Sonnu Lamba

Tragedy


3.8  

Sonnu Lamba

Tragedy


चेतावनी

चेतावनी

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प्रकृति जैसे अपने रौद्र रूप में आ गयी थी.. बिन मौसम की बरसातें, समय असमय गिरती बर्फ, एकदम से बढता तापमान, आंधी, तूफान, इसी तरह की आपदाएं वर्ष भर से सोचने पर मजबूर कर रही थी कि हुआ क्या है..? 

दिन पर दिन बढते प्रदूषण के कारण ये सब हो रहा है ,ऐसा समझ में आ रहा था, उससे छुटकारा पाने के लिए कईं तरह के प्रोजक्ट सरकार की तरफ से भी सामने आ रहे थे, व्यक्तिगत स्तर पर भी लोग जागरूक कर रहे थे एक दूसरे को... लेकिन तभी एक खतरनाक वायरस का लोगो की जिंदगी में चुपचाप प्रवेश हो गया ... ये क्या है..? क्यूँ है..? कैसा है..? इसे समझ पाते.. उससे पहले ही... 

पूरी धरती पर हाहाकार मच गया , लोग एकदम से सकपका गये... शहर के शहर बंद हो गये, मानो धरती की गति थम गयी हो... लोगो को उनके घरो में बंद कर दिया गया, एक दूसरे से दूर दूर रहने की हिदायतें दी जाने लगी.. ..अजीब किस्म का खतरा था , मानव से मानव को खतरा.. सबसे शक्तिशाली मानी जाने वाली मानव प्रजाति हक्की बक्की, मुंह पर मास्क लगाये सुनी सूनी आंखो से निहार रही थी, शायद कुछ दिख जाये ,कुछ समझ आये, लेकिन खतरा अदृश्य था.. इस बार अजीब किस्म का अघोषित युद्ध था.. जिसमें सामने आकर लडना ही नही था, पीठ दिखाकर घर में छुप जाना था...।

ऐसे ही अपने घर की बालकनी के कोने में बैठी , मैं इन तमाम सवालो से विचलित....बेमन से अपने घर के गमले में लगे पौधो को देखने लगी, एक छोटे से पौधे पर फूल खिला था.. सभी पौधो पर नयी नयी कोंपले इठला रही थी... आसमान एकदम साफ और नीला दिख रहा था.. पेड़ पौधो पर हरियाली ही हरियाली थी.. चिड़ियां अठखेलियाँ कर रही थी... लेकिन रास्ते उदास थे, शहर उदास थे, चीत्कार केवल मनुष्यों में ही फैला था ...क्या मनुष्य प्रकृति के अनावश्यक दोहन की सजा भुगत रहा था ..? सोचते सोचते मैं फिर उदास हो गयी... और ईश्वर का ध्यान कर प्रार्थना की.. एक मौका तो दीजिए..हम अपनी जड़ों की ओर लौटेंगें... चेतावनी मिल चुकी है.. प्रभु..!! 






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