दर्द
दर्द
राखी का त्यौहार जैसे -जैसे नज़दीक आ रहा था ,नमिता की आँखें जब -तब बरस जाती थी । न जाने उसकी आँखों में इतना पानी कहाँ से आ गया था । दोनों बच्चे और अमित सभी उसका दर्द समझते थे ;लेकिन हालात के हाथों मजबूर थे । वक़्त पर कब किसका ज़ोर चलता है ;हम सब वक़्त के हाथों की कठपुतलियाँ मात्र हैं ।
अमित नमिता को कितनी बार समझाते थे कि ,"नमिता ,संसार का नियम है जो आया है ,वह जाएगा भी । हम सब एक रेल यात्रा पर है ;जैसे -जैसे स्टेशन आते जाएँगे ,उतरते जाएँगे । कोई कल उतरा है ,कोई आज उतर रहा है और कोई कल उतरेगा । लेकिन उतरना सभी को ही । "
नमिता खुद को कितना ही समझाने की कोशिश करती है ;अभी खुद को सम्हाल ही रही थी कि रक्षाबंधन का त्यौहार आ गया । ऐसा त्यौहार जो कि है ही भाई-बहिन का । नमिताऔर उसकी बहिनों ने भी तो अपने इकलौते भाई को खो दिया । भाई चारों बहिनों से ही छोटा था । नमिता के बाद भाई का जन्म हुआ था । दादी कहती थी कि ,"मेरी निम्मो कितनी भाग्यशाली है ;अपने पीछे -पीछे भाई को भी लायी है । "
नमिता अपने छोटे भाई स्वदेश से 2 साल ही बड़ी थी ;इसीलिए वह और स्वदेश एक -दूसरे के अधिक नज़दीक थे । छोटा होने के बावजूद भी नमिता स्वदेश को भाईसाहब कहती थी । नमिता जब स्वदेश को बचपन में नाम से पुकारती थी तो स्वदेश नाराज़ होता था और कभी -कभी तो दोनों भाई-बहिन में मारकुटाई भी हो जाती थी । स्वदेश कहता था कि ,"नमिता ,मैं तेरे से लम्बा हूँ इसलिए तेरे से बड़ा हूँ तो तू मुझे भाईसाहब कहा कर । "
मारकुटाई के डर से नमिता स्वदेश को भाईसाहब ही कहने लगी थी और कहते -कहते भाईसाहब कहने की आदत ही पड़ गयी थी । आदतें जल्दी से छूटती कहाँ हैं और यह आदत न तो अच्छी थी एवं न ही बुरी थी ।
स्वदेश और नमिता बहुत लड़ते थे और शायद इसीलिए दोनों के मध्य प्यार भी बहुत था । एक बार तो स्वदेश ने नमिता को उस बोरे में डालकर घुमा दिया था ;जिसमें मिर्च आयी थी । नमिता को छींक पर जो छींक आयी पूछो ही मत । ऐसे ही एक बार खेलते हुए स्वदेश ने नमिता को घर के बाहर बने चबूतरे पर से गिरा दिया था । बेचारी नमिता का हाथ ही टूट गया था ।
नमिता की जब शादी हुई थी ;तब स्वदेश को नमिता से अलग करना मुश्किल हो गया था । स्वदेश का रोते -रोते बुरा हाल हो गया था । अब स्वदेश नमिता को छोड़कर वहाँ चला गया था ;जहाँ से कभी कोई वापस नहीं आता । नमिता के माँ -पापा तो पहले ही चारों भाई-बहिनों को छोड़कर स्वर्ग सिधार चुके थे ।
अब तो दोनों बड़ी दीदी के अलावा उसका मायके में कौन था ? स्वदेश के जाने के साथ -साथ नमिता को अपना मायका खोने का भी दर्द था । दिन एक -एक करके गुजरते गए और राखी का त्यौहार भी आ गया ।
नमिता सुबह से ही बुझे मन से एक मशीन की तरह सारे काम निपटाती जा रही थी । बच्चे और अमित चुपचाप ही थे । अमित की बहन ने राखी भेज दी थी । नमिता ने अपनी बेटी के लिए पूजा की थाली तैयार कर दी थी । तब ही घर की डोरबेल बजी । नमिता का भतीजा सिद्वार्थ आया था । उसने आते ही अपनी कलाई बुआ के आगे कर दी और कहने लगा कि ,"बुआ ,आप आये नहीं तो मैं ही आ गया । "
नमिता की आँखों में आँसू थे जिनमें भाई को खोने का दर्द तो था ही साथ ही मायके को पाने की ख़ुशी भी थी ।
