धानी और कुँवर-सा
धानी और कुँवर-सा
बन्नी बुआ, धानी के बालों में खोपडे का तेल मल कर चोटी बनाने में व्यस्त थी। धानी का सर बार-बार चोटी के खिंच जाने पर पिछे को तन जाता। किंतु उसे किसी बात का कोई फरक नहीं पड रहा था। वह तो अपने सपनों में उडान भरने में व्यस्त थी। धानी की माँ, आज के खाने के बारे में पुछने आयी। पर धानी के कानों में तो जूँ भी नहीं रेंग रही थी। वह तो अपने सपनों में ही रहना चाहती थी। महवा जिले के औन्द-मीणा में धानी का घर था। धानी वैसे तो होनहार लडकी थी, किंतु पढाई-लिखाई से ज्यादा उसे चित्रकला में ज्यादा रूची था। इसके अलावा उसे कठपुतली का खेल देखना भी अच्छा लगता था। धानी का एक दोस्त भी था, जिसका नाम था मोती । वह एक कुत्ता था, जो बचपन से उनके साथ रहता था। । हालाँकि उसका रंग काला था, फिर भी सभी उसे मोती-मोती कह कर बुलाते थे।
धानी का मन आज उखडा-उखडा सा था। उसके पिताजी उसका ब्याह करवाना चाह रहे थे, किंतु वह तो अपने सपनों को जीना चाहती थी। उसने अपने मन की बात अपनी बन्नी बुआ से की। एक बन्नी बुआ ही थी जो उसके सबसे करीब थी और उसकी बात समझती थी।
“लाडो, लडकी जात तो जनम से पराई होवे है री।“ बन्नी बुआ ने उसके गालों पर हाथ रख कर कहा।
“बुआ, मेरी उम्र ही क्या है, मुझे तो रंग-बिरंगे चित्र बनाने है।“ धानी रुँआसी होकर बोली।
“अरी, तेरे वास्ते कुँवर-सा देखे हैवो तेरे बाप ने। ना कोई काम ना धाम, फिर जिंदगी भर बनाईयो चित्तर।“ बुआ उसे समझाते हुए जनाने घर में घुस गयी।
धानी अपना सा मुँह लिये पैर पटकती हुई वहाँ से जाने लगी तभी उसने देखा मोती दूर किसी की ओर देखता हुआ भौंक रहा है। एक पल को धानी ने धुँधलके में किसी की परछाई देखी। उसे लगा उसके कुँवर-सा कमर में तलवार बाँधे उसकी ओर चले आ रहे है। वह जरा सी ठिठकी। दिमाग कह रहा था, भाग यहाँ से वरना वह तुझे उठा ले जायेगा। पर दिल कहने लगा, रूक जरा, शायद वो तेरे मन की बात समझ सके और वह तुझे हर वो काम करने इजाजत दे दें, जो तुझे पसंद हो।
वह प्रतिमा धीरे-धीरे पास आने लगी। मोती की आवाज में अब वह दम नजर नहीं आ रहा था। वह भी पास ही बुझ रही अलाव की राख में अपने आप को छुपाने की कोशिश करने लगा। कुछ ही देर में वह प्रतिमा साफ-साफ दिखने लगी। वह एक बाँका नौजवान निकला। सिर पर पगडी, चेहरे पर हल्की सी दाडी। गले में चार-पाँच मोतीयों की मालाएँ। मोरपँखी नीली शेरवानी, कमर में अलंकृत तलवार। मोतिया रंग की अचकन और पाँव में रेशमी जुती। धानी उसे देखते ही रह गयी। उसके बाल चेहरे पर आकर उसकी आँखों के आगे आ रहे थे। उसने बालों को अपने कान के पिछे सँवारा और उससे पुछा, “आप..?”
“तुम्हें ब्याहने आये है।“ एक रोबदार आवाज ने धानी को सम्मोहित कर दिया।
“जी, मुझे तो अभी बहुत से चित्र बनाने है।“ वह सकुचाते हुए बोली।
“हम तुम्हें इसकी इजाजत बक्श दे तो क्या तुम हमारे साथ चलोगी?” उस शख्स ने अपना हाथ आगे बढाते हुए पुछा।
धानी की तो जैसे मन की मुराद पुरी हो गयी। सकुचाते हुए उसने अपना हाथ आगे बढाते हुए कहा, “हाँ..!”
“लाडो, अब तक यहीं खडी है, नहाना नहीं है क्या? और ये अपना हाथ किसकी ओर बढा रखा है?” बन्नी बुआ ने धानी को झकझोरते हुए पुछा।
धानी होश में आ गयी। क्या वह कोई सपना बुन रही थी या फिर यह कोई हकिकत थी। मोती अब भी किसी पर जोर-जोर से भौंक रहा था। धानी लजाते हुए, अपने अँगुठे का नाखुन दाँत में गढाये, घर की ओर भाग खड़ी हुई।

