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Savita Negi

Inspirational


4.7  

Savita Negi

Inspirational


दृढ़ इच्छाशक्ति

दृढ़ इच्छाशक्ति

6 mins 291 6 mins 291

"निम्मो ओ निम्मो कहाँ है ?"

"क्या हुआ जीजी ,क्यों चिल्ला रही हो?"


"अपनी बिटिया को देख, चौधरी के बगीचे में बाकी बच्चों के साथ आम तोड़ने गयी है। तू तो बड़ा पढ़ाई -पढ़ाई करती फिरती है लेकिन तेरी छोरी को कोई मतलब न पढ़ाई से।"


निम्मो गुस्से में तिलमिलाती हुई हाथ में छड़ी लेकर बगीचे में पहुँच जाती है। माँ का विकराल रूप देख आशा सरपट घर की तरफ दौड़ लगाती है और निम्मो छड़ी लेकर उसके पीछे।

" तू आ तो हाथ मेरे, बचेगी न आज तू, हड्डी पसली न तोड़ी तेरी तो देखना... चिल्लाते हुए आशा की चोटी हाथ आ जाती है।

" अरे माँ! वो बस... स्कूल में मैडम जी नहीं आयी थी तो बस ... आम तोड़ने चले गए। छोड़ दे ..दर्द हो रहा है...अब से न जाऊंगी।"

" बहुत आम खाने का शौक चढ़ा है न तुझे..ले खा.... और खा.... एक बार फिर से आज आशा को छड़ी से मार पड़ी। ऐसा लगता था मानो छड़ी और आशा का पुराना नाता हो।


पूरा बदन लाल हो गया था। बेटी को मारकर भला कभी कोई माँ खुश हुई है। मार तो आशा को पड़ी थी लेकिन सीना छलनी खुद माँ का ही हुआ था। आँखों से गिरते आंसूओं को पल्लू से पोंछते हुए रुंधे गले से आशा को एक बार फिर प्यार से समझाती है,


" तू क्या समझती है मैं तेरी दुश्मन हूँ? तुझे यूँ मारकर मुझे मज़ा आता है क्या? लेकिन क्या करूँ तू गुस्सा भी तो दिला देती है। 

रोज स्कूल से गायब हो जाती है। पढ़ने लिखने में तेरा मन ही नहीं लगता है। कितने अरमान हैं मेरे की तू पढ़ लिख जाए , मेरे जैसा भाग्य न हो तेरा। काश! मेरे माँ बाऊजी ने भी मुझे पढ़ाया लिखाया होता तो आज स्कूल में यूँ आया का काम न कर रही होती। "


"स्कूल से अच्छा तो घर ही है माँ । कितना गंदा है, कोई भी लड़की न जाना चाहे वहाँ, खासकर उन पाँच दिनों में। शौचालय की हालत देखी?...

बेटी की बात सुनकर निम्मो सोच में पड़ गयी। वो भी उसी स्कूल में काम करती थी। लड़कियों को महीने के समय पूरा दिन स्कूल में बैठना वैसे ही बहुत मुश्किल होता है ऊपर से शौचालय ..... कुछ सोचकर आशा से बोली


" तू उसकी चिंता न कर मैं कल बड़ी मैडम से बात करूँगी ।तू बस अपनी पढ़ाई में ध्यान दे। वो जो मैथ वाली मैडम है न वो बोली थी मुझे, बिटिया को कोई दिक्कत हो तो मेरे पास पढ़ने भेज देना। "

आशा ने एक बार फिर बेमन से हामी भर दी। 

अगले दिन निम्मो स्कूल पहुँची तो सबसे पहले सभी मैडमों को बुलाकर अपनी बात रखी। 

"आधी से ज्यादा लड़कियाँ तो इस शौचालय की वजह से स्कूल नहीं आती हैं। लड़कियाँ नहीं पढ़ेंगी तो गांव के पास स्कूल खोलने का तो कोई मतलब ही नहीं रह जायेगा । एक स्त्री के लिए शिक्षा का महत्व क्या होता है ये आप सब से ज्यादा और कौन समझेगा?

कुछ करो न बड़ी मैडम जी।"


" क्या बात है निम्मो , हम पढ़े लिखे होकर भी इस बात को समझ नहीं पाए । पढ़ाई के प्रति तेरी जागरूकता देख कर बहुत अच्छा लगता है । हर माँ की सोच ऐसे ही होनी चाहिए। " बडी मैडम ने निम्मो की पीठ तपथपाते हुए कहा। 


बड़ी मैडम ने इस बात को उच्च अधिकारियों तक पहुँचाई और कुछ दिनों में ही लड़कियों के लिए अलग साफ सुथरा शौचालय बनकर तैयार हो गए। निम्मो बहुत खुश थी कि अब आशा स्कूल आने से न कतरायेगी।


परंतु आशा को अभी भी स्कूल जाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। शौचालय तो बहाना था। 

...आशा को पढ़ाई की बजाय खुद को शीशे में निहारते देख एक बार फिर निम्मो का खून खौल गया। 

" बोर्ड परीक्षा का समय नज़दीक है और तू अपनी शक्ल निहार रही है। इन किताबों में दिमाग क्यों नहीं लगाती?"

" क्या चौबीस घण्टे पढ़ाई- पढ़ाई करती रहती है। पढ़ाई नहीं हुई आफत हो गयी, शीशे में भी नहीं देख सकती ।"


"चुप कर एक दम ...मुँह बंद कर....वरना आज मैं खुद को रोक न पाऊँगी" .......

आशा सहम गई।

निम्मो का क्रोध आंसूओं के रूप में बह रहा था। 

"जानना चाहती है न क्यों हर वक़्त पढ़ाई के पीछे पड़ी रहती हूँ तो सुन.....


" अठरह साल में तेरे पिता का रिश्ता आया था । गरीब माँ बाप के घर बेटी बोझ से ज्यादा कुछ नहीं होती। पढ़ाई का मोल न वो समझते थे न मैं। कभी स्कूल की चौखट तक भी न गयी थी।

बात हुई और जल्दी हमारा ब्याह भी हो गया। तेरे पिता उस वक़्त पढ़ते ही थे। कुछ महीनों बाद आगे की पढ़ाई के लिए 

 शहर गए फिर वापस ही नहीं आये । बस एक चिट्ठी आई थी कि' उनको सभी माफ़ कर दे। वो शिक्षित हैं और आगे की जिंदगी भी शिक्षित स्त्री के साथ बिताना चाहते हैं। '


मेरे बारे में भी नहीं सोचा , तू तो पेट में थी , तेरा भी लालच न खींच सका उनको हमारे पास। 

खोजने भी कहाँ जाते किसी को कुछ नहीं पता था कि वो कहाँ रहते हैं ?कहाँ नौकरी करते हैं?

हमेशा की तरह एक स्त्री को उसका दुर्भाग्य समझ कर भाग्य के भरोसे छोड़ दिया गया। मैं परित्यक्ता कहलाई जाने लगी। माँ बाऊजी ने भी मुझे मेरे भाग्य के सहारे छोड़ दिया। ससुराल में काम करने वाली बनकर रह गयी। 

अचानक से लगने लगा एक स्त्री का कोई नहीं होता क्या? जीना था मुझे तेरे लिए। खेतों में काम करते करते समय बीत रहा था।

तुझे देखती तो ईश्वर से प्रार्थना करती थी कि तेरा भाग्य मेरे जैसा न हो। ....


"तू अपना भाग्य बदल सकती थी अगर पढ़ी लिखी होती। शिक्षा एक स्त्री के लिये सुरक्षा कवच है। उसके दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने के लिए। यूँ समझो माँ बाऊजी, पति इन सब से पहले शिक्षा एक स्त्री का सच्चा जीवन साथी है, जो उसे कभी धोखा नहीं देता।"....जब ये बात स्कूल की मैडम ने समझाई तो पहली बार शिक्षा का महत्व समझी थी ।

आज के परिवेश में बिना शिक्षा के सुंदरता या किसी भी गुण का कोई मोल नहीं । स्त्री शिक्षित होगी तो आत्मविस्वास के तेज से स्वयं ही सुंदर दिखेगी। उसे दहेज में शिक्षा का भंडार देना चाहिए ताकि वो खुद को इतना सक्षम कर सके कि उसे जीवन में दूसरे के सहारे की जरूरत न पड़े। तभी कसम खाई थी कि तुझे बहुत पढ़ाऊंगी, आत्मनिर्भर बनाउंगी उसके बाद ही तेरा ब्याह करूँगी।.....


"चलो माँ, रिबन काटकर स्कूल का उदघाटन करो।"


निम्मो अपने बीते कल से बाहर आई तो देखा पूरा गाँव उसका और उसकी बेटी -दामाद का स्वागत तालियों से कर रहा है।

निम्मो का चेहरा झुर्रियों से ढक गया था, बालों में सफ़ेदी की परत चढ़ी थी परंतु चेहरे की चमक आज कुछ और ही थी। आई. ए.एस बेटी और दामाद ने गांव में आधुनिक सुख सुविधाओं से पूर्ण गर्ल्स स्कूल जो खोला था। जिससे बेटियों को अच्छी शिक्षा मिल सके और वो आत्मनिर्भर बन सके। एक स्त्री की दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्प का परिणाम आज पूरे गाँव के समक्ष था।



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