दीपक तले अंधेरा
दीपक तले अंधेरा
दीपक अंधेरे में तो रोशनी करता है मगर उसके नीचे अंधेरा ही रहता है। इसी तरह कुछ लोग बाहर समाज में स्त्री शिक्षा, स्त्री रक्षा, स्त्री सम्मान, ऊंच नीच जात का कोई भेदभाव नहीं ऐसी बातें करते हैं ।
और समाज में इज्जत पाते हैं।
मगर जब आप उनको नजदीक से देखते हैं तब सारी असलियत सामने आती है, कि जो दीपक बनकर बाहर रोशनी फैला रहे हैं उनके घर के अंदर और उनकी सोच में कितना अंधेरा है। आज की कहानी इसी पर आधारित सेठ दीनदयाल की समाज में बहुत इज्जत थी।
वे स्त्रियों के तारणहार माने जाते थे। बहुत सारे संस्थानों से उन्होंने अपना नाम जोड़ रखा था।
पैसे के बल पर सब करा हुआ था। मगर जब उनके घर में घुसकर झांकने की किसी खोजी पत्रकार ने कोशिश करी तो पता लगा यह तो अपनी बेटी को भी आठवीं के बाद घर में बिठा दिया है ,
पत्नी से नौकरों जैसा सलूक करते हैं। और उसकी हमेशा बेइज्जती करते रहते हैं ।
और लोगों से छिपा कर काले धंधे करते हैं।
सर्वेंट्स और सफाई कर्मचारी उनको नीची जाति का बोलकर बहुत फटकारते हैं।
उस खोजी पत्रकार ने सारी बातें एक पेन रिकॉर्डर से रिकॉर्ड कर ली।
फिर जब मैं किसी से बात कर रहा था तो सेठ के किसी चमचे ने चुपचाप सुन ली और सेठ को बता दिया।
सेठ ने उसको बुला कर बहुत धमकाया और जान की धमकी दे डाली मगर वह टस से मस नहीं हुआ उसने कहा मेरे को जो करना है वह मैं करूंगा ही।
यह लोग तो बहुत ही होशियार होते हैं।
उसने वह रिकॉर्डिंग पहले से ही वहां भेज दी थी टीवी पर प्रसारित करने के लिए।
और वह उनसे झगड़ा करता रहा यहां तक कि दीनदयाल जी ने उसको जान की धमकी भी दे डाली थी। इस सब के दौरान ही टीवी पर वह सारी प्रसारित हो गई। और सब लोग बोलने लगे अरे यह दीनदयाल जी हैं।
यह तो कितने अच्छे हैं।
अच्छे दिखते थे मगर यह इनकी असलियत और लोग उनके नाम पर थू थू करने लगे।
सब बोलने लगे यह तो दीपक तले अंधेरा हो गया।
ज्ञान की बातें बाहर इतनी कर रहे हैं। और खुद के घर में ही खुद की सोच में ही अंधेरा फैला रखा है।
सरकार भी उनकी असलियत जान के उनके पीछे पड़ गई।
इनकम टैक्स वाले और सब काले धंधों की भी तपास चालू हो गई ।
स्त्री सुरक्षा की बातें भी सामने आई वहां भी घोटाले थे।
और उनको बहुत साल की जेल भी हुई। और सारा सम्मान भी चला गया और पैसा भी चला गया।
सच में ही दीपक तले का अंधेरा उनको खा गया
इसीलिए इंसान को बाहरी दुनिया को रोशन करने से पहले खुद की सोच को बदलकर अपने घर को पहले संभालना चाहिए।
फिर बाहर की दुनिया की वाहवाही लूटी जाए उसमें ही मजा है ।
नहीं तो दीनदयाल जी जैसे ऐसे कितने ही लोग हैं जिनके कर्मकांड जब सामने आते हैं तो कितनी तकलीफ होती है।
बुराई करने वाली बुराई रखने वाले इंसान का अंत बुरा ही होता है और लोगों की अच्छाई पर से विश्वास ही उठ जाता है। क्यों सही कह रही हूं ना।
