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Poonam Singh

Inspirational


4.5  

Poonam Singh

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" छुटकी"

" छुटकी"

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"अरे ओ.. छुटकी इधर आ जल्दी, से कहाँ है..?" ठकुराइन ने जोर से आवाज़ देते हुए बुलाया।

छुटकी दौड़ती हुई ठकुराइन के पास आई और स्नेहिल नैनों से टुकुर टुकुर उनकी तरफ देखने लगी। "यहीं रुक, मैं अभी आई".. इतना कहकर ठकुराइन भीतर रसोई घर में जाकर कुछ खाना लेकर आई और छुटकी से कहा.." तेरा बर्तन कहाँ है ??

जा भाग कर जल्दी से लेती आ।"

छुटकी भाग कर गई और आँगन के एक कोने में रखा उसका अलमुनियम का प्लेट जहाँ शायद किसी की नजर भी ना पड़ती हो , जो कि जगह-जगह से पिचका हुआ था। छुटकी भाग कर ले आई और ठकुराइन के आगे बढ़ा दिया।

"अरे राम राम राम दूर ही रख नास पिटी सवेरे सवेरे गंगा स्नान करवाएगी क्या ??" और भनभनाते हुए ऊपर से उसके प्लेट में खाना परोस दिया। "यह ले जा दोनों माँ बेटी खा ले और जल्दी से काम पर लग जा। धूप सिर पर चढ़ने को है और अभी तक घर का एक काम भी नहीं हुआ।"

"माई ठकुराइन हम लोगन के साथ ऐसा बर्ताव काहे करत है ?? हम लोग भी तो उन्हीं की तरह मानुष हैं।" छुटकी की माँ की तरफ मासूम भरी नज़रे हजारों अनकहे सवाल लेकर देख रही थी।

"अरे चुप हो जा.. ठकुराइन सुन लेगी ना.. अपना दाना पानी बँद हो जाएगा ।"

फुलवा बरसों से ठकुराइन के यहाँ काम करती आ रही थी और इस तरह के व्यवहार की आदी थी।

फुलवा ने छुटकी का स्कूल में दाखिला भी करवाया था पर वहाँ पर भी जात - पात ने उसका पीछा नहीं छोड़ा था। सम व्यवहार ना मिलने के कारण खिन्न होकर छुटकी ने पाठशाला जाना छोड़ दिया था और दिन भर अपनी माई के पीछे पीछे उसका पल्लू पकड़ कर चिपकी रहती थी साथ ही उसके काम में भी हाथ बटाती थी।

ठाकुर साहब गाँव के बड़े जमींदार थे और उनकी जमींदारी का रौब वहाँ के दस गाँवों में चलता था। ठाकुर साहब और ठकुराइन के इकलौता पुत्र था सुबोध जो कि अक्सर छुटकी के साथ खेलता और उसको किसी ना किसी बात से परेशान करता था। छुटकी कहने को छोटी थी पर समझदारी में अच्छे अच्छों के  कान काटती थी। वो सुबोध को भी कभी-कभी आड़े हाथ लेती थी ।

"ओ छुटकी जरा इधर तो आना..!" आँगन में खेल रहे छुटकी को सुबोध बड़े रौब से बुलाता था। छुटकी भी छोटे ठाकुर की आवाज़ सुन दौड़ी चली आती थी। "क्या कहे हो छोटे ठाकुर.. ?" मासूम भरे लहजे में पूछती '

" तू अपना मुँह कभी आईने में देखी है क्या ?? मालूम है तेरा मुँह किस से मिलता है..??"

"किस से मिलता है छोटे ठाकुर...??"

"गोल गोल मुँह फुले फुले गाल उस पर बड़ी-बड़ी बिल्ली सी आँखें.. सुबोध भी अपना मुँह फुला कर और आँखें बड़ी बड़ी करके बताता.. एकदम बिल्ली की माफिक दिखती है तू ।"

छुटकी थोड़ी कुढ़ जाती। कुछ बोलती नहीं अपना नाक मुँह सिकोड़ कर वहाँ से चली जाती।

अपनी अम्मा से जाकर शिकायत करती कि "छोटे ठाकुर हम को ऐसे ऐसे कहत है..। सच में हमरा मुँह बिल्ली जैसा है का...??

अम्मा भी उसकी बात सुनकर हँसने लगती और कहती बिटिया "वो तो तुमसे वैसे ही किलोल करत हैं। "

कभी-कभी साँझ पहर में सुबोध छुटकी के साथ बैट - बॉल खेलता था। वह भी माँ से छुपाकर क्योंकि वह जानता था कि अगर माँ देख लेगी छुटकी के साथ खेलते हुए तो नाराज़ होगी और इसके आसपास फटकने तक नहीं देगी । सुबोध को यह धर्म रीति-रिवाज की बातें इतनी समझ नहीं आती थी और ना ही उसे भाती थी ।

फिर छुटकी के साथ उसका खेल का प्रकरण भी कुछ अलग होता था। सुबोध बैटिंग करता और छुटकी से बॉलिंग करवाता, छुटकी भी चुपचाप बॉलिंग करती और साथ ही हर बार बॉल भी वही पकड़ कर लाती थी। कभी कभी थक जाती तो कहती "हम ना खेलेंगे तुम्हरे साथ..! तुम हमको बैटिंग नहीं देते खाली बॉल के लिए दौड़ाते हो।" और बॉल को सुबोध के सामने फेक कर चली जाती। सुबोध भी शांत बैठने वाला कहा था वो भी भागकर जाता और उसकी रिबन खोल देता और पूरे रौब से कहता "इस तरह भाग कर कहाँ जाती है। चल जा पानी लेकर आ हमें प्यास लगी है ।"

छुटकी कुछ पल खामोश रहकर उसकी आँखों में आँखें गड़ा कर कहती..

"छोटे ठाकुर.. हमरे हाथ से पानी पियोगे.. तो का तुम ऊपर आसमान में सटक नहीं जाओगे..?! और ठकुराइन हमका दस गज जमीन के नीचे जो गाड़ देगी सो अलग। हम नहीं लाएँगे पानी तुम्हरे लिए । तुम खुद ही लाकर पी लो।" अपना हाथ हिलाते हुए कहती..! "या नहीं तो महाराज को बोल दो वही ला देंगे पानी तुम्हरे लिए ।"

इतना कहकर छुटकी भाग कर अपनी माँ के पास चली जाती।

एक दिन अचानक फुलवा भागती हुई आई और जोर जोर से चिल्लाते हुए कहने लगी " ठकुराइन कहाँ है आप ..? जल्दी चलिए जल्दी.. छोटे ठाकुर खेलते खेलते पत्थर से टकरा गए और उनका माथा फट गया है। बहूते खून निकल गया है रुकने का नाम नहीं ले रहा।"

ठकुराइन के तो सुनते ही जैसे होश उड़ गए और जैसे तैसे नंगे पाँव ही भागी भागी पहुँची तो देखा सुबोध दोस्तों के बीच जमीन पर बेहोश पड़ा था और रक्त की धार बहे जा रही थी। गाँव में आसपास कोई क्लीनिक भी नहीं था और अस्पताल भी पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर था।

फिलहाल ठकुराइन जैसे - तैसे सुबोध को गाड़ी में बिठा कर अस्पताल पहुँची। पर वहाँ की दूरी तय करने में काफी समय लग गया। पहुँचते ही अस्पताल में डॉक्टरों की देखरेख में उसका इलाज शुरू हुआ रक्त अधिक बह जाने के कारण सुबोध को अभी तक होश नहीं आया था और इस कारण उसे खून चढ़ाने की आवश्यकता आन पड़ी। सुबोध के हालत में सुधार ना देखकर ठाकुर और ठकुराइन का एक - एक पल बरस के समान बीत रहा था। निराशा के बादल छटने का नाम नहीं ले रहे थे ,की तभी अचानक पता चला की डॉक्टरों में एक हड़कंप सी मच गई है। अस्पताल में सुबोध के ब्लड ग्रुप का खून खत्म हो चुका था। एक यूनिट और खून की जरूरत थी। आसपास में जितने भी अस्पताल थे सब जगह पता कर लिया था पर कहीं भी उपलब्ध नहीं था।

ठाकुर जी के घर परिवार में आसपास जितना संपर्क हो सका किया पर निराशा ही हाथ लगी। उनके तो जैसे हलक में प्राण अटके हुए थे। बड़े ही यज्ञ, अनुष्ठान और मन्नतों के पश्चात सुबोध का जन्म हुआ था और उसकी सलामती के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे।

एक आखरी उम्मीद बची थी वो थी.. फुलवा...!

ठाकुर साहब किसी गहरी सोच में डूबे हुए थे कि तभी डॉक्टर ने आकर पूछा .. "किस आत्म- चिंतन में डूबे हैं ठाकुर साहब ..? ऐसे नाज़ुक समय में बच्चे को देखेंगे या जात - पात को.. ? आप इजाज़त दे दीजिए फुलवा का ब्लड ग्रुप मैच कर रहा है।"

ठाकुर और ठकुराइन ने समय के आगे घुटने टेक दिए। बरसों का रुतबा, समाज में मान प्रतिष्ठा, ताश के पत्तों की भाँति ढहता हुआ दिख रहा था ..।

दूसरा स्वार्थी मन सोच रहा था अगर पुत्र ही नहीं रहेगा तब यह जात - पात, संपत्ति के रुतबे का क्या मोल रह जाएगा..!? फिर हताश हो कर अपनी पत्नी की ओर नजर उठाकर देखा, जैसे कि उनकी भी सहमती की अपेक्षा कर रहे हों..! ठकुराइन ने भी समय के आगे मजबूर तथा लाचार हो ठाकुर साहब के सामने नज़रें झुका ली।

कुछ पल की खामोशी के पश्चात ठाकुर साहब ने कहाँ "आप शायद ठीक कह रहे है डॉक्टर साहब.. इतने आत्म मंथन के पश्चात तो यही समझ आया कि सभी जाति, धर्म ,अमीरी - गरीबी ,उँच - नीच से ऊपर.. इंसानियत का धर्म है।" आज कारण जो भी बना पर मेरी आँखें खुल गई। फिर एक लम्बी साँस खींचते हुए उन्होंने कहा "जैसा आप ठीक समझे, वैसा करें ...।"

थोड़ी देर बाद डॉक्टर ने आकर बताया कि "सुबोध को होश आ गया है ।" सब की खुशी का ठिकाना ना रहा। ठाकुर- ठकुराइन के आँखों से अविरल अश्रुधार बहने लगे। कुछ दिनों में ही सुबोध स्वस्थ होकर घर आ गया। किन्तु कमजोरी के कारण अधिकतर समय पलंग पर लेटा रहता ।

फुलवा एक दिन हिम्मत कर छोटे ठाकुर का हाल चाल पूछने आई और बहुत ही धीमी तथा हिचकिचाहट भरी आवाज़ में पूछा.. "छोटे ठाकुर की तबियत कैसी है ठकुराइन..? "

"पहले से बेहतर है।" ठकुराइन ने धीमी आवाज़ में कहा।

सुबोध ने अपनी गर्दन उचकाकर कर बाहर की तरफ देखने की कोशिश की, जैसे कि उसकी नज़रें किसी को तलाश रही हो। पूछा .. "छुटकी नहीं आई क्या माँ ?"

"छुटकी आई है छोटे ठाकुर हमरे पीछे छुपी है। रोज ही हमसे ज़िद करे रहे कि छोटे ठाकुर से मिलने जाना है।" फुलवा ने अपने पीछे छुपी छुटकी को आगे करते हुए कहा।

सुबोध ने छुटकी को पास बुलाया.. और छुटकी झट से अंदर दौड़ कर जाने को हुईं की तभी फुलवा ने रोक लिया और कहा.. "अरे नहीं बिटिया छोटे ठाकुर की तबियत ठीक नाही, तुम यही से बात कर लो। छुटकी समझ गई कि अम्मा उसको अन्दर जाने से क्यों मना कर रही है।

"काहे अम्मा तुम्हरे कारण ही तो आज छोटे ठाकुर की तबियत ठीक हुई है ना..!? फिर तो अब हम सबकी की जात तो एक ही हुई ना..!? "

छुटकी ने आज ऐसी बात कह दी जिसे सुनते ही कुछ पल का सन्नाटा छा गया। तभी ठकुराइन ने बात संभालते हुए कहा "हाँ.. हाँ .. छुटकी अन्दर आ जाओ।"

सहमति हुई वह सुबोध के पास पहुँची पर थोड़ी दूर ही खड़ी रही..।

" क्यों रे छुटकी कहाँ थी इतने दिन..?"

 छुटकी का बोलने का तो बहुत मन किया कि "हम कहाँ.. तुम ही तो इतने दिन से ग़ायब थे छोटे ठाकुर।" पर सबके बीच चुप ही रही ।

"अरे तूने अपने पीछे क्या छुपा रखा है दिखा तो..?!" छुटकी ने अपना हाथ आगे करते हुए मासूमियत भरे शब्दों में कहा "बॉल है छोटे ठाकुर..!" फिर अपनी नज़रें चारों और घुमाते हुए सुबोध से कहा "अब तो हम तुम आराम से बैट बॉल खेल सकते है ना छोटे ठाकुर ..? !"

"हाँ.. हाँ.. छुटकी क्यों नहीं ! जब सुबोध ठीक हो जाएगा तुम उसके साथ खेल सकती हो ।" ठकुराइन ने छुटकी के माथे पर हाथ सहलाते हुए कहा।

छुटकी भी हैरान थी कि जो ठकुराइन ऊपर से ही खाना परोसती थी आज वो आज उसके माथे पर हाथ फेर रही है। 

छुटकी ने सुबोध की तरफ देखते हुए कहा.. "छोटे ठाकुर तुम जल्दी से ठीक हो जाओ हम तुम्हें तंग भी नहीं करेंगे और तुम जितनी बार बॉल लाने को कहोगे उतनी बार ले आएँगे। तुम हमको जो मर्जी बुला लेना बिल्ली भी.. हम बुरा नहीं मानेंगे।" कहते हुए छुटकी का रूआँसा सा मुँह बन गया। सुबोध ने फिर उसे छेड़ते हुए कहा "अच्छा बिल्ली... जरा इधर तो आ।"

"क्या है छोटे ठाकुर " कहती हुईं वो सुबोध के नज़दीक पहुँची। सुबोध ने अपनी कलाई छुटकी की तरफ बढ़ा दी और कहाँ आज राखी है..! राखी नहीं बाँधेगी क्या.....?!

" क्या ..या.?" ये सुनते ही छुटकी और फुलवा को तो विश्वास ही नहीं हुआ और मारे खुशी के उनकी आँखें छलछला गई और खुशी से उछलते हुए कहा "सच ठाकुर ..? पर हमरे पास तो राखी है ही नहीं । "

"अच्छा ठीक है चल तू अपनी आँखें बँद कर।"

जैसे ही छुटकी ने आँखे बँद की, सुबोध ने उसका रिब्बन खोल दिया और कहा "ये ले.. अब बाँध दे राखी।" छुटकी ने बिना किसी देरी के 🎀 रूपी राखी सुबोध के कलाई पर बाँध दी। सुबोध ने आशीर्वाद का हाथ उसके सर पर रखते हुए कहा "आज से तू मुझे छोटे ठाकुर नहीं भैया बोलना".........



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