“द्विरागमन (गौना): जब जेवर बचा, अटैची गायब” (मिथिला संस्मरण – 1975)
“द्विरागमन (गौना): जब जेवर बचा, अटैची गायब” (मिथिला संस्मरण – 1975)
आदरणीय " "मंच नमन और यह संस्मरण सादर समर्पित !
संदर्भ: यह संस्मरण 1975 की मिथिला की लुप्त होती 'द्विरागमन' प्रथा का सजीव दस्तावेज़ है, जो 'घर-भरि' जैसी रस्मों के माध्यम से दोनों कुलों के आबाद रहने की कामना को दर्शाता है।
सेना और परंपरा के द्वंद्व, समदाउन की सामूहिक रुलाई और 'जेवर बचा, अटैची गायब' के व्यंग्यात्मक अंत में एक युग का यथार्थ और लोक-जीवन का मर्म एक साथ बिंधा है।
भाषा की आत्मीयता, लोकगीतों की गूँज और ईमानदार भाव-प्रवणता इसे मात्र संस्मरण नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर बना देती है।
दिनाँक:11जून 2026
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"द्विरागमन (गौना): जब जेवर बचा, अटैची गायब"
(मिथिला संस्मरण – 1975)
डॉ लक्ष्मण झा 'परिमल'
आकस्मिक छुट्टी और गौने की उलझन
मिथिला में 'गौना' को 'द्विरागमन' कहा जाता है। लड़की का विवाह तो पहले हो जाता था, पर वह नैहर में ही रहती थी। ससुराल आने का शुभ मुहूर्त एक, दो या तीन साल बाद निकलता था। यह परंपरा मुझे सदैव अखरती थी।
उन दिनों मैं लखनऊ में सेना का प्रशिक्षण ले रहा था। आकस्मिक अवकाश अधिकतम दस दिन का ही मिलता था, वह भी बड़ी मशक्कत के बाद। प्रशिक्षण के दौरान छुट्टी के लिए कदम-कदम पर पेशी देनी पड़ती थी। कभी-कभी दक्षिण भारतीय सेना अधिकारी के सामने खड़ा होना पड़ता। वे पूछते, "छुट्टी क्यों चाहिए?"
सावधान की मुद्रा में खड़े होकर कहना पड़ता, "सर, मेरा गौना है। शादी के बाद पत्नी को घर लाना पड़ता है।" कनिष्ठ अधिकारी जब उन्हें यह रिवाज़ समझाते, तब कहीं जाकर छुट्टी मिलती। पहले दुमका आना पड़ता था। घर के विधि-विधान पूरे करने के बाद ही मधुबनी के लिए प्रस्थान संभव था।
गौने का दिन तय करना
मैंने अपने ससुर जी को पोस्टकार्ड पर पत्र लिखकर भेजा, "पिताजी का कहना है कि अच्छा मुहूर्त देखकर अगले साल ही द्विरागमन कर दीजिए। वैसे मिथिला पंचांग के अनुसार वैशाख शुक्ल तृतीया, दिनांक 28 अप्रैल 1975, सोमवार को अक्षय तृतीया है। यह दिन अतिउत्तम है।"
वे मान गए। वैसे मेरा विवाह आषाढ़ शुक्ल नवमी, दिनांक 28 जून 1974 को हुआ था। द्विरागमन एक वर्ष के भीतर हो जाना चाहिए, अन्यथा फिर अगले वर्ष ही होता है।
बारात
मिथिला में द्विरागमन के लिए भी बारात जाती है। दूरी अधिक होने के कारण मैंने अपने बड़े चचेरे भाई श्री रामकृष्ण झा और उनके छोटे भाई श्री हरे कृष्ण झा, जो गनौली, मधुबनी में रहते थे, उन्हीं को साथ लिया।
27 अप्रैल 1975 की शाम हम तीनों ससुराल पहुँचे। दालान पर हमारा स्वागत हुआ। रात में भाइयों के रुकने का प्रबंध दालान में ही किया गया। गाँव के बुज़ुर्ग और युवक आकर सबसे परिचित हुए। दालान पर दो-तीन लालटेनें जल रही थीं, इसलिए चेहरों पर छाया-प्रकाश का खेल चल रहा था।
मेरा परिछन
मुझे मिथिला की पारंपरिक लाल धोती, आसमानी रंग का कुर्ता और माथे पर शोभनीय 'पाग' पहनाया गया। शिवीपट्टी बड़ा गाँव है। फिर भी महिलाएँ, बूढ़ी माताएँ और लड़कियों का जमावड़ा शीघ्र लग गया। मुझे घर के भीतर ले जाने के लिए 'परिछन' होना था। सभी महिलाएँ परिछन गीत गाने लगीं:
"चलू-चलू सखिया, परिछन चलू सखिया...
दूल्हा अवध किशोर हे, परिछन चलू सखिया।
जिनकर रूप में जोर हे, परिछन चलू सखिया।
सखियाँ रघुवर के नैना रसीला है, चलू-चलू परिछन...
अच्छा धान तू भी लेने वो थारी, चलो सखिया…"
मधुर मैथिली धुन कानों को प्रिय लग रही थी। परिछन दूल्हे के स्वागत और आरती का प्रतीक है। महिलाएँ सूप या थाली में धान, दूब, सिंदूर और मिठाई लेकर द्वार पर आईं। मेरी आरती उतारी गई और फिर मुझे कोहबर में ले जाया गया।
गौना, समदाउन और घर-भरि
मैथिली लोक में 'समदाउन' गीत को बिरह-गीत माना जाता है। जब ब्याही लड़की द्विरागमन में ससुराल जाती है, तब यह हृदयविदारक गीत गाए जाते हैं। इस घड़ी में सारा समाज विलख-विलख कर रो पड़ता है। ये गीत दो-चार दिन पहले से ही शुरू हो जाते हैं।
भगवती के घर में 'घर-भरि' के लिए सब एकत्र हुए। 'घर-भरि' का अर्थ ही है कि वर और वधू दोनों के घर आबाद रहें, सुख-समृद्धि से भर जाएँ, कभी कोई कमी न रहे। आशा और मैं दोनों खड़े हुए। मेरे छोटे साले श्रवण झा ने अपनी बहन के दोनों हाथों में धान दिया। यह क्रम तीन बार दोहराया गया। मैंने आशा को तीनों बार पीछे और आगे धान फेंकने में सहायता की। मान्यता है कि आगे धान फेंकने से ससुराल भरता है और पीछे फेंकने से नैहर आबाद रहता है।
चुमाओन
इस विधि के बाद आँगन में मुझे बिठाकर सबने बारी-बारी से मेरे माथे पर तिलक लगाया और आशीष दी। मिथिला के पारंपरिक चुमाओन गीत महिला-मंडली गाने लगीं:
"होत चुमावन आज, सखी मंगल गाओ रे,
दीर्घायु हों जुगल जोड़ी, आशीष लुटाओ रे।
अम्मा चुमावे मन-मन हुलसे,
आशीष देवे भर-भर आँखें।
पापा लुटावे हीरा लाल,
देखो रे सखि रघुवर जी के,
होत चुमावन आज देखो रे सखि रघुवर जी के।"
विदाई
फिर हम विदा हुए। गाँव के सारे लोग रोने लगे। आशा विलख-विलख कर रो रही थी। मेरे ससुर रो रहे थे, और मैं भी अपने आँसू रोक न सका। दरवाज़े पर तीन टमटम लगे थे। सारा सामान रखा गया। मैंने बड़े-बुज़ुर्गों को प्रणाम किया और मधुबनी स्टेशन के लिए प्रस्थान किया।
जेवर बचा, अटैची गायब
आशा सदैव घूँघट में ही रहती थी। उसके साथ छोटा भाई श्रवण भी आया था। चचेरे भाइयों के कारण आशा को पर्दे में रहना पड़ता था। 29 अप्रैल को तड़के 2 बजे हम जसीडीह पहुँचे।
मैंने आशा से कहा, "जो भी गहने हैं, उन्हें पहन लो, क्योंकि अब हमें बस से जाना है। दुमका अब निकट है।" आशा ने गहने पहन लिए।
इसी बीच मैं दस कदम दूर चाय की दुकान पर गया। लौटकर देखा तो मेरी अटैची गायब थी। स्टेशन पर अंधेरा था। बिजली थी, पर मंद-मंद रोशनी में मेरी अटैची चली गई। शुक्र है, जेवर बच गया।
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डॉ॰ लक्ष्मण झा 'परिमल'
दुमका, झारखंड
11 जून 2026
