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Mrugtrushna Tarang

Tragedy Crime


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Mrugtrushna Tarang

Tragedy Crime


ध प्लेज़र गेम

ध प्लेज़र गेम

13 mins 368 13 mins 368

"मुस्कान, बेटा मिस्की! देखो, पापा तुम्हारें लिए क्या लाएं हैं?"पलभर इंतज़ार कर कुंदन लाल ने अपनी बड़ी बेटी मुस्कान को फिर से आवाज़ लगाई,

"मिस्की बेटा, मेरी गुड़िया रानी! जल्दी से पापा की बाहों में समा जाओ।" 

बाँहे फैलाये कुंदन बड़ी देर तक यूँही खड़ा रहा, पर उसकी लाडो का कोई अतापता न पाकर हड़बड़ा गया।

बन रूम किचन और छोटा सा बरामदा। बस इतना सा ही घरौंदा था। जिसमें मुस्कान, मोहिनी, पत्नी कस्तूरी और वो ऐसे चार लोगों का छोटा सा परिवार हँसी खुशी रहता था।मुस्कान के जन्म के बाद से ही कुंदन की प्यारी पत्नी कस्तूरी की हालत खस्ता हुए जा रही थीं।दोनों अपनी बेटी मुस्कान के साथ बड़े ही ख़ुश थे। दूसरी औलाद के बारे में कोई प्लानिंग नहीं कर रखी थीं।वैसे भी 'छोटा परिवार ही सुखी परिवार' जैसे विचार मियां बीबी दोनों के ज़हन में आना भी लाज़मी था।मुस्कान की चौथी सालगिरह पर मोहिनी का मिलना ईश्वर का शुभ संकेत समझकर तीनों ने उसे खुशगवार होकर अपना लिया। बेटे की चाह पहले भी न थीं।


"मिस्की, मिस्की... कहाँ चली गई ये लड़की? कितनी बार बोला है उसे की, बिना बताये कहीं मत जाया कर, पर मानें तो मिस्की कैसी!!"


गला फाड़ फाड़कर चिल्लाते हुए कुंदन ने सूरज नगर का चप्पा चप्पा छान मारा। पर मिस्की का कुछ पता न चला। थक हार कर कुंदन, मोहिनी और कस्तूरी से मिलने हॉस्पिटल पहुँचा।कस्तूरी अब भी बेहोशी की हालत में बिस्तर पर सोई पड़ी थी और मोहिनी उसके सिरहाने सिर झुकाएं बैठी थीं।


अपने सिर पर ममताभरा स्पर्श पाकर मोहिनी लपककर खड़ी हो गई। और बाँवरी सी इधर उधर झाँकने लगी। अपनी मुस्कान दीदी को न पाकर चिंतित स्वर में पूछ बैठी, "पापा, दीदी कहाँ हैं? दीदी क्यों नहीं आयीं? क्या अब तक नाराज़ है मुझसे? बोलो ना पापा!"

मोहिनी गिड़गिड़ाते हुए रो पड़ी। उसकी सिसकियाँ सुनकर कस्तूरी भी जाग गई। उठकर बैठने की कोशिशें करते हुए ईशारों में कुंदन से पूछताछ करने की चेष्टा की। किंतु उसके हलक से आवाज़ ही बाहर न आई और बूत सी बर्बस कभी अपने पति कुंदन लाल को तो कभी छोटी बेटी मोहिनी को देखती रही।


दोनों को सांत्वना देने के पश्चात कुंदन सीधे सूरज नगर के पुलिस स्टेशन गया। अपनी बीमार बीवी और छोटी बेटी की गुहार देते हुए विनंती करने लगा।

कुंदन की फरियाद लिखतें वक्त भी हवलदार दुर्जन सिंह ने दो चार उलट सुलट सवाल कर दिए।


"क्या नाम है तुम्हारी लड़की का?"


"जी, मुस्कान वर्मा।"


"उम्र?"


"16 साल 11 महीने 27 दिन"


"जन्मपत्री नहीं बनवा रहें बापू, की इतनी डिटेल में उम्र लिखवा रहे हो।"


"तुम्हारी रानी बिटिया लड़ झगड़कर रूठी होगी, और कहीं जाकर छिप गई होगीं। थोड़ा इंतज़ार तो कर लेते बापू!" दूसरे हवलदार ने मजाकिया अंदाज में ताना मारा।

"सर जी, प्लीज़ मेरी बिटिया को ढूँढ़ दीजिये।" रिक्वेस्ट का स्वर कुंदन का और भी गहरा होता जा रहा था।


ओये रसिकलाल, लिखवा दिया नां सारा ब्यौरा। अब जा कर बीवी को संभाल और हमें भी जीने दें।


"सर जी, मैं रसिकलाल नहीं कुंदन लाल!"


"अरे हाँ भै कुंदन लाल। मेरे बाप, (हाथ जोड़ते हुए गुस्से में) अब तुम जाते हो या ..."


हवलदारों में आपस में गपशप शुरू हो गई - "आजकल की जवान खूबसूरत लड़कियाँ, घर में राम और गली में शाम बनी फिरती है।"


"हाँ, मैंने फिल्मों में भी देखा है, अम्म्म, वो.. सीता और गीता जैसा मामला.. या फिर.. "


"या फिर घर की घुटन से तंग आकर भाग गई होगी अपने किसी यार दोस्त के साथ।"


".. मन भर गया तो लौट आयेगी, घूम फिरकर... हा, हा, हा..."


(पुलिस स्टेशन से बाहर निकलते वक्त भी हाथ जोड़कर बुदबुदाते हुए कुंदन ने कहा, "साब जी, मेरी बेटी कोई ऐसा वैसा काम नहीं करती। बड़ी ही होनहार और समझदार है। कृपा करके उसे ढूँढ़ दीजिये।"


धोन्दू हवलदार ने आखिरकार धक्का देकर कुंदन लाल को भगाना चाहा। पर, उसके पूर्व ही कुंदन लाल अपनी साइकिल को पैंडल मारकर वहाँ से खुद ही चला गया।


दो हफ्ते बाद कैलास नगर के कुछ बच्चे गायब हो गए। उनकी भी उम्र तक़रीबन 10 - 12 साल की ही थीं।आसपास इलाके के तीन से चार नगरों का कॉमन पुलिस स्टेशन सूरज नगर का ही था। हर चौथे - पाँचवे दिन गुमशुदगी दर्ज कराई जाने लगीं।और इस ओर, मजदूरों के चार पाँच बच्चों में से एक दो का गायब हो जाना आम बात होती चली गई।बात आई गई हो गई। 

सात महीने बीत गए। पर मुस्कान का कोई अतापता न मिला। मुस्कान की माँ की हालत दिनबदिन और भी खराब होती चली गई। मोहिनी पढ़ाई छोड़कर अपनी माँ की देखभाल में घर पर रहने लगीं।कुंदन लाल काम पर आते जाते पुलिस स्टेशन के चक्कर काटते रहता।थक हारकर बैठने के बदले उसने खुद से ही छानबीन शुरू कर दी।


शनिवार सुबह की सैर के चलते कुंदन लाल नेहरू गार्डन की ओर टहलने निकला। टहलते टहलते दुर्गा वाडी के त्रिकोणी बंगले के सामने की कच्ची सड़क पर जा पहुँचा। जहाँ उसे हर तरफ सूखी घास और अशोक के वृक्ष की पत्तियाँ यहाँ वहाँ बिखरीं हुई नजर आई। कुछ ही दूरी पर मिट्टी गिली जान पड़ी।


कुछ अजीब सा एवं अटपटा सा लगते ही उसने पहले तो पुलिस को ही इत्तला करने का सोचा। तत्पश्चात खयाल आया कि अगर यहाँ पर कुछ भी संदेहास्पद न मिला तो खामखाँ पुलिसवाले उस पर ही शक करना आरम्भ कर देंगें।बेमन से कुंदन लाल ने खुद से ही खुदाई की। और कुछ हद तक खोदने पर ही उसे एक काले रंग का प्लास्टिक का बैग हाथ लगा।


"अरे क्या कर रहे हो? क्या है ये?"

यकायक पीछे से भारी भरकम आवाज़ सुनकर हड़बड़ाहट में कुंदन लाल का हाथ खुदाई करते करते रुक सा गया। पीछे मुड़कर देखा तो वही धोन्दू हवलदार था।


संक्षेप में सारा मामला सुनाने पर धोन्दू हवलदार ने बाकी के हवलदारों और पुलिस इंस्पेक्टर राज सिंह चौहान को भी बुलवा लिया।सारी जमीन खुदवाने पर एक नहीं कई सारी प्लास्टिक बैग्स मिली। एक के बाद एक सारी की सारी खोलने पर जो मंज़र देखा उससे सबकी आँखें खुली की खुली रह गई।


किसी बैग में कटे हुए हाथ तो किसी में धड़ और शरीर के बाकी हिस्से मिलें। पर किसी भी बैग में से सिर नहीं मिले।


इंस्पेक्टर चौहान ने कुंदन लाल का कॉलर पकड़कर उसे झंझोड़तें हुए पूछा, "अबे साले! खुद ही बच्चे गायब करता था और तुम्हारी बेटी को भी खुद ही गायब किया और कम्पलेंट लिखवाने खुद ही पुलिस स्टेशन आ धमका, क्यों!"


"नहीं साब जी, माय बाप! हम तो टहलते टहलते इंहा आ गए। और बिना बारिश के गीली मिट्टी देखी तो लगा क्या बात है, देख लेते हैं। बस, इसी वजह से खुदाई शुरू कर दी।" कुंदन लाल अपने पर आए इल्जामात से हक्का बक्का रह गया।


तुरंत सारी बैग फोरेंसिक लैब में भेज दी गई। पर कातिल कौन और कहाँ स्थित है! ये खोजने के लिए इंदौर शहर के कमिश्नर ने ख़ुफ़िया पुलिस (जासूस सत्येन्वेषी) को इन्फॉर्म कर बुलवाया।


"हेल्लो, सत्येन्वेषी बिजॉय, मैं पुरुषोत्तम दास, कमिश्नर ऑफ इंदौर बोल रहा हूँ।"


"हाँ बोलिये सर जी।"


"क्या आप कल के कल इंदौर आकर मुझें मिल सकतें हैं? इट्स अर्जन्ट, केन यू प्लिज़ कम अर्ली?"


"श्योर सर। आइ विल बी धेर शार्प एट फाइव पी.एम. सर।"


"ओके, एट माय बंगलो, शार्प एट फाइव। आई विल बी वेटिंग।"


कमिश्नर के बुलावे पर सत्येन्वेषी को आश्चर्य तो बहुत हुआ। और इसी के चलते उसने फ्लाइट में ही हफ्तेभर के सारे न्यूज़पेपर्स खंगालकर जानकारी हाँसिल करनी चाही पर कुछ खास समाचार नहीं मिले।


शाम को करीब पाँच बजे सत्येन्वेषी कमिश्नर पुरुषोत्तम दास के सरकारी बंगले पर जा पहुँचा। उसका ही इन्तज़ार करते अपने लॉन में चहलकदमी कर रहे कमिश्नर की सतर्कता से प्रभावित हो कर सत्येन्वेषी ने नमस्कार करना चाहा।


जबकि कमिश्नर दास जी के माथे पर परेशानियों की लकीरों ने जासूस को जासूसी करने पर मजबूर कर दिया।


"क्या सर जी, आप और परेशान, मामला हज़म नहीं हुआ। खुलकर बतायेंगे तो शायद मैं आपकी कुछ मदद कर सकूँगा।"


कमिश्नर दास ने बिना सिर वाले बच्चों की लाशों के टुकड़े वाला केस विस्तार से बतलाया। और उसकी फाइल भी उसकी ओर सरका दी।


सारा मामला सुनने के बाद सत्यंवेषी, कमिश्नर के सामने ही फाइल की डिटेल्स खंगालने लगा। ग्रीन हाई लाइटर से मार्किंग करके पॉइंट्स अपनी डायरी में नोट डाउन करके फाइल दास सर को लौटाते हुए खुद भी टहलने लगा।


"सर मुझें कितने दिनों का वक्त देने का आपने सोचा है?"


"सत्येन, वैसे तो ये बात अब तक मिड़िया वालों से छिपाकर रखी है। पर ज्यादा दिन तक शायद न छिपा पाएंगे। तो.. "


"तो!"


"तो, जितना हो सकें उतना जल्दी अगर तुम ये मल्टी मर्डर मिस्ट्री को सुलझा पाओ तो आइ विल बी वेरी मच ओब्लाइज्ड टू यू।"


"क्या सर, आपने तो पलभर में ही पराया कर दिया मुझें। प्रोफ़ेशनल रिलेशन से पूर्व आप मेरे बहनोई के बड़े भाई हैं। आपका हक बनता है मुझें आदेश देना।"


"थेँक्यु माय सन। मुझें यकीन था कि तुम मेरा कहना कभी नहीं टालोगे।"


"बहरहाल सर, जितना इस केस को समझ पाया हूँ, उसके मुताबिक ये केस तीन दिन में सोल्व हो जाएगा। और.."


"और क्या सत्येन? कोई परेशानी है? कोई और केस है क्या तुम्हारें जिम्मे?"


"नहीं, नहीं सर, ऐसी कोई बात नहीं। बस, मैं सोच रहा था कि अगर आपको ऐतराज़ न हो तो मुझें होटल में रहने के बजाय आपके साथ रहना मिल जाए तो बेहतर होगा।"


कुछ देर सोचते हुए, कमिश्नर दास जी ने बताया कि, "तुम यहाँ रह सकते हो। वैसे भी मैं 2 दिनों के लिए बैंग्लोर जा रहा हूँ, परसों सुबह लौटूँगा। तुम्हें डिस्टर्ब करनेवाला यहाँ कोई भी नहीं रहेगा। और तो और नौकर चाकर एवं हवलदार तुम्हारी सेवा में दिन रात हाज़िर रहेंगे।"


"थेँक्यू सर जी, सॉरी अंकल जी।"


"अपना सामान मँगवा लो और फिर रात को डिनर पर मिलते हैं, ठीक है।" शैकहैंड कर जासूस सत्येन्वेषी अपने अंकल जी के गेस्ट हाउस की ओर आगे बढ़ा।


हवलदार मानसिंह से होटल से अपना सामान मँगवाकर सुस्ताने की सोच ही रहा था कि, गायब हुए बच्चों वाला केस उसके दिलोदिमाग पर छाने लगा।


डिनर टेबल पर चुप्पी साधे हर कोई भोजन कर रहा था। सत्येन्वेषी ने भी कुछ बोलना मुनासिब नहीं समझा और उसके बाद बरामदे में टहलते हुए कमिश्नर ने खुद के 2 दिन की ग़ैरहजरी में किसी भी चीज की जरूरत पड़े तो सत्येन्वेषी के सामने ही हवलदार मानसिंह को हिदायतें देकर विदा किया। और सत्येन को गुड नाईट कहकर अपने कमरे में चले गए।


रातभर अपने नए केस को लेकर सोचते हुए उसे दो क्लू मिले।प्रातःकाल ही वह हवलदार मानसिंह को लेकर लाश के टुकड़े जहाँ मिले थे, उस एरिया का मुआयना करने के लिए निकल पड़ा। दोनों जीप में बैठकर नेहरू गार्डन की ओर चल पड़े।


बीस मिनट में वे जब उस एरिया में पहुँचे की रास्ते में आये नाले की तरफ अमूमन उसका ध्यान गया। नाले में से गंधक की तीव्र स्मैल आने पर जीप वहीं पर रुकवाकर सत्येन्वेषी हेंड ग्लव्ज पहनकर नाले की ओर आगे बढ़ा।हवलदार पांडु और धोन्दू की मदद से लोहे के रॉड से पूरे नाले को खंगालना शुरू करते ही गले हुए सिर की खोपड़ियाँ एक एक कर ऊपर की ओर तैरती कूदती मछलियों की भाँति उछलने लगीं।हवलदार मानसिंह की आँखें तो ये मंज़र देख चौंधिया गई। बदबू से वैसे ही उसका सिर फटा जा रहा था। पर कमिश्नर का हुक्म सर आँखों पर, और जासूस सत्येन्वेषी के साथ मिलकर एक केस सॉल्व करने का मौका वो अपने हाथ से जाने देना नहीं चाहता था।एक एक कर तकरीबन उन्नीस खोपड़ियाँ बरामद हुई। फोरेंसिक लैब में भेजने के बाद सत्यन्वेषी नेहरू गार्डन की ओर लपका।


वो खुदाई किये हुए एरिया को एक और बार खंगालने के लिए उसने फोन करके एक पूरी टीम को अपने साथ रखवा लिया। और आसपास के घरों की तलाशी लेनी शुरू कर दी। लेकिन, कहीं से कुछ भी हाँसिल नहीं हुआ।तभी पानी की टंकी के पीछे वाली कुटिया में से धुँआ उड़ते देख वो उस ओर गया। कुटिया के पिछवाड़े में सटे हुए तंदूर में से आग की लपटें उमड़ उमड़कर फैल रही थीं लेकिन कुटिया बिल्कुल भी खाली थीं। आसपास में कोई भी नहीं था।

दो हवलदारों से उस तंदूर को बुझाने और उसे खंगालने का काम सौंप कर सत्येन्वेषी नेहरू गार्डन की दूसरी ओर अग्रसर होता हुआ कुंदन लाल से मिलने उसके घर गया।


कुंदन लाल और उसकी छोटी बेटी मोहिनी कस्तूरी को दवाई खिला रहे थे कि यकायक अपने आँगन में किसी अजनबी को पाकर तीनों हकपके से रह गए।

कस्तूरी को उसी हाल में छोड़ कुंदन लाल बाहर आया। सत्येन्वेषी ने अपना परिचय देते हुए मुस्कान की गुमशुदगी की सारी बातें जाननी चाही।कुंदन लाल ने भी रोते बिलखते हुए सारा वाक्या सुनाया। और तो और उसके सारे दोस्त तथा सहेलियों के बारे में भी सारी जानकारियाँ दी।सत्येन्वेषी कुंदन लाल के साथ ही मुस्कान के कॉलेज, क्लास एवं जहाँ पर पार्ट टाइम नौकरी करती थी उस ज्वैलरी शॉप में भी पूछताछ करने लगामुआयना करते वक्त सत्येन्वेषी को कई जगहों पर कुछ कुछ मिला। जो, उसने अपने तरीके से संभाल लिया एवं सबूतों के रूप में चुपके से छिपा भी लिया।ज्वैलरी शॉप के सामने वाली हॉटल के पिछवाड़े में टूटी हुई दीवार के पास की जमीन कुछ हद तक दबी हुई सी लगी। सत्येन्वेषी ने धोण्डु हवलदार की मदद से वहाँ खुदाई करवाई तो उसे एक लड़की का सिर, बायें हाथ की कलाई और दाहिना पैर मिला।


फोरेंसिक लैब में भेजने के बाद कुंदन लाल को शिनाख्त के लिए बुलवाया गया। कुंदन लाल और उसका पूरा परिवार मुस्कान की आधी अधूरी लाश देख मूर्छित हो गया। मुस्कान की माँ तो उठ ही नहीं पा रही थीं। पर जैसे तैसे कर उन्हें घर भेजकर सत्येन्वेषी 4 हवलदार और इंस्पेक्टर के साथ सर्च वॉरेंट लेकर दोबारा उस होटल में गया।छानबीन के दौरान मुस्कान के कानों की बालियाँ और खून से सने कपड़े मिले। और यकायक सत्येन्वेषी को *रोडोप्सिन* टेक्निकल टर्म याद आया। और उसने 2 हवलदारों को होटल सील करने का आदेश देकर वहीं कार्यरत रहने दिया।


और खुद फोरेंसिक लेब में मुस्कान के सिर को देखने एवं उसके रेटिना के फोटोज़ लेने के लिए सरकार से रिक्वेस्ट भेजी। पहलेपहल तो मंजूरी नहीं मिली। पर जब सत्येन्वेषी ने *रोडोप्सिन* की थियरी बयान की तब जाकर उसे पर्मिशन मिली। और उसने ऑप्टोग्राफी के लिए खास किस्म का कैमरा यूज़ करके मुस्कान के आई बॉल्स के अंदाजन 20 - 25 से भी ज्यादा फोटोज़ लिये।


और उसकी ब्ल्यू प्रिंट निकलवाई। जिसके चलते उसे मुस्कान को मारने वाले की शिनाख्त करना आसान हो गया। क्योंकि, 'मरने से पूर्व रेटिना पिक्चर कैप्चर करता है।' यह थियो री यहाँ काम आ गई।और तो और होटल के पीछे वाली दीवार से मिले सुबूत एवं कुछ हद तक गली हुई खोपड़ियों से भी फोरेंसिक लैब में काफी सारी जानकारियाँ काम में आयीं।तीसरे दिन कमिश्नर के सामने सत्यंवेषी ने होटल के पिछवाड़े में रहते कालू सरदार को पकड़कर हाज़िर किया। जिसने हवालात में आख़िरकार पुलिस के डंडे खा कर सच उगल ही दिया।


"मुस्कान को पहली बार होटल में चाय पीते देखकर सरदार का मन उस ओर आ गया। पर वो मासूमियत के चलते हँस बोल लेती लेकिन एक तरफा प्यार के लिए भाग चलने के लिए राजी न हुई। -शहर शहर, गाँव गाँव घूमने वाले सरदार को नाबालिग लड़कियों से इश्कबाजी करने में मज़ा आता था। और जो उसके ख़िलाफ़ जाएं तो उसको तंदूर में या नाले में एसिड में गलने के लिए छोड़ देता। -एक दिन नाले के बदबूदार पानी में से हद से ज्यादा बदबू आने लगीं। इसलिए सारे पूरे लाश के टुकड़ों को नाले में न फेंकते हुए जमीन में ही गाड़ दिए। -और मुस्कान को चाहता था इसलिए उसके मृत शरीर को कई दिनों तक अपने पास रख उसके शरीर को प्यार करता रहा। -


पहलीबार सत्येन्वेषी को नाले के पास और उसके बाद मुस्कान के कॉलेज और हर वो जगह जहाँ पर वो जाती थीं। उन जगहों पर जासूसी करते देख घबड़ाहट में सरदार ने मुस्कान के शरीर के टुकड़ों को तंदूर में जलाने के लिए छोड़ दिया और उसका सिर , कलाई और पैर वहीं टूटी दीवार के पास गाड़ दिए। -अपनी बीवी के मुँह से 'इम्पोटेंट' शब्द सुनकर पागल सा हो गया था सरदार। और उसीके चलते वह मासूम बच्चियों को उठाकर उसके साथ जोर-जबरदस्ती करता और बाद में उसके टुकड़े कर नाले में फेंक देता।"


अदालत में सरदार को तत्काल फाँसी की सज़ा सुनाई गई। तब सरदार के माता पिता और उसकी बीवी ने भी उसे ज़लील करते हुए रिश्ता तोड़ दिया कमिश्नर ने खास तौर पर कुंदन लाल का शुक्रिया अदा किया। और तो और सूरज नगर की पुलिस को हिदायतें भी दी। कि, पुलिस जनता की सेवा के लिए है। नहीं के उनका मजाक उड़ाने के लिए। आइंदा से ऐसा कोई भी मामला सामने आया तो पूरी की पूरी टीम को सस्पेंड किया जाएगा।


सभी पुलिसकर्मियों ने कुंदन लाल की हाथ जोड़कर माफी माँगी।कमिश्नर दास सत्येन्वेषी की जासूसी से बहुत ही इम्प्रेस हुए।और प्लेज़र के लिए किए गए 'मर्डर मिस्ट्री केस' की फाइल को लाल रंग का फीता लगाकर सरकारी कार्यालय में रखवा दिया।

सत्येन्वेषी दूसरे केस की खोजबीन के लिए राजस्थान की ओर निकल पड़ा।


 



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