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Neha Bindal

Tragedy


4.5  

Neha Bindal

Tragedy


दोषी मैं हूँ!

दोषी मैं हूँ!

13 mins 355 13 mins 355

"बेटा तुम घबराना नहीं, मैं ठीक रहूँगी।"

"माँ, जल्दी करो, मुझे लेट हो रहा है।"

"बेटा, अंदर तक...."

"माँ, खुद जा सकती हो तुम। बच्ची नहीं हो। बेवजह मुझे देर कर रही हो। चलो अब उतरो जल्दी।"

"बेटा, अपना और बहु का ध्यान रखना।"

"हम्म माँ, तुम यहाँ रहोगी तो सब ठीक ही होगा। अब जाओ भी। ट्रैफिक मिला तो मेरी प्रेजेंटेशन खराब हो जाएगी। समझा करो न।"

वो अपनी छड़ी उठाकर, भरसक अपने गिरने को तैयार मोतियों को समेटती हुई गाड़ी से नीचे उतर आईं और वो उनका कैरी बैग नीचे उतारता हुआ सरपट गाड़ी भगा ले गया। माँ वापिस गाड़ी में आ बैठती तो!

वो अपना कैरी बैग खींचते हुए उस बड़े से गेट के भीतर घुस गईं। एक सदियों पुराना सा बोर्ड टंगा था उसपर, "माखन लाल चतुर्वेदी वृद्धाश्रम।"

अंदर जाते हुए उन्हें अपने बेटे के स्कूल का पहला दिन याद आ गया। एक शानदार बिल्डिंग में बना वो स्कूल अपनी प्रतिष्ठा जैसे अपने बनाव से ही टपका रहा था। सिल्क की सुंदर लेकिन सामान्य साड़ी में लिपटी वो अपने बेटे को दिलासा दे रही थीं,"बेटा, मैं अंदर नहीं आ सकती। मैं यहीं हूँ, बस यहीं गेटपर! कहीं नहीं जाऊँगी। जैसे ही तुम लौटोगे मैं यहीं मिलूँगी।"

"मम्मा, मुझे नहीं जाना न, प्लीज! मैं घर चलूँ आपके साथ?"

"बेटा, पढ़ना ज़रूरी है, मम्मा ने बताया था न तुम्हें! चलो अब अच्छे बच्चे की तरह जाओ। और सुनो, तुम्हारे बैग में एक सरप्राइज रखा है मैंने। अंदर जाकर खोलोगे तो मिलेगा।"

और आँखों में चमक और मन में माँ पर विश्वास लिए वो भीतर चला गया था। पूरे स्कूल टाइम वो वहीं खड़ी थीं, उसका इंतेज़ार करते हुए। जब लौटा था वो तो उसके चेहरे पर एक प्यारी मुस्कान थी,"यू आर द बेस्ट मम्मी इन द वर्ल्ड। आई लव्ड द चॉकलेट्स।"

उसकी मुस्कान देख उसके चेहरे पर भी एक कली खिल गयी थी। गोद में पुचकारती हुई वो उसे घर के लिए बढ़ गई थी।

समय कितनी जल्दी बीत जाता है न, उन्होंने तो तब भी उसे उसके सुखद भविष्य के लिए खुद से दूर किया था और आज भी उसके सुखद दाम्पत्य के लिए मन पर पत्थर धरकर वो यहाँ चली आईं थीं। बस फ़र्क़ इतना था कि वो एक उठती विशाल इमारत थी ठीक उस बच्चे की तरह और ये गिरती ढहती जर्जर इमारत थी ठीक उनकी तरह!

****

उन्होंने भीतर आकर रिसेप्शन पर अपना परिचय दिया और फिर उनका सामान उठाकर एक 10-12 वर्ष का बच्चा उन्हें उनका कमरा दिखाने ले गया। 10*12 का वह कमरा दो सिंगल पलंग, दो लोहे की अलमारी और दो कुर्सियों से लदा था। पूरे कमरे में दो समान के अतिरिक्त चहलकदमी की भी इजाज़त न देने वाली जगह थी। उस कमरे को देख एकबार फिर उनका मन बैठ गया।

जब बेटा बड़ा हुआ तब किस तरह एक इतने ही बड़े कमरे को उन्होंने बड़े चाव से उसके लिए सजाया था, वो कमरा उनकी आँखों के सामने फिर गया। अपने पति के साथ मिलकर उन्होंने उस कमरे में आधुनिक सुख सुविधाएँ देने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी। पति अक्सर झल्ला उठते,"इतनी तो मेरी आमदनी नहीं, जितना तुम खर्च किये डालती हो। कुछ सोचा भी है तुमने, इस छोटी सी तनख़्वाह में कैसे घर चलाता हूँ मैं?"

मुस्कुरा कर वो जवाब दिया करती थीं,"जो कटौती की जा सकती है वो मैं अपने घर खर्च में से किये देती हूँ साहिब, मेरे बच्चें के पीछे नज़रे न लगाओ आप।"

अक्सर उनकी बात सुनकर मियाँ जी चुप लगा जाया करते और अपने छोटे से परिवार के सुख में सुखी हो जाया करते।

जिसके पीछे सारी उम्र गर्क की, आज उसी बेटे ने उन्हें यहाँ ला पटका था। जहाँ बुनियादी सुविधाओं के लिए भी शायद उन्हें संघर्ष करना था!

सामान एक तरफ रख उस बच्चे ने बड़े ही प्यार से कहा,"माताजी, आप आराम कीजिये, शाम को मेट्रिन आकर आपको सभी से मिला देंगी और यहाँ का रोजाना का कार्यक्रम भी बता देंगी।"

यही वाक्य वो इतनी बार दोहरा चुका था अपने अब तक के जीवन में कि अब सब कुछ रट सा गया था।

वात्सल्य से उसे देखतीं उन्होने उसके सिर पर हाथ रखा तो वो भी उस ममतामई स्पर्श से खिल उठा। शायद अनाथ होने का अहसास ऐसे स्पर्श कम कर दिया करते थे!

उन्होंने अपना सामान एक कोने में रखा और सिर पर हाथ रखकर बैठ गईं। इस समय भावनाओं का ऐसा सागर उमड़ रहा था उनके सीने में कि घबरा रही थीं कि कहीं उसमें बहती कहीं दूर न निकल जाएँ! बहुत मुश्किलों से ज़ब्त आँसू आख़िर बह ही चले जिन्हें रोकने की ज़हमत भी न उठा सकीं वो।

शाम हो चुकी थी। मेट्रिन आकर उनको सब समझा रही थीं,"आपको अपने सारे कार्य खुद करने होंगे। बस खाना आपको आश्रम की तरफ से मिलेगा। उसके लिए भी आपको रसोई में अपनी सेवाएँ देनी होंगी। इस आश्रम में आपको तकलीफ न होने पाएगी, बस हो सके तो अपना व्यवहार मधुर रखें।"

काम से उन्हें कभी कोई आपत्ति नहीं रही। और व्यवहार! व्यवहार की याद आते ही उनकी आँखों से एक आँसू और छलक आया।

क्या कमी रखी थी अपने व्यवहार में कि आज यूँ बहु बेटे ने उन्हें घर का दरवाज़ा दिखा दिया?

मेट्रिन के टोकने से उन्होंने अपने आँसू पोंछे और खाना खाने आश्रम के मेस में पहुँच गईं।

एक ओर सारी औरतें और पुरुष समूह बनाकर खाना खा रहे थे वहीं दूसरी ओर उनकी थाली में रखे निवाले मुँह के भीतर जाने से इनकार कर रहे थे। जब मन नहीं माना तो वो उठकर वापिस अपने कमरे में चली आईं।

उनके कमरे की दूसरी स्त्री अब तक भी नहीं आईं थीं तो वह नितांत अकेली अपने अब तक के कर्मों के लेखे जोखे में व्यस्त थीं।

19 बरस की थीं जब ब्याह कर आईं थीं, उसके बाद से उन्होंने जीवन कभी अपने लिए नहीं जिया। अपने ज़माने की ग्रेजुएट थीं अंग्रेज़ी में। बेहतरीन तरीके से उन्होंने अपने पति की सीमित आमदनी में जीवन जिया। उस ज़माने में बाहर काम करने को ग़लत ही समझा जाता था तो उन्होंने अपनी डिग्री कहीं किसी पुराने ट्रंक में छिपा दी। और कर दिया पूरा जीवन पति और बेटे को समर्पित। ईश्वर ने उन्हें एक बेटा दिया और उन्होंने उसके लालन पालन में कभी कमी नहीं छोड़ी। एक सफल इंसान बनाने के लिए वो जितना कर सकतीं थीं, किया। पर शायद ये भूल गईं कि असली सफलता तो चारित्रिक सफलता है। जिसका भान उन्हें कभी न हुआ कि कब उनका बेटा असफल होता चला गया। अपनी सास- ससुर की उनके अंतिम पलों तक जी लगाकर सेवा करने वाली वो समझ ही न सकीं कि उनकी परवरिश में कहाँ कमी रही!

होश तब आया जब पति की मृत्यु हुई और बहु बेटे ने अपना रंग दिखाना शुरू किया। पति ने अपने जीते जी सारी संपत्ति बेटे को सौंप दी और उसी बेटे ने माँ को आज उनके स्वयं के सजाये आशियाने से यहाँ जर्जर आश्रम में ला पटका।

आँखों में कई सवाल लिए वो सोच में गुम थीं कि तभी उनके कमरे में उनकी साथी ने भीतर कदम रखा। एक लगभग 65-70 साल की महिला जिनके चेहरे से आश्रम में होने का दर्द नहीं बल्कि सुकून टपक रहा था। वो उन्हें देख रही थीं लेकिन कुछ धुँधलापन था आँखों में, अहसास हुआ आँसुओं का पर्दा था जिसने दृश्य को धुँधला किया हुआ था। उन्होंने अपने आँसू पोंछे और उनकी तरफ़ देखा।

उन्होंने आगे बढ़कर एक गिलास पानी उन्हें पकड़ाया और बोलीं,"नई हो न, आदत हो जाएगी।"

उनके इस सीमित वाक्य में भी कितना असीमित सत्य था ये उनसे छिपा न रह सका।

पानी पीकर उन्होंने धन्यवाद कहा तो वह अपना परिचय देती हुई बोलीं,"मैं निर्मल। आप?

"मैं अनुराधा!"

दोनों एक दूसरे को देख मुस्कुराई और फिर दोनों सोने चली गईं।

अगले दिन तड़के ही उनकी आँख खुली तो देखा निर्मल जी योगासन में व्यस्त थीं। वो उन्हें एकटक निहारती रहीं। उनके चेहरे पर गज़ब का आत्मविश्वास था जो अनुराधा जी को आकर्षित कर रहा था। उस पूरे दिन वो निर्मल जी की दिनचर्या देखने में ही खोई रहीं। वो कहीं से भी एक 65 साल की महिला नहीं लगती थीं। सुबह योगासन से शुरू कर अपने रोज़मर्रा के काम निबटाने तक और फिर आश्रम का एकाउंट्स संभालने से लेकर साथी महिलाओं के साथ गप्पे मारने तक वो हमेशा ही व्यस्त रहतीं। उनके चेहरे पर कोई शिकन अनुराधा जी को न दिखी। पूरा दिन वह व्यस्त रहीं और साथ ही खुश रहीं। वहीं अनुराधा जी के चेहरे पर सारा दिन एक उदासी छाई रही।

कई दिन निकल गए, अनुराधा जी अपने ग़म से बाहर नहीं आ पा रहीं थीं और दूसरी ओर निर्मल जी का व्यवहार उन्हें उनके बारे में ज़्यादा जानने को प्रेरित कर रहा था। साथी महिलाओं से भी कभी इस बीच उन्होंने निर्मल जी की निंदा न सुनी थी। सभी की चहेती थीं वो।

अनुराधा जी हैरान सी कई दिनों तक निर्मल जी की दिनचर्या व उनका चेहरा देखती व महसूस करती रहीं। बाकी महिलाओं और पुरुषों की अपेक्षा उनका चेहरा दमकता व खुश दिखता था। निर्मल जी भी अनुराधा जी की अपने विषय में उत्सुकता देख समझ रही थीं लेकिन उनके पहल करने की देरी थी।

एक दिन सारा दिन की भागदौड़ से निवृत होकर निर्मल जी जब कमरें में आईं तो अनुराधा जी अपने बेटे की तस्वीर को सीने से चिपकाए रो रही थीं। निर्मल जी के चेहरे पर एकाएक नापसंदगी के भाव आये लेकिन उन्होंने ज़ब्त करना ही सही समझा। काफी देर सुबकने के बाद अनुराधा जी ने बेटे की तस्वीर को किनारे रखा और हाथ में हड्डा और सुई धागा लिए कपड़े पर आकृति उकेरती निर्मल जी की ओर देखा और कहा- आपको अपने परिवार की याद नहीं आती? मैंने आपको कभी भी उन्हें याद करते या उनका ज़िक्र करते नहीं सुना। आप यहाँ इस तरह इतनी खुश कैसे रह पाती हैं?

निर्मल जी ने एक पल को उनका चेहरा देखा और कहा- आती है, बहुत याद आती है। लेकिन मैं अब इस सब से एड्जस्ट कर चुकी हूँ अनुराधा जी।

अनुराधा जी ने उनकी ओर अचंभे से देखते हुए कहा- आसान है क्या?

निर्मल जी बोलीं,"नहीं, आसान नहीं है। लेकिन उनके साथ रहकर उनके और अपने जीवन को दुष्कर करने से बेहतर मुझे यहाँ रहकर खुश रहना भाता है।

अनुराधा जी का संशय बढ़ता जा रहा था। वो बोलीं- आप यहाँ कब आईं और आपका परिवार कहाँ है?

निर्मल जी ने उन्हें मुस्कुरा कर देखा और बताना शुरू किया," मुझे यहाँ आये 10 साल हो गए हैं अनुराधा जी। मेरा बेटा बाहर विदेश में रहता है। पढ़ने के लिए मैंने ही उसे बाहर भेजा था, उसके बाद उसे वहीं नौकरी मिल गयी तो उसने वही रहना मंजूर कर लिया। वहीं की एक लड़की से शादी की। मेरे पति के रहने तक मुझे कोई दिक्कत नहीं थी। बेटा अपने जीवन में खुश था। गाहे बगाहे मुझसे और अपने पापा से मिलने भी चला आता था। मुझे वो अपने साथ ले गया था लेकिन मेरा वहाँ मन नहीं लगा। वहाँ मेरी भाषा या मेरे साथ का मुझे कोई नहीं मिला। इसीलिए मैं यहाँ वापिस चली आई। कुछ दिनों तक मैंने अपने पति के घर में निकाले लेकिन फिर मेरी ब्लड प्रेशर की दिक्कत के कारण मैं अकेले नहीं रह सकी और यहाँ आ गई। यहाँ आकर अब आप मेरी दिनचर्या देख ही सकती हैं।

अनुराधा जी उन्हें लगभग एक मिनट तक एकटक देखती रहीं जैसे जो कुछ भी उन्होंने सुना उसपर विश्वास करने की कोशिश कर रही हों, जैसे कि उसे पचाने की कोशिश कर रही हों!

"इतना आसान है क्या?" अनुराधा जी बोलीं।

"क्या?" निर्मल जी ने जवाब दिया।

"यूँ इस तरह अपनों से दूर रहना?"

" अपने? अपने कौन होते हैं अनुराधा जी? जिन्हें हम स्नेह दें और जिनसे स्नेह की उम्मीद रखें? मैं जिस दिन से यहाँ आई हूँ, मैंने यहाँ सभी से एक स्नेहबन्धन जोड़ा है जिसका सिला मुझे बहुत बख़ूबी मिलता है अनुराधा जी।"

अनुराधा जी जैसे किसी और ही जहां में खो गईं और अचरज से निर्मल जी को देखती रहीं।

" मैंने अपने बच्चों को अच्छी परवरिश दी अनु जी।

अनु जी कह सकती हूँ न?"

अनुराधा जी ने हामी भरी तो निर्मल जी आगे बोलीं," अनु जी, बचपन से हम बच्चों को रेस में लगा देते हैं, आगे बढ़ना है, पैसे कमाने हैं, ऊँचे स्कूल में पढ़ना है, फर्स्ट आना है। ऊँची डिग्रियाँ हासिल करनी हैं लेकिन इस सबमें उन बच्चों की मासूमियत हम छीन लेते हैं। भागना सिखाते हैं उन्हें लेकिन ठहरना नहीं सिखा पाते। नहीं बता पाते कि जीवन की रेस में न ठहरने से अक्सर साँस फूल जाया करती है। मैं आज भी याद करती हूँ तो सिहर उठती हूँ। 7 साल के बच्चे को मैंने ही बोर्डिंग भेजा था। उसकी सहमी आँखें कह रहीं थीं मुझसे, माँ मुझे नहीं जाना, मुझे आपके पास रहना है लेकिन मैंने उसकी आँखों की भाषा से ऊपर उसके जीवन की भौतिक सफलता को जगह दी। वो मैं ही थी जिसने उसे रिश्तों और संस्कारों से दूर कर जीवन में लक्ष्य हासिल करने की सीख दी। वो मैं ही थी जिसने उसे ये नहीं समझाया कि लक्ष्य हासिल करने का सुख तभी है जब उस लक्ष्य पर आपके साथ कोई हाथ थामे खड़ा हो। और वो भी मैं ही थी जिसने उसे विदेश जाकर पढ़ने और कैरियर बनाने की सलाह दी। उसकी ग़लती नहीं है अनु जी, दोषी मैं हूँ!आज उसके पास वो सब कुछ है जो मैंने उसके लिए चाहा, जो मैंने उसे दिया। बस वक़्त नहीं, होगा भी कैसे? मैंने भी कहाँ उसे वक़्त दिया। मैं भी तो बस पैसों की दौड़ में इस कदर अंधी हुई कि आगे पीछे कुछ न देख सकी। जिस तरह साल में 1 महीना मैं उसके लिए होती थी वैसे ही वो मेरे लिए है। उसकी ग़लती नहीं है अनु जी, मेरी है। और अब इस ग़लती पर हमेशा रोते रहने से अच्छा है कि मैं भी उसी तरह जीने की आदत डालूँ जिस तरह मेरा वो 7 साल का बच्चा बोर्डिंग स्कूल में रहा होगा। मुझे उससे कोई शिकायत नहीं। वो यहाँ से बेहतर जगह मुझे रखने को तैयार था। वहाँ का खर्च भी उठाने को तैयार था लेकिन अब मैं उससे कुछ नहीं चाहती। अपने पति के बिना रहकर मैंने बहुत समय तक मंथन किया और इस नतीजे पर पहुँची कि अब बाकी की उम्र मुझे दूसरों के लिए और उनके साथ जीनी है। बहुत पैसों और दिखावे के पीछे भागी मैं लेकिन अब और नहीं। साड़ियाँ बुनने का हुनर था मेरे पास, आज उसका प्रयोग करती हूँ और अपनी जीविका ख़ुद कमाती हूँ। थोड़ा बहुत खुद के लिए रख बाकी का आश्रम के लिए देती हूँ। काफ़ी बदलाव आ चुके हैं, काफ़ी लाने बाकी हैं, बस प्रयासरत हूँ। बस अब भौतिकता को छोड़ स्नेह को तवज्जो दे रही हूँ, शायद ये भी अपने स्वार्थ के लिए। आखिरी पलों में मैं बूढ़े हाथी की तरह अकेले नहीं मरना चाहती अनु जी, इस समय का स्नेह शायद तब काम आ जाये।"

बोलते हुए निर्मला जी की आँखें भर आईं।

अनुराधा जी की भी आँखे नम हो गईं लेकिन खुद को संभालती वो बोलीं," लेकिन मैं? निर्मल जी मैंने तो अपने सास ससुर का खूब ध्यान रखा, उनको कोई दिक्कत न होने दी। अपने पति और बच्चे का जितना मैं कर सकती थी उतना किया। आज मैं क्यों अकेली हूँ? मेरा बेटा मुझे यहाँ क्यों छोड़ गया?"

"कर्म, कर्म नाम की चीज़ भी होती है अनु जी। इसे आप अपना कर्म और भाग्य समझिए। लेकिन यदि आप देखें तो आपको अब भी क्या कमी है? आप पढ़ी लिखी हैं, कोई भी काम सीखकर अपना काम चला सकती हैं। अपने बेटे के साथ रहकर रोज़ के घुटने से बेहतर तो आपका यहाँ अपने जैसों के बीच रहना है। मैं मानती हूँ कि मोह नहीं छूटता लेकिन आप यहाँ के लोगों से मन लगाकर तो देखिए, आपको यहीं का मोह हो जाएगा। इंसानी प्रवृति यही है अनु जी। आप कोशिश तो कीजिये। हम क्यों किसी से उम्मीद रखें? क्यों किसी पर बोझ बनें? यदि हम उन्हें पाल सकते हैं तो खुद को भी पाल सकते हैं अनु जी बस थोड़ा सा अपने आपको मजबूत बनाने की ज़रूरत है।

बहुत रात हो गई है अनु जी, सो जाइये। " कहती हुईं निर्मल जी बिस्तर पर जा लेटी।

करवट बदलतीं अनुराधा जी के मन में निर्मल जी के कहे वाक्य शोर मचा रहे थे और सुबह का सूरज निकलने तक वह सम्मान के साथ जीने का फैसला ले चुकी थी।



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