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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Comedy

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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Comedy

"यमलोक की प्रैस कॉन्फ्रेंस "

"यमलोक की प्रैस कॉन्फ्रेंस "

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"यमलोक की प्रेस कॉन्फ्रेंस"(व्यंग -हास्य )

डॉ. लक्ष्मण झा 'परिमल'

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आज यमलोक में कोलाहल था, मानो युगों की नीरवता टूट पड़ी हो। धर्मराज का रत्नजटित सिंहासन अपने सम्पूर्ण तेज से दमक रहा था। उसके पार्श्व में चित्रगुप्त का आसन सुसज्जित था—मर्यादा और लेखे-जोखे का प्रतीक। विशाल सभागार में स्वर्णिम कुर्सियों की पंक्तियाँ बिछी थीं, और मणिदीपों की जगमगाहट ने वातावरण को अलौकिक आभा से भर दिया था।आज यहाँ एक अभूतपूर्व प्रेस वार्ता का आयोजन था। ठीक दस बजे के शंखनाद के साथ पत्रकारों का आगमन आरम्भ हुआ। कलम और कैमरे सतर्क हो उठे।तभी दो शस्त्रसज्जित द्वारपालों का स्वर गूँजा—

"होशियार... सावधान...

उठ खड़े हो जाएँ...

धर्मसभा के महालेखाकार, चित्रगुप्त महाराज पधार रहे हैं!"पीताम्बर धोती, स्वर्ण-मुकुट और रेशमी दुपट्टे से सुशोभित चित्रगुप्त ने प्रवेश किया। सबने नतमस्तक होकर अभिवादन किया।कुछ पल बाद पुनः उद्घोष हुआ—

"होशियार... सावधान...

त्रिलोक के न्यायाधीश, महाराजाधिराज यमराज पधार रहे हैं!"चार अंगरक्षकों से परिवेष्टित, पूर्ण राजसी ठाट-बाट में यमराज ने पदार्पण किया। उनके ललाट पर न्याय का तेज था, दृष्टि में युगों का भार।चित्रगुप्त खड़े हुए और हाथ जोड़कर निवेदन किया—

"महाराज, आज की यह सभा असाधारण है। मृत्युलोक से एक विचित्र प्राणी को बारह वर्ष के पश्चात आपके न्याय-सिंहासन के समक्ष लाया गया है। आज तक इसने एक भी प्रेस वार्ता नहीं की।मंचों पर इसकी वाणी आकाश चीरती थी, पर प्रश्नों के समक्ष इसके अधर सदा सिले रहे। कर्म के नाम पर इसने केवल वाक्-विलास किया। सम्पूर्ण देश का भार जिसके कंधों पर था, वह आज अपने साथ एक यंत्र-मानव ले आया है। मुख का मौन है, और शब्द यंत्र के अधीन हैं। जो जीवन भर टेलीप्रॉम्प्टर पर जिया, वह आज भी उसके बिना निर्जीव है।"यमराज की भृकुटि तनी। उनके कंठ से आदेश फूटा—

"अपराधी को प्रस्तुत किया जाए। कार्यवाही आरम्भ हो।"अंगरक्षक का स्वर गगन में गूँज उठा—

"मृत्युलोक के विचित्र प्राणी को उपस्थित किया जाए…"वह प्राणी सभागार में प्रविष्ट हुआ। उसके पीछे-पीछे एक विशालकाय यंत्र-मानव था—चमकता हुआ, पर आत्मा-विहीन। जो कभी मंचों से सिंह-गर्जना करता था, आज उसकी जिह्वा जड़ हो चुकी थी।यमराज ने गम्भीर स्वर में कहा—

"प्रेस वार्ता आरम्भ की जाए।"प्रश्नों की झड़ी लग गई। परन्तु उत्तर? यंत्र-मानव ने केवल रटे-रटाए शब्द उगले—निर्जीव, निरर्थक, निष्प्राण। पत्रकार ऊब गए, कलमें रुक गईं, कैमरे झुक गए। सभागार में व्यंग्य की एक धीमी हँसी तैर गई।अंततः यमराज भी खिन्न हो उठे। उन्होंने अपना दण्ड पटका और तीन बार गर्जना की—

"ऑर्डर... ऑर्डर... ऑर्डर!"सम्पूर्ण सभा स्तब्ध हो गई। यमराज ने निर्णय सुनाया—

"इस मौन-मुखर प्राणी को उत्तर देने का एक और अवसर दिया जाए। अगली तिथि 15 अगस्त, 2047 नियत की जाती है। तब तक यह अपने शब्द स्वयं खोजें, यंत्र नहीं। स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूर्ण होने पर देखेंगे—क्या तब तक यह बोलना सीख पाया?"शंखनाद हुआ। सभा विसर्जित हुई। सिंहासन सूने हो गए, पर व्यंग्य का एक प्रश्न हवा में तैरता रह गया—

इतने वर्षों तक जो प्रश्नों से भागता रहा, क्या वह पैंतीस वर्ष बाद भी अपने शब्द बोल पाएगा?

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डॉ. लक्ष्मण झा 'परिमल'
दुमका, झारखंड


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