उठी थी। मेरा घर भी आ गया था। आठ जोड़ी आंखे टकटकी लगाये दरवाजे पर इंतजार कर रहीं थीं, मां-बाबूजी अपने मां बाप होने का अधिकार लिए, बहिन भाई को रक्षा बंधन के बांधे हुए धागों के मोल लिए और उनके पीछे दो आंखे पत्नीत्व का अधिकार लिए पहले वेतन के इंतजार में खड़ी थीं और मैं जेब को जोर से थामे हुए था जो नोट दरवाजे के बाहर फड़फड़ा रहे थे, वे सामने खड़े अधिकारों की जंग से हार कर शांत होकर जेब के कोने में दुबक गये थे! हाथ मुंह धोकर थैला उठाकर चल दिया, साथ में तैयार हो कर कमला भी चल दी।

सामान ज्यादा भारी हो जायेगा तो मैं भी। शायद अपनी पति की पहली वेतन के कुछ भाग की अधिकारिणी तो वह थी ही और शायद अपनी सहेलियों, पड़ोसियों को भी दिखाना चाहती थी कि मैं भी अब एक बाबू की बीबी हूं, तुम्हारी तरह ठसक से मैं भी बाजार जा कर वह क्या कहते हैं मार्केटिंग कर सकती हूं!

बाबूजी का चश्मा फिर मां की दवाईयां विट्टो की लाली टिक्की और घर का राशन पानी लेकर वापिस चले तो मैं सिर झुकाए हुए था। अब इतने पैसे ही नहीं थे कि कमला को मेले ले जा पाता, आत्मग्लानि में डूबा चुपचाप चला आ रहा था। कमला मेरी मजबूरी समझ गयी थी। शायद एक बिशेष इन्द्री होती है पत्नियों के पास जो न कहे शब्दों को भी पहचान जाती है। वह हंसते हुए बोली -

"सुनिये आजकल मेले में कितनी भीड़ होती है, सच्ची मुझे तो भीड़भाड़ में डर लगता है, हम फिर कभी आराम से मेला चलेंगे फिर जल्दी क्या है। अगले माह बाबूजी का चश्मा थोड़ी लेना है तब ले लेगें। आप परेशान मत हों।"

उसने आहिस्ता से मेरे हाथ की उंगलियों को छू लिया था। एक सिहरन के साथ कुछ कर न पाने की हताशा भी मुझे छूते हुए निकल गयी, न जाने क्यों कुछ बूंदे मजबूरी का बादल ओढ़कर आंख के कोंने से छटक गयीं। मैने झूंठा सा मुस्कराकर उसकी ओर देखा। सामने कोने वाले हलवाई की दुकान आ गई थी। समोसे तलने की भीनी भीनी खुशबू आ रही थी! अचानक कमला बोली--

"पता नहीं क्यों आज पेट में ऐंठन सी हो रही है, चलिए जल्दी से घर चलते हैं।"

शायद वह मुझे जिल्लत से बचाना चाहती थी, इसलिए बहाना कर रही थी। एक बार मैने चुपके से अपने पेंट की जेब में हाथ डाला। उंगलियों से आखिरी नोट टकराया। पांच का नोट था। इससे पहले कि कमला कुछ समझ पाती मैंं तेजी से दुकानपर गया और पूंछा-

"समोसा कितने का है?"

हलवाई ने कहा - "पांच का एक--"

मैने खरीद लिया और आश्चर्य में खड़ी कमला की ओर लपका और उसका हाथ पकड़ कर पास लगे हैण्ड पम्प के चबूतरे पर बैठ गया, गर्म गर्म समोसा मैने उसकी ओर बढा दिया।

उसकी नजरों में जो प्यार झलक आया था, चैहरे जो तृप्ति नजर आ रही थी। ऐसा आभास हो रहा था जैसे उसकी झोली में मैने सारे संसार की खुशियां डाल दी हों। वह हंस दी, शायद सचमुच दिल से हंसी थी तभी तो उस की दंत पंक्ति शालिनी दीदी की भांति श्वेत आभा फैला रही थी।

चैहरे का रंग भले ही फक्क सफेद न हो लेकिन आज जो आभा प्रस्फुटित हो रही थी, वह सचमुच शालिनी दीदी को भी मात कर रही थी। मेरे स्वप्नों की परी आज अपने सुनहरे पंख फैलाये अठखेलियां कर रही थी। सच में प्यार में रुपया का मोल गोण हो जाता है और भावना अनमोल! उसको मैं अन्तर्मन में महसूस कर रहा था! मैं जीवन के उन क्षणों को जी रहा था जो शायद पैसे की आपाधापी मे लगे लोग महसूस न पाते होंगे! मैने अपने हाथों की हथेलियों को आगे बढा दिया उसके चैहरे को ढक लिया, मैं नहीं चाहता था इन पलों को किसी की नजर लगे, काश! ये समय हमेशा के लिए इसी बिंदु पर ठहर जाता। खुशी के उन पलों को हमेशा हमेशा के लिए अपनी अंजुरी में भर लेना चाहता था। उन दो पलों में ऐसा लग रहा था कि चारों ओर मंद मंद प्यार भरी खुशबु लिए वासंतिक हवायें बह रहीं हो और प्रेम की सरिता में वह डूब गया हो। कहीं एक रेडियो पर गाना बज रहा था-

पिया बसंती रे

काहे सताए आजा

जाने क्या जादू किया

प्यार की धुन छेड़े जिया

काहे...

                 

      


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