Swati Rani

Fantasy Horror


4.5  

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धनकपुर का रहस्य

धनकपुर का रहस्य

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सपनों कि दुनिया बहुत रहस्यमयी होती है, कुछ सपनें हसीन होते हैं, कुछ दुखद, कुछ हंसाने वाले ,कुछ भक्तिमय तो कुछ अजीब बहुत अजीब! 

मैनें तो यहाँ तक सुना है कि कुछ सपनों का पूर्वजन्म से भी नाता होता है या कुछ सपनें हमारे आने वाले समय का आईना होते हैं! 

कुछ सपने ऐसे होते हैं जो हमारे जिंदगी और मौत के बीच का फासला तय करते हैं!

ऐसे ही एक कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ ! 

मेरा तबादला मेडिकल आॅफिसर के रूप में सबसे बदनाम धनकपुर गाँव में हुआ! इसे मेरी बदकिस्मती कहिये या खुशनसीबी पता नहीं, क्योंकि बतौर डाॅक्टर ये मेरी पहली नौकरी थी, पर जितनों को मैनें धनकपुर के बारे में बताया वो सब डर ही जाते थे इस गाँव का नाम सुनकर! पर मैं शुरू से अकेले रहने वाला इंसान हुं,चाचा- चाची ने पाला था! भूत-प्रेत का नाम मेरे शब्दकोश में था ही नहीं! 

मैं जैसे धनकपुर गाँव उतरा, दो लोग राजीव (कंपाउंडर) और धनेश ( हेल्पर) मुझे लेने आये और कहने लगे सर जो घर आपको सरकार के तरफ से मिला है उसके बारे में कई अफवाहें है, कुछेक डाक्टर उसमें से रहस्यमयी तरीके से गायब हो चुके है, आपके लिये हमनें दुसरा रुम बुक कर दिया है! 

मैनें बोला, "जब सरकार ने घर दिया है तो मैं अपने पैसे क्यों खर्च करूं? मुझे सब पता है एक काफी चर्चित केस था यहाँ का डा. सुभाष के गायब होने का! 

"हां सर पर वो जगह काफी भूतिया है", राजीव के बोलते ही मैनें उसको घूरा! 

"ठीक है सर आप साथ चलिये, मैं सब साफ करवा देता हूँ, उसमें डा. सुभाष का कुछ सामान भी हैं", धनेश बोला! 

"मेरे लिये एक ही रुम काफी है उनके सामान को क्यों छेड़ना", मैनें उसकी बात काटते हुये कहा! 

सब साफ करने के बाद एक बुजुर्ग सी महिला भी ले आये वो जिसका नाम था धनवंती, दोनों ने कहा" सर ये सरकार के तरफ से दाई मिली है आपको झाड़ू पोछा, खाना बनाना, कपड़े धोना सब कर देगी, काफी सालों से जो डाक्टर यहाँ आता है यही सबका काम करती हैं"! 

"पर हमारा एक शर्त है बिटवा जब तक तुम इस घर में रहोगे तब तक ही हम सब काम करेंगे, अकेले नहीं रहेंगे इस में ", धनवंती हाथ जोड़ती हुयी बिहारी लहजे में बोली, उसके चेहरे पर डर साफ दिख रहा था! 

"ठीक है अम्मा", मैनें हंसते हुये मन में सोचा कि शायद ये अम्मा डरी हुयी है! 

मैं फ्रेश होकर सुभाष के रूम के तरफ गया, धनवंती अपना काम कर रही थी! 

वहाँ सुभाष के कुछ कपड़े और डायरी पड़े थे! मैं बोर हो रहा था सो उसकी डायरी लेकर बैठ गया! 

तभी धनवंती चाय लेकर आयी तो मैनें पुछा, "अम्मा आपको पता है ये डा. सुभाष के साथ क्या हुआ था? "! 

मेरा इतना कहना था कि धनवंती कांपने लगी और रोते हुए बोली, "हमको कुछ पता नही है बिटवा! हमको इस सब में नहीं घसीटों! हमको कुछ मालूम नहीं है"! 

"ठीक है अम्मा जाओ आप", मैनें कहा! 

फिर मै चाय कि चुसकियों के साथ डायरी के पन्ने पलटने लगा! 

वो डा. सुभाष कि जीवनी थी, मैं पढ़ने लगा! 

मैं सुभाष गुप्ता हुं और ये है मेरी जीवनी बड़े-बड़े मोटे अक्षरों मे डायरी के शुरुआत में ही लिखा था! 

अभी इतना ही पढा़ तब तक एक काली सी बिल्ली आयी, "मीयाऊं"! 

सच बोलुं तो मैं भी थोड़ा डर गया था! 

मैनें उठकर बिल्ली को भगाया और दरवाजा बंद कर दिया! 

उस डायरी के अनुसार पहला दिन था डा. सुभाष का धनकपुर गांव में, गांव कि खुबसूरती और गांव के लोगों का वर्णन था उसमें! इतना पढ़ते-पढ़ते मैं सफर का थका हरा नींद कि आगोश में चला गया! 

तभी अचानक लगा कि मुझे खिड़की से दो जोड़ी आंखे घूर रहीं हैं! 

आंखे खुली और मैं दौड़ कर बाहर गया, मैं सही था! 

वो एक लड़की थी करीब मेरे ही उम्र कि, पीले रंग के सलवार कमीज में, खुले काले लंबे बाल, वो काफी डर गयी मुझे देखकर! 

"कौन हो तुम और ऐसे चोर जैसे क्यों देख रही थी", मैनें डपटते हुये पुछा! 

"म.. मैं बसंती हुं", थोड़ी घबरायी हुयी वो अपनी बड़ी- बड़ी आंखे दिखाते हुये बोली! 

" ऐसे क्यों घूर रही थी, वो भी छुप कर? मैंने पुछा! 

"सर! मैनें सुना है आप गाँव में नये डाक्टर आये हो! क्या आप मेरे पापा का ईलाज कर दोगे?बसंती ने पुछा! 

" क्यों नहीं कल अस्पताल में ले आना अपने पिताजी को", मैंने कहा! 

"ठीक है सर",वो हंसती हुयी वहां से चल दी!


अगले दिन मैं वो डायरी ले गया और स्कैन करने वाले को दिलवा कर पेन ड्राइव में डालने बोला ताकि जब मैं चाहुं, अपने हिसाब से वो डायरी लैपटाप या मोबाईल में डाल के पढ़ सकुं, क्योंकि कुछ था उस डायरी में जो मुझे आकर्षित करता था या 

शायद वो उसी घर में एक डाक्टर कि जीवनी थी जो गायब हो चुके थे इसलिए मुझे ज्यादा कौतुहलता थी! 

"लिजिये सर इसको स्कैन करने में दो लोगों के प्रिंटर खराब हो गये बड़ी मुश्किल से तीसरे के यहाँ से करा कर लाया हुं", धनेश ने कहा!

" धन्यवाद धनेश", मैनें कृतज्ञता से कहा ! 


उस दिन राजीव छुट्टी पर था वरना वोही इनसब कामों में तेज था! क्योंकि धनवंती जैसे वो भी पिछले कई डाक्टरों के साथ काम कर चुका था, धनेश कि बहाली अभी-अभी हुयी थी! 

धनेश अस्पताल से निकला ही था कि पीछे से एक औरत तेज कदमों से मेरे तरफ आयी! देखने में वो महिला पढी-लिखी सभ्य लग रही थी! 

चुकि छोटा शहर था तो मैनें रिसेप्शन नहीं रखा था! चेहरे से लग रहा था कई दिनों से सोयी नहीं है वो आंखों के चारों तरफ बड़े-बड़े काले गड्ढे थे! एकदम हैरान परेशान सी लग रही थी! 

मै कुछ पुछता उससे पहले ही वो बोल पड़ी! 

"सर मैं एक न्यूज रिपोर्टर हुं, मेरा नाम है आलीशा! मुझे मेरे चैनल से निष्कासित कर दिया गया था, तो मैं चैनल वालों का विश्वास जितने के लिये कुछ अलग शुट करना चाहती थी कि चैनल को अच्छी टी.र.पी. देकर उनका विश्वास दोबारा जीत सकुं,सो मैं यहाँ के सबसे बदनाम राम सरोवर तलाब के पास गयी, उसका रहस्य पता करने"उसने कहा! 

" अरे पर वो तो काफी बदनाम तालाब है मैनें भी उसके बारे में बहुत कुछ सुना था यहाँ आने के पहले, आप को वहाँ नहीं जाना चाहिए था", मैनें कहा! 

"हां सर यहाँ का मशहूर केस डा. सुभाष वाला भी उस तालाब से ही संबंधित था, मैनें सोचा था ये अच्छा मौका है चैनल में अपनी साख जमाने का, ये केस सुलझा के, फिर इससे पहले भी मै अपने चैनल कि टीम के साथ भानगढ़ और कुलधरा जा चुकी थी! 

मैने जैसे उस तालाब को पार किया सामने बस एक ही घर था और उसके पीछे श्मशान,उसके बाद कुछ आबादी थी, मै चुपके से उस घर में गयी तो एक बड़ी सुंदर सी प्रौढ़ औरत कुछ तंत्र मंत्र कर रही थी! मै छुप कर देखने लगी! 

घर के छत पर अनगिनत शैतान उड़ रहे थे, भयानक अट्टहास करते हुये! 

वो उनसे वहां बोल रही थी कि बस अब कुछ ही दिन बाकी है मेरे 21 वर्षों कि तपस्या का नतीजा आने वाला है, उसके बाद मैं अमर हो जाऊंगी और मेरे पास काली शक्तियों का भरमार होगा! 

तभी उनमें से एक शैतान बोला "एक ही बार डा. सुभाष के जरिये 20 बलियां दी थी तुमलोगों ने बस एक बली के वजह से तुम्हारे पिता का अनुष्ठान अधूरा रह गया था, वो अनुष्ठान पुरा होने पर तुम्हारे पिता अमर हो जाते और तुम दोनों तमाम काली शक्तियों के मालिक बन जाते और हर पुर्णिमा पर तुमको हमें मानव बली भी ना देना पड़ता अपनी शक्तियों को जीवित रखने के लिये! 

हा.. हा... हा... कहते हुये वे भयानक अट्टहास करने लगे! 

"बस अब इंतजार समाप्त हुआ तुम लोगों को बली अवश्य मिलेगी और मैं अपना अधुरा अनुष्ठान भी जरुर पुरा करूंगी", प्रौढ़ औरत ने आंखे चमकाते हुये कहा! 

मै अपने फोन से ये सब शुट कर रही थी कि अचानक से मेरे हाथ से मोबाइल गिर गया और उसने देख लिया, मैं काफी डर गयी और फोन भी उठा ना पायी तभी वो औरत मेरी तरफ एकटक से देखने लगी थी और अपनी उंगली दिखा कर अपने पास बुलाने लगी मैं ना चाहते हुये भी उसके तरफ खिंचते चली गयी और उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं! 

फिर जब मुझे होश आया तो मैनें खुद को तालाब किनारे बेहोश पाया और देखा कि एक छोटी सी लड़की जो पानी से भिंगी थी ,जिसके बाल आगे कि तरफ थे और चेहरा उनहीं से ढका था, मेरे से थोड़ी दूर मेरे ही कपड़े हाथ में लिये जोर-जोर से वेदना से रो रही थी ,जैसे मैं उसकी तरफ गयी वो बोली दीदी आज के बाद सोना मत.. हा.. हा.. हा... जोर से हंस के वो उसी तालाब में कुद गयी और गायब हो गयी, मैं कुछ समझ ना पायी और जैसे वापस होटल में आयी, सब कुछ अजीब होने लगा मेरे साथ!


"क्या अजीब", मैनें कहा!

मुझे ऐसा लग रहा था जैसे आंखो के सामने भुतिया मूवी चल रही है! 

मेरे आस-पास हरदम वो पानी से भींगी हुयी बच्ची मेरे पहने हुये कपड़े अपने हाथों में लेकर जोर-जोर से विलाप करती दिखती है जैसे मैं मर गयी हुं और जैसे मैं सोती हुं मुझे एकदम अजीब सपनें आते हैं", उसने कहा! 

" कैसे सपनें?", मैनें कहा! 

"एक बार मैने देखा कि उस तालाब पार वाली औरत ने सपने में मेरे हाथ बांध कर उसी तालाब में फेंक दिया! मैं जोर-जोर से चिल्ला रही थी और वो औरत हंस रही थी मुझपर, ये कहिये मेरा वक्त पर नींद खुल गया और मैनें अपने बेड पर चारों तरफ पानी ही पानी पाया और उठने के बाद भी मेरा दम घुट रहा था! यानी अगर मैं वक्त पर ना उठती तो मैं मर गयी होती", आलीशा ने कहा! 

"ये कैसे मुमकिन है",मैनें कहा! 

"यकीन मानिए डाक्टर साब ना मैं सो पा रही हुं ना जग पा रही हुं", कहकर वो जोर-जोर से रोने लगी! 

 

मुझे लगा ये मनोरोगी है तो मैने उससे दवाई देने के पहले कुछ कागजात साईन करा लिये क्योंकि वो अकेली थी कुछ होने पर मेरी जवाबदेही होती और मामले कि नजाकत को देखकर उसने भी साईन कर दिया! 

मैने उसको उससे बिना बताये नींद कि इंजेक्शन दी कि वो शायद थोड़ी देर सोयेगी तो आराम आयेगा! 

जैसे वो नींद कि आगोश में जाने लगी चिल्लाने लगी ये क्या कर दिया आपने डाक्टर साब वो डायन मुझे मार देगी! 

जैसे वो सोयी ऐसा लगा जैसे उसको कोई अनगिनत थप्पड़ मार रहा है शरीर पर निशान और घाव दिखाई देने लगे और थोड़ी देर में वो मर गयी! 

मैं आश्चर्यचकित था पोस्टमार्टम में उसके मृत्यु का कारण हृदयाघात आया, कई दिनों से नही सोने और मनोरोग के वजह से ये हृदयाघात और खुद को नुकसान पहुंचाने कि कोशिश हुयी है,मैने रिपोर्ट में यही लिख कर दे दिया! डाक्टर कहा फंसते है भला! वो लड़की अभी न्यूज़ चैनल में थी भी नहीं सो मामला आया गया हो गया!


एक दिन मैं रुम में बैठ कर सुभाष कि जीवनी मोबाइल में पढ़ रहा था, उसमें एक सुंदर सी औरत मंजु के बारे में चर्चा थी, डा.सुभाष उसके प्यार में पड़ गया था, उस डायरी में उन दोनों का छुप-छुप कर मिलना और रुमानियत भरे पलों का जिक्र था!दोनों छुप-छुप कर राम सरोवर तालाब के पास मिला करते थे, क्योंकि वो बदनाम तालाब था और काफी सुनसान जगह थी और प्रेमियों के लिए ऐसी जगह उपयुक्त होती है! हालांकि इस डायरी में उनके द्वारा कोई भयानक अनुभव नहीं लिखा गया था! 

मेरी दिलचस्पी डायरी में बढती जा रही थी! 

तभी धनवंती कि आवाज ने मेरी तंद्रा तोड़ी वो दौड़ते हुये आयी और बोली" बिटवा सुने हो हमको कोई औरत के रोने का आवाज सुनाई दिया है अबे"! 

मैं वहाँ गया और देखा कुछ नहीं था तो तमककर बोला, "क्या अम्मा खाली शक करती हो, मैं हूँ ना जाओ काम करो और हां ज्यादा डर लगे तो हनुमान चालीसा पढ़ लेना"! 

वापस आकर देखा तो मोबाइल मे डा. सुभाष कि जीवनी खुली हुयी थी उसके अक्षर काले,गहरे और बड़े हो गये थे, मैं थोड़ा हैरान हुआ पर सोचा कि कुछ दब गया होगा मोबाइल में, फिर अचानक याद आया आज बसंती के पापा को आना था अस्पताल में,फिर मैं सरपट तैयार होकर भागा! 

बसंती का ये तीसरा बार आना होना था मेरे अस्पताल पर उसके पापा को मधुमेह कि शिकायत थी कई दफा बेहोश हो चुके थे! इसलिए अब ये लोग तसल्ली से उनका ईलाज करा रहे थे!


इलाज के दौरान बसंती और मेरी नजदीकियां बढ़ने लगी मैं जान बुझ कर बसंती को कभी दवाई तो कभी रिपोर्ट के बहाने अपने अस्पताल बुलाने लगा, बसंती भी सब समझते हुये खुद को आने से ना रोक पाती! हम दोनों एक दुसरे के प्यार में पड़ चुके थे और खाली टाइम में हम दोनों कहीं -कहीं घुमने जाने लगे! बसंती कि चुलबुली अदायें उसका लड़कपन पता ना क्यों भाता था मुझे! 

फिर बहुत दिनों बाद अचानक जब थोड़ा बसंती से मेरा ध्यान हटा तो मुझे मेरे मोबाइल मे वो डा. सुभाष कि जीवनी याद आयी! 

मैं मन में सब काम निपटाने के बाद इतमिनान से उसको पढ़ने कि सोचने लगा! 

 धनवंती अब मुझसे घुलने लगी थी वो जब खाना लेकर आयी तो बोली "तुमको पता है बिटवा यहाँ शुरू से बच्चे बहुत गायब होते है, पिछले कई डाक्टर तो पैसा लेकर कन्या भ्रुण हत्या भी करते थे तुम तो नहीं करते हो ये सब? "! 

"नहीं अम्मा ये सब पाप है, मैं नहीं करता और मेरे आगे पीछे है कौन जिसके लिये मैं गलत तरीके से पैसा लेकर जमा करूं, जितना कमाता हुं काफी है मेरे लिये"मैने कहा! 

धनवंती मेरे जवाब से संतुष्ट दिखी! 

तभी मैनें उससे कहा,"अम्मा आजकल रोज रात में कई दिनों से कभी छोटे बच्चियों तो कभी प्रौढ़ औरत कि सिसकियां सुनाई देती हैं और जैसे बाहर जाता हूँ, कुछ नहीं दिखता"! 

"बेटा ऐसे आवाज पुरे शहर में सुभाष बाबु के वक्त से आम बात है,लोग बोलते है यहाँ रात में सुंदर चुड़ैलें और बच्चों के आत्मा घुमते है, तभी तो रात में 12 बजे के बाद कुछ भी हो जाये कोई अपना किवाड़ नहीं खोलता है, यहाँ तक की पुलिस भी पहरा देने से कतराते हैं, हम सोचते थे कि तुमको ये सब बता दें पर तुम भूत-प्रेत नहीं मानते थे और इस भूतिया घर में रहने भी आ गये तो कुछ नहीं बताया, डा. सुभाष भी ऐसे ही किसी चुड़ैल के चंगुल में फंस गये थे सब बोलते हैं और बिटवा किसी को बताना मत उनका नाम तो बच्चों के मानव अंग तश्करी से भी जोड़ा जाता है,अच्छा बेटा अब चलते हैं, अपना ध्यान रखना", कहते हुये धनवंती चली गयी! 

मैं इन सब बातों से अंजान था क्योंकि मेरा सरकारी घर शहर से थोड़ा हटकर एकांत में था, उसके जाने के बाद मैं मोबाइल में डा. सुभाष कि जीवनी और उत्सुकता से आगे पढ़ने लगा!


उस जीवनी में लिखा था मंजु आम लड़कियों से अलग थी, उसके शौक भी अलग से ही थे, आखिर मंजु मिली भी थी सुभाष को उसी तालाब के किनारे!उसी तालाब में मछली मारना, जो सब मना करें वही करना, एक बार तो सुभाष ने रात में मंजु से शर्त लगायी कि वो अकेले तालाब के पास से घुम आये तो वो इतनी निडर थी कि घुम के भी आ गयी! सुभाष बार-बार मंजु से जिद करता रहता कि वो अपने पापा से मिलाये पर वो टालते रहती! पर सुभाष मंजु के प्यार में पुरा पागल हो चुका था और हो भी क्यों ना दोनों को साथ 6 साल हो चुके थे,दोनों ने गुप-चुप शादी भी कर ली थी,पर वो थी कि छोटे से काम के लिए वक्त मांग रही थी! 

इतना पढ़ा ही था कि अचानक मेरा फोन बंद हो गया जबकि बैटरी फुल चार्ज था! मैंने सोचा बैटरी कि प्राब्लम होगी शायद और फोन चार्ज पर लगाकर मैं सो गया! 

आधे नींद में था तभी अचानक भयानक चित्कार हुयी और बाहर किसी औरत के जोर-जोर से रोने कि आवाज आयी, मैं बाहर जाके देखा तो कोई नहीं था ,मेरे कदम अनायास ही तालाब के तरफ मुड़ गये, मैं खुद के बस में ही नहीं था बस मंत्रमुग्ध सा चला जा रहा था, तभी अचानक बसंती ने मुझे रोका" आप कहाँ जा रहे हो "! 

"अरे कुछ नहीं मैं ऐसे हीं, तुम इतनी रात गये यहाँ क्या कर रही हो", मैं उल्टा बसंती से ही पुछ बैठा! 

"अरे मेरे पापा कि शुगर बढ़ गयी है और उनकी दवाई नहीं थी तो मैं बगल के शहर से वो दवाई अपने चाचा के साथ लेकर लौट रही थी, चाचा को कुछ काम था सो उधर ही रूक गये और मै घर जा रही हुं", वो काफी परेशान भी दिख रही थी, बसंती कि बातों में हरदम उसके चाचा का जिक्र रहता था हालांकि मै मिला नहीं था कभी उनसे! 

" मै भी बस टहल ही रहा था", मैनें बसंती से झुठ बोल दिया! 

"अरे पर इस भयानक तालाब के पास क्यों घुमना है, आप रुको मैं आपको कल घुमाने ले चलुंगी ",वो हंसते हुये बोली! 

मै अपने घर वापस आ गया,वो भी चली गयी, पर इस घटना के बाद मैं थोड़ा परेशान रहने लगा! 

अगले दिन मैं और बसंती मोटरसाइकिल पर बगल वाली पहाड़ी घुमने निकले, रास्ते में एक भयानक पड़ता जंगल था! 

बसंती और मैं बातें कर रहे थे! मैने कहा कि बसंती कुछ दिन बाद हमदोनों शादी कर लेंगे! 

बसंती ने कहा", अभी नहीं मुझे थोड़ा वक्त चाहिए! 

इतना सुनना था कि अचानक से मेरा मन अपनी कहानी सुभाष, मंजु से जोड़ने लगा, पर बसंती ने तो मुझे अपने पापा से मिलाया है, ऐसे भी जब प्यार होता है लोग अपने तर्कों का खुद समाधान निकाल लेते है! मैने भी अपने मन में उठे सारे सवालों को खुद ही शांत कर लिया! 

तभी अचानक से आवाज आयी "धड़ाम"! 

मैने पीछे मुड़कर देखा तो बसंती मोटरसाइकिल से गिर चुकी थी और कुछ अंजान काली आकृतियाँ उसको उठाकर ले जा रहीं थी! मैं बाईक से उनका पीछा करने लगा पर वो काफी तेज गति से चल रहीं थी तो मैं बस इतना देख पाया कि वो तालाब के तरफ बसंती को ले गये थे! 

उस पार अकेले जाना मतलब मौत को न्योता देना मैने फटाफट अपना फोन निकाला और एक अच्छे जगह पर जाकर सुभाष कि जीवनी पढ़ने लगा कि शायद इसमें इसका कोई हल हो! 

उसमें लिखा था कि मंजु ने सुभाष से शादी कि एक शर्त रखी थी कि वो उसको 21 नवजात शिशु भेंट करेगा बिना सवाल किये जिसका कारण उसने बताया कि वो अपने पापा को उसी के लिये मनाने के लिये अनुष्ठान कर रही है, जिसमें अंतिम दिन वो उसको भी पिता से मिलाने ले जायेगी! सुभाष मंजु के प्यार में सही गलत का भेद ना समझ पाया! वो जैसा बोली वो करता गया पर अंत में उसका जमीर उसको कचोटने लगा, उसने मंजु को 20 वां नवजात शिशु भेंट देने से मना कर दिया! अब मंजु ने सुभाष को फुसलाने के लिये बताया कि उसके पेट में सुभाष का दुसरा बच्चा पल रहा है! मंजु के पापा एक तांत्रिक थे, वो चाहती थी कि पापा को वो अनुष्ठान पुरा कराके उनको खुश करेगी और अंत में दोनों कि शादी कि बात करेगी! 

सुभाष को पल में मंजु का बात बदलना अटपटा लगा, वो इस बार मंजु कि बातों में ना आया! 

डायरी के अनुसार सुभाष मंजु के पापा से उसको बिना बताये मिलने जाता है और छुपकर देखता है कि उनके एक बच्ची जिसको मंजु मरा हुआ बतायी थी और चुपके से नर्स से पैदा करा ली थी,वो भी सुभाष के आंखो के सामने 20 वीं नरबलि कि आहुति चढ़ गयी! 

सुभाष खून का घुंट पीकर रह गया क्योंकि उस वक्त विरोध का मतलब था उसका और मंजु के गर्भ में पल रहे उसके बच्चे का मौत! 

सुभाष को समझ आ जाता है कि वो बाप और बेटी के साजिश का एक हिस्सा था! 

अब सुभाष का सिर्फ एक उद्देश्य था किसी तरह मंजु को फुसला कर उसके गर्भ से अपने बच्चे को बचाना! 

उसके लिये सुभाष ने मंजु को एक महिने तक फुसलाया और बच्चा खुद पैदा किया पर मंजु को बताया वो मृत था और उस बच्चे को राजीव(कंपाउंडर) के हाथों उसके चाचा-चाची के यहाँ भेज दिया! 

फिर मंजु के पापा ने अगले पुर्णिमा तक अंतिम बली ना मिलने और अनुष्ठान पुरा ना कराने के खुन्नस में सुभाष को मार दिया! 

डायरी में उसके आगे के पन्ने खाली थे! 

कहीं ये बसंती भी तो उसी तांत्रिक कि कोई बेटी तो नहीं, कहीं मेरा भी हश्र सुभाष जैसा तो ना हो जायेगा, ये सब सोचकर मैं तालाब पार नहीं गया बसंती को बचाने, पर बसंती कि याद मुझे हरपल आती थी! 

पर मैं कुछ कर भी तो नहीं सकता था! 

अचानक एक दिन मैं अस्पताल से घर आया तो देखा बसंती सुभाष कि डायरी के पन्ने उलट रहीं थी! 

ये क्या बसंती कहा थी तुम इतने दिन,कैसी हो और ये डायरी क्यों लिया है तुमनें "मैने झटक कर उससे वो डायरी ले ली और उसका हाथ थामते हुये पुछा! 

"उस दिन मैं तुम में बचाने ना आ पाया क्योंकि मेरा खुद एक्सीडेंट हो गया था", मैं खुद ही अपनी झुठी सफाई दे दिया उसके पुछने के पहले! 

बसंती ने ज्यादा कुछ कहा नहीं बस बोली ठीक किये तुम नहीं आये वो जगह काफी खतरनाक है और वो बोली आकर उसको सब समझायेगी! 

मैं बसंती के ऐसे जवाब से हैरान था, क्योंकि मुझे उससे गिले शिकवे कि उम्मीद थी! 


बसंती हड़बड़ी में थी, उसके पास वक्त कम था सो फटाफट उसने अपने कुछ सामान लिये और गांव वालों के साथ तालाब के पार चल पड़ी बिना मुझे कुछ बताये! 

उधर जाकर वो घर के अंदर देखती है तो हैरान तो नहीं रह जाती है क्योंकि वो सब डायरी में पढ़ चुकी थी, सामने एक प्रौढ़ औरत के गोद में मैं सोया हुआ था और वो अपना हाथ मेरे सर पर फेर रहीं थी, मैनें शिकायती लहजें में कहा" माँ 21 साल तुमसे अलग रहा तुमको मेरी याद ना आयी"! 

"बेटा तुझे बचाने के चक्कर में ही तो मुझे सुभाष को ठिकाने लगाना पड़ा", प्रौढ़ औरत ने मुझे कहा! 

"झुठ-झुठ बोल रही है ये सच मैं जानता हुं अचानक से राजेश जो बसंती के साथ आया था बोल पड़ा ये औरत तो तुम्हारी बली भी दिलवा देती अपने पिता के अनुष्ठान को पुरा करने के लिये वो तो भला हो सुभाष बाबू का कि जब तुम इसके पेट में थे तो तुमको निकालकर मुझे दे दिया कि मैं तुमको चाचा-चाची के यहाँ दे आऊं, वरना ये तुमहे भी कबका झोंक देती अपने बाप के पागलपन में क्योंकि वो बच्ची जो सब मरने वालों का कपड़ा लेकर रोती है वो तुम्हारी बहन ही थी"! 

"हा.. हा.. हा वो मेरे षड्यंत्र का हिस्सा था पागल औदमी! मुझे इस बच्चे को 21 वर्षों तक मानव में रखकर डाक्टर बनाना था ताकि आगे मेरे बलि की राह आसान रहे!पति धोखा दे सकता है पर अपना खुन नहीं!मेरे लड़की कि बली मैने इसलिए दी क्योंकि मुझे लड़कियों से नफरत है और सुभाष ने मुझे बता दिया था कि इस बार मेरे गर्भ कि संतान लड़का है,अगर मैं लड़का होती तो मुझे किसी सुभाष को फसाने कि जरूरत ना पड़ती,जो अनुष्ठान बलि ना मिलने से पापा ना पुरा कर पायें हम दोनो माँ- बेटे करेगें! तुमलोगों को लगा मैं इससे दूर थी पर मैं हरदम इससे मिलती थी", मंजु ने मेरी ओर देखकर कहा और हम दोनों हंस पड़े! 


" फिर वही मौत का तांडव शुरू करवाना चाहते हो दोनों जो सुभाष जी ने शुरू किया था, 

उस दिन चुपके से मैंने डायरी के पेज का फोटो मोबाइल में ले लिया था, और तुम समझे कि डायरी तो तुम्हारे हाथ में है ही! 

इस औरत ने मेरे भी सपने में आकर मुझे तंग करना चालू कर दिया है, पर मैने सुभाष जी के डायरी और राजेश से ये जान लिया है कि इन दोनों पर कैसे जीत हासिल करनी है,अभी पूर्णिमा में वक्त है उसी दिन बली देनी होती है तुमलोगों को इन भयानक आत्माओं को! 

तुम्हारा बेटा मदद करेगा इसमें", बसंती चिल्लाती! 

"ओ अब समझ आया इसी ने चाल से उस न्युज रिपोर्टर आलीशा को ठिकाने लगाया जब वो इस औरत कि सच्चाई जान गयी थी,अब ये ही सही वक्त है इन दोनों को खत्म करने का", राजीव बोला! उसके चेहरे पर शुद्धता के भाव थे! 

बसंती और उसके चाचा ने फटाक से उसको और मुझे एक खंभे से बांध दिया! बाहर गांव वाले भी खड़े थे सो हम ज्यादा कुछ ना कर सकें! 


तभी बसंती कहने लगी कि" तुम दोनों मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते, बहुत तंग कर लिया मुझे सपने में तुने मंजु और सुन ओ डाक्टर मैं तुम्हारे बच्चे को जन्म नहीं दुंगी और ये मौत का सिलसिला यही रोकुंगी और शहर को तुम जैसे नरभक्षियों के चंगुल से निकालुंगी! अपने सपने में जाकर ही दोनों को मारुंगी, क्योंकि वहाँ मै जो चाहुंगी वही होगा और तुम्हारी आत्मा वहीं उसी दुनिया में कैद हो जायेगी हरदम के लिये! 

बसंती ने ढेरों अलार्म 10 मिनट के सेट किये कि अगर हम दोनों उसको कुछ करें तो वो फटाक से सपनों से हकिकत कि दुनिया में आ सके और फिर वो नींद कि गोली लेकर सो गयी! 

मै और मेरी माँ शैतानी शक्तियों का आवाहन करने लगे कि वो हमारी मदद करें! 

वो आये और बोले हमलोग शक्तिहीन है बली ना मिलने के कारन इसलिए बस थोड़ी ही क्षमता दे सकते है बसंती के सपने में घुसकर लड़ने को! क्योंकि सब कुछ हुआ भी अचानक था! 

नींद में बसंती ने बंधी हुयी मेरी माँ और मेरे ऊपर पेट्रोल छिड़का , हम दोनों ज्यादा विरोध ना कर पायें क्योंकि शक्तिहीन थे, फिर उसने आग लगा दिया, मेरी माँ और मैं धूं-धूं कर जलने लगे! आखिरकार बुराई का अंत हो गया! 

बाद में तालाब के सफाई से कितने मानव कंकाल 

निकले, सबका अंतिम संस्कार किया गया! 

अचानक माँ कि आवाज आयी, " उठ बे नालायक इतवार है तो क्या उठेगा ही नहीं"! 

मैं आंखे मलते हुये अपनी ख्वाबों कि रहस्मयी दुनिया से वापस आ चुका था, मुझे विश्वास नहीं हो रहा था मेरे भूतिया फिल्म देखने और स्टोरिमिरर पर कहानी लिखने का ऐसा नशा होगा कि मैं सपने में भी कहानियाँ बना पाऊंगा!


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