ड्रामेबाज
ड्रामेबाज
कई बार घंटी बजाने के बावजूद जब दरवाजा नहीं खुला तब मैंने घड़ी देखी और मुझे समय का भान हुआ। रात के 11:30 बज रहे थे। ओह! शायद सो गई। मन ही मन बोलते हुए अपने पास रखी दूसरी चाबी से दरवाजा खोला तो देखा श्रीमती जी सभी लाइट बंद करके सो चुकी है। मैं सोचने लगा बाकी दिन तो कितनी भी देर हो जाए इंतजार करती थी फिर आज क्या हुआ? वो भी तब जब कल सैटरडे है, छुट्टी है। क्यों इतनी जल्द सो गई? मन ही मन सोचते हुए लाइट ऑन किया तो घर की हालत देख दंग रह गया। पूरा हॉल डेकोरेटेड था, डाइनिंग टेबल पर खाना पड़ा हुआ था। अब मैं सोचने लगा आज क्या था? इतनी तैयारी किसलिए? ना मेरा जन्मदिन है ना श्रीमती जी का और ना ही दोनों बच्चों में से किसी का फिर आज था क्या..? दिमाग पर थोड़ा जोर डाला तो झट से याद आया। "अरे बाप रे! आज तो हमारी शादी की सालगिरह है। एक दशक पूर्व इसी दिन तो हम परिणय सूत्र में बंधे थे। मैं कैसे भूल गया?? अब समझ आया श्रीमती जी क्यों कॉल पर कॉल किए जा रही थी? शायद मुझे सरप्राइज करने के लिए। अब खुद पर बहुत गुस्सा आया। इतनी बड़ी भूल कैसे हो गई? मन तो हुआ कि दो तमाचा अपने ही गाल पर रसीद दूं।
झटपट बैग एक तरफ फेंक कमरे में चला। तो देखा पत्नी जी सोने का स्वांग कर रही हैं और बगल में दोनों बच्चे 8 साल की बेटी और 6 साल का बेटा वह भी अपनी मां का साथ दे रहा है। मुझे देखते ही बोले।
" मम्मी उठो, देखो पापा आ गए।"
"चुपचाप सो रहे हो या भगाऊं तुम दोनों को कमरे से बाहर!"
सुनते ही बच्चे झट से बिस्तर में घुस गए। फिर चुपचाप आंखें खोल इशारों में बता दिया कि मम्मी बहुत गुस्से में है।
"रजनी उठो! क्या हुआ? तुम जल्दी सो गई। मेरा मतलब और दिन तुम्हारा इंतजार करती थी फिर आज क्यों नहीं? क्या बात है?"
कोई जवाब नहीं दिया।
"अरे, मुझे सब याद है कुछ भुला नहीं हूं। जब तुम्हारा कॉल आया मैं तभी ऑफिस से निकल गया लेकिन तभी मेरा एक दोस्त मिल गया स्कूल के समय का। आजकल वह लंदन में रहता है तो उसी के साथ बातों बातों में समय का पता नहीं चला। इसलिए देर हो गई।"
"सफाई देने की जरूरत नहीं। आप यहां से जा सकते हैं।"
"अरे सुनो तो.! मैं कोई सफाई नहीं दे रहा, सच बोल रहा हूं।"
"पर मुझे और कुछ नहीं सुनना।"
इतना सुनते ही मैं बाहर आ गया। कुछ देर बाद फिर गया लेकिन मैं मना नहीं पाया। अबकी बार मुझ पर बरस पड़ी।
"सब बहाने हैं। यहां से चले जाओ मुझे आपसे कोई बात नहीं करनी।"
कोई उपाय नहीं देख मैं आकर बाहर सोफे पर बैठ गया और पत्नी को मनाने का तरीका ढूंढने लगा। अचानक मेरे पेट में बहुत तेज़ दर्द शुरू हो गया। मैं दर्द के मारे छटपटाने लगा और सोफा से नीचे जमीन पर गिर पड़ा। आवाज सुन पत्नी भागकर आई।
"क्या हुआ?"
"पेट में दर्द!"
" अचानक कैसे दर्द होने लगा? बताया क्यों नहीं, जगाया क्यों नहीं?" सवालों की झड़ी लगा दी।
"अरे, जब से ऑफिस से आया हूं तभी से थोड़ा थोड़ा दर्द हो रहा था। पर, अचानक ज्यादा दर्द होने लगा।" पेट पकड़ उठने की कोशिश करते हुए मैंने कहा।
"तो बताया क्यों नहीं?"
"कैसे बताता? तुम इतने गुस्से में थी, कुछ सुनने को तैयार ही नहीं थी।"
"अरे, पर जब अभी तेज दर्द हुआ तो जगाना चाहिए था।"
"लेकिन तुमने ही तो कहा था मुझसे बात मत करना, मुझे जगाने मत आना।"
"अरे.! वो मैंने गुस्से में कहा लेकिन क्या मुसीबत के समय भी नहीं बोलोगे, उठाओगे? रुको गैस की दवाई लेकर आती हूं, तुम्हें गैस बन गया है।"
"दवा खा चुका हूं लेकिन आराम नहीं हुआ।"
"अच्छा! तो मैं अजवाइन पानी उबालकर लाती हूं शायद उससे कुछ आराम मिल जाए।"
फिर झट से भागी रसोई में। शायद मन में सोचते हुए कि इतना भी नाराज होने की जरूरत नहीं थी, मुझे उनकी बातें सुन लेनी चाहिए थी।
"इसे पी लो, बाहर खाना खाए हो कहीं अपच हो गया हो तो ठीक हो जाएगा।"
"अरे, अपच कैसे होगा! जब मैंने खाना खाया ही नहीं।"
"क्या.! तुमने बाहर खाना नहीं खाया?"
"नहीं!"
"तो बताया क्यों नहीं??भूख के मारे दर्द हो रहा होगा।"
"तुम बताने का मौका देती तब ना! जब से आया हूं बस मुझ पर बरसे जा रही हो।"
श्रीमती जी को अब अपनी गलती का एहसास हुआ। सच में कुछ बोलने ही नहीं दिया।
"थोड़ा भी दर्द आराम हुआ?"
"नहीं।"
"मुझे लगता है तुम्हें भूख के मारे दर्द हो रहा है चलो उठो खाना खाओ।"
"तुमने भी तो खाना नहीं खाया, क्या तुम्हें भूख नहीं लगी?"
"भूख तो मुझे भी बहुत जोर से लगी है।"
"तो चलो दोनों साथ में खाना खाते हैं। बच्चों को भी बुलाओ।"
"हां, ठीक है।"
"सुनो, अभी तो 12:00 बजने में कुछ मिनट बाकी है चलो ना सालगिरह का केक भी काट लेते हैं।"
श्रीमती जी ने एक बार घूर कर देखा और केक सामने लाकर रख दिया।
मिलकर केक काटने के बाद खाना खाने बैठे।
" देखो, पहले तुम्हें अपने हाथों से खिलाऊंगा उसके बाद मैं खाऊंगा।"
"तुम खाओ मैं खुद खा लूंगी।"
"देखो, तुम्हारा गुस्सा जायज है आखिर इतने स्पेशल दिन पर मैंने तुम्हारा दिल दुखा दिया, समय से घर नहीं आया। इसलिए तुम पहले खाओ और मैं परोसता हूं।"
"अच्छा ठीक है।" बोल खाना खा लिया।
"अब तुम खा लो।"
"तुम अब नाराज तो नहीं हो ना।"
"नहीं..!"
"बिल्कुल भी नहीं।"
"अरे, कहा ना बिल्कुल भी नहीं।"
"हे भगवान! तुम मान गई तो चलो मुझे कोई भूख नहीं और पेट दर्द भी ठीक हो गया।"
"ये तुम क्या बोल रहे हो?"
"यही कि मैंने खाना खा लिया है। मेरा दोस्त साथ में डिनर के लिए बहुत जिद करने लगा। कहने लगा कल मैं जा रहा हूं, चलो साथ में खा लेते हैं फिर कब मिलना होगा पता नहीं? तब मैं चाह कर भी मना नहीं कर पाया। यहां तुम्हें गुस्से में देख मेरी हिम्मत नहीं हुई ये बोलने की कि मैंने खाना खा लिया है।"
फिर यह पेट दर्द..?"
"अरे, वह तो एक ड्रामा था। तुम्हें मनाने के लिए। जब सारा प्रयास फेल हो गया तब मेरे पास यह ड्रामा करने के अलावा कोई और उपाय नहीं था और देखो तुम आसानी से मान भी गई।" बोल मैं हंस पड़ा।
"ओह! तो सिर्फ मुझे मनाने के लिए इतना ड्रामा, इतनी नौटंकी..!"
"अरे हां भई! आखिर तुम अर्धांगिनी हो मेरी, तुमसे प्यार करता हूं तो तुम्हें मनाने के लिए नौटंकी क्या कुछ भी कर सकता हूं।"
"ड्रामेबाज कहीं के..!" बोल पत्नी खिलखिला पड़ी।
"मम्मी, सिर्फ पापा ड्रामेबाज नहीं आप भी ड्रामा क्वीन हो। तब से आप भी गुस्सा होने और सोने का ड्रामा ही तो कर रही थी पर पापा का पेट दर्द का नाम सुनते ही सारा ड्रामा खत्म हो गया।"
यह सुनते ही बच्चों के साथ हम दोनों भी खिलखिला पड़े।

