"लाइट .....कैमरा ....एक्शन "
"लाइट .....कैमरा ....एक्शन "
नमन"StoryMirror"दैनिक सृजनघोषणा: स्वरचित मौलिक और अप्रकाशितविषय: प्रहसनशीर्षक: "लाइट.....कैमरा....एक्शन"विधा: हास्य व्यंग
विश्लेषण:यह व्यंग्य कोरोना-काल में बदले मनोरंजन माध्यमों पर कटाक्ष है जहाँ फेसबुक लाइव "लाइट-कैमरा-एक्शन" का दिखावटी विकल्प बन गया, मगर असल "एक्शन" आत्मप्रदर्शन में खो गया।श्रृंगार, नाम-गिनाई, बेसुरे पाठ और कमेंट-बंदी जैसे दृश्यों से रचना डिजिटल युग के रचनाकारों की आत्ममुग्धता और दर्शक की लाचारी को चटपटे बिंबों से उजागर करती है।
दिनाँक:4 जुलाई 2026
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"लाइट.....कैमरा....एक्शन"(डिजिटल युग का प्रहसन, एकदम चटपटा शॉट)
डॉ लक्ष्मण झा परिमल===============================कोरोना की लहर में बेचारे तीन शब्द... लाइट.....कैमरा....एक्शन... बॉलीवुड से ऐसे रफूचक्कर हुए जैसे बिजली का बिल देखकर मेहमान। फिल्म और टीवी की रगों में दौड़ते थे ये तीन शब्द। नायक-नायिका सजधज कर स्टेज पर खड़े, संवाद कंठस्थ, स्क्रिप्ट पर मेहनत पक्की। डायरेक्टर ने मुँह से "लाइट.....कैमरा....एक्शन" फेंका नहीं कि पूरा सेट हरकत में।फिर कोरोना आया और हॉलीवुड, बॉलीवुड, टॉलीवुड सबको क्वारंटीन कर गया। तीनों शब्द मुँह पर मास्क लगाकर मौन हो गए। मगर जनाब, कलाकार मरता है, कला नहीं। इन शब्दों ने भी ओटी छोड़ फेसबुक लाइव में नया मंच पकड़ लिया।यहाँ भी लाइट है, कैमरा है। बस "एक्शन" आते आते सबका दम फूल जाता है।सीन नंबर 1: श्रृंगार पर्व
लाइव शुरू हुआ। आधे घंटे का प्रोग्राम है। पहले बारह मिनट तो हमारे नायक महोदय का श्रृंगार-रस चलेगा। बाल के एक एक लट को सेट करेंगे, कुर्ते का कॉलर खड़ा करेंगे, कैमरे में आँख मारकर देखेंगे कि प्रोफाइल ठीक आ रही है कि नहीं। शास्त्रीय गवैया भी तबला मिलाते मिलाते इतना वक्त नहीं लेता, जितना ये महाशय अपने गाल के डिंपल सेट करने में लगा देते हैं। दर्शक का डेटा धुआँ हो रहा है, और उधर मेकअप जारी है।सीन नंबर 2: मिलन समारोह
श्रृंगार खत्म हुआ तो शुरू हुआ दरबार। "अरे वाह, डॉक्टर साहब आ गए। नमस्ते मिश्राजी। पांडेय जी, आपने तो लाइव की शोभा बढ़ा दी।" ये नाम-गिनाई तब तक चलती है जब तक आधा प्रोग्राम निपट न जाए। विषय? वो तो बेचारा विंग में खड़ा इंतज़ार कर रहा है।सीन नंबर 3: फटा बाँस पुराण
अब आती है कविता की बारी। आवाज़ ऐसी निकलती है जैसे छत पर कोई बाँस चीर रहा हो। गीत गाएँ तो ऐसा लगे कि लय रिक्शे पर बैठकर पूरब गई है और ताल साइकिल से पश्चिम गई है। श्रोता सोचता है, प्रवचन सुनने आया था, यहाँ तो नटुआ नाच और बेसुरा आलाप फ्री में मिल गए।सीन नंबर 4: कमेंट बॉक्स का पहरेदार
सब सहने के बाद सोचो कि चलो, दो शब्द झूठी तारीफ ही लिख दें। कम से कम हाजिरी लग जाएगी। मगर जैसे ही कमेंट बॉक्स में उँगली रखो, स्क्रीन पर टन से बोर्ड लटक जाता है: "केवल ग्रुप के सदस्य ही कमेंट कर सकते हैं"।अब आदमी अपना माथा पीटे। अरे भाई, हम तो इसी ग्रुप के जन्मजात सदस्य हैं। हमारी डीपी पर ग्रुप की मुहर लगी है। फिर ये कौन सा नया वीज़ा सिस्टम चालू कर दिया गया? लगता है एडमिन साहब ने एक्शन से पहले "सिक्योरिटी चेक" वाला सीन जोड़ दिया है। दर्शक बेचारा लाइक का बटन भी सहम कर दबाता है कि कहीं ग्रुप निकाला न हो जाऊँ।क्लाइमेक्स
और शिकायत करें भी तो किससे? इस पूरी फिल्म में लाइट मैन भी वही, कैमरा मैन भी वही, डायरेक्टर भी वही, और सेंसर बोर्ड भी वही।नतीजा ये है कि "एक्शन" शब्द अब संग्रहालय में रखा है। लाइव में अब जो है वो है: एडजस्टमेंट, आत्ममुग्धता, डेटा की बर्बादी, और कमेंट बॉक्स पर अलीगढ़ का ताला।बाकी आप सब बताइए, अगला लाइव कब देख रहे हैं? या फिर डेटा बचाकर कोई पुरानी फिल्म ही देख ली जाए?====================
डॉ लक्ष्मण झा परिमल
दुमकाझारखंड
