"सभा गाछी "
"सभा गाछी "
नमन"StoryMirror"दैनिक संस्करणविषय : लघुकथारचना : सत्य पर आधारितशीर्षक : सभा गाछीघोषणा : मौलिक स्वरचित अप्रकाशित
संदर्भ : सभा-गाछी की यह कथा मिथिला के वैवाहिक संस्कारों में व्याप्त क्षेत्रीय अस्मिता और संबंधों की जटिलता को दर्शाती है।'दछिनाहा' वर का मिथिलानी से विवाह का आग्रह अंततः परंपरा की विजय और आत्म-पहचान के प्रति अडिग निष्ठा का प्रतीक बन जाता है।
दिनाँक:30 जून 2026
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“सभा गाछी”{ सत्य घटना पर आधारित लघुकथा }
डॉ. लक्ष्मण झा "परिमल"===================सौराठ की सभा-गाछी में आज मानो रण का बिगुल बज उठा था। एक ओर सौराठ, दूसरी ओर पिलखवाड़। सौराठ के दबंग विजय झा अपने साथ कुछ उद्दंड युवकों की टोली लिए आए थे। कॉलर को ताव देकर वे पिलखवाड़ के कम्बल-डेरों के समीप जा ललकार उठे—"किस माँ के लाल में साहस है जो इस वर को सौराठ सभा से ब्याह कर ले जाए? इस वर का विवाह तो इसी गाँव, सौराठ में ही होगा!"यह सुनते ही पिलखवाड़ के विविध बासों से लोग उमड़ पड़े।
"क्या हुआ, क्या हुआ रे?" चारों ओर से यही प्रश्न गूँजने लगा।पिलखवाड़ के पहलवान रामचंद्र ठाकुर भी अपने चेलों-चपाटों संग वहाँ आ पहुँचे। देखते-देखते सभा-गाछी ही कुरुक्षेत्र बन गई। रामचंद्र बाबू भी हुंकार भर कर कूद पड़े।मिथिला में संबंधों की लता कुछ ऐसी फैली है कि हर गाँव, हर दूसरे गाँव से बंधा है। कुछ मान-मनौव्वल के बाद मामला शांत हुआ। सूर्यास्त होते ही सब अपने-अपने गाँव की राह लिए। पर मन में सबके यह बात थी—कल फिर सभा लगेगी।आज सौराठ सभा का प्रथम दिवस था, और महाभारत का शंखनाद भी हो ही गया—वह भी ऐसे वर के लिए जिसका जन्म और लालन-पालन दुमका में हुआ था। सुमंत वहीं पले-बढ़े, वहीं शिक्षा पाई। मैथिली बोलने में वे उतने प्रवीण न थे। ग्राम गनौली और ननिहाल पिलखवाड़ होने पर भी सब उन्हें "दछिनाहा" कहकर पुकारते थे। पर सुमंत की एक ही अभिलाषा थी—विवाह होगा तो मैथिल कन्या से ही। पिलखवाड़ उनका ननिहाल था, छोटी बहन और ज्येष्ठ भ्राता का ससुराल भी वहीं था।संयोगवश सभा-गाछी में ही सौराठ के श्री उदित नारायण झा की भेंट वर के पिता पंडित दशरथ झा से हो गई। दोनों स्वतंत्रता-संग्राम के दिनों के अभिन्न मित्र थे। सभा-गाछी से सटे पूवारि टोले में ही उदित बाबू का घर था। उनके आग्रह पर वर सुमंत, उनके भाई और पिता उनके यहाँ पधारे। उदित बाबू ने अपनी दौहित्री के लिए प्रस्ताव रखा। बाद में सुमंत को ज्ञात हुआ कि कन्या तो मुंगेर की है।सुमंत ने मन-ही-मन ठान रखा था—विवाह करूँगा तो मिथिला में ही। संकोच तोड़कर वे पिता से बोले—
"बाबूजी! मैं मुंगेर में विवाह नहीं करूँगा। जब सभा-गाछी आया हूँ, तो ब्याह मैथिल कन्या से ही होना चाहिए।"पुत्र का तर्क सुन पिता का हृदय आनंद से भर उठा। उन्होंने कहा—
"चलो, अब पिलखवाड़ चलें। वहीं बात आगे बढ़ेगी।"वैसे, एक प्रस्ताव पहले शिविपट्टी से भी आया था। वहाँ के प्रतिष्ठित हरि झा की कन्या के लिए सुमंत के ननिहाल पक्ष और ओझा-समाज सब लगे हुए थे। सभा-गाछी का यह महाभारत देखकर दलान पर बैठे बुजुर्गों ने निर्णय लिया—अब कोई सभा-गाछी की ओर नहीं फटकेगा। सबने सोचा—विवाह करना है, महाभारत थोड़े ही लड़ना है?रात होते-होते उग्रमोहन बाबू ने साइकिल उठाई और चल पड़े शिविपट्टी। वहाँ उनकी छोटी बहन ब्याही थी, इसीलिए सुमंत के विवाह की चर्चा चल रही थी। सभा-गाछी में उदित बाबू के प्रस्ताव पर जो गर्माहट हुई, उसकी जड़ में यही था कि शिविपट्टी के हरि बाबू और सौराठ के उदित बाबू आपस में समधी थे!भोर होते ही उग्रमोहन बाबू कन्यापक्ष को लेकर लौट आए। सिद्धांत पंजीकार से सिद्धांत लिखवाया गया, और दूसरे ही दिन मंगल-विवाह संपन्न हो गया।=====================
डॉ. लक्ष्मण झा "परिमल"
दुमका,
झारखंड
