बसंत उजड़ गओ
बसंत उजड़ गओ
माई...! गज़ब हो गया..!
क्या हुआ रजुआ..? काहे सुबह-सुबह से चिल्ल मचाए हो ? जानकी ने बाहर आकर पूछा।
अरे माई..!वो..वो हरिया काका। हांफते हुए रजुआ बोला। माई..!हरिया काका ने खुद को पेड़ से लटका लओ।
का कह रहा है..?सच है माई।हे भगवान चल जल्दी..! जानकी बसंत पंचमी की पूजा की तैयारी कर रही थी। तुरंत घर को ताला डाल,रजुआ के साथ भागी।सुरती की तो दुनिया उजड़ गई।हे प्रभू यह कैसी परीक्षा ले रहा है तू..!
सुरती रो-रोकर बेहोश हो गई थी।हरिया का बेटा सिर पर हाथ रखे बैठा था। पुलिस अपने काम में लगी थी।
जानकी ने सुरती को संभाला। सुरती और जानकी एक ही गाँव से और बचपन की सहेली थी।
अरे सुरतिया जे का हो गयो रे..?ऐसो का हो गओ जो हरिया भैय्या को जै कदम उठानो पड़ो..?
बर्बाद हे गए जानकी..! हमाई तो जिनगी उजड़ गई..! तुमाए(तेरे) भैय्या पे इत्तो करज चढ़ो हतो, सोचे हते जै बार की फसल से कछु चुक जाएगो।इते ओलन (ओलावृष्टि) ने पूरी फसल ही चौपट कर दई..!
ऊपर से करजदारन(कर्जदार) की दादागिरी..! संझा(शाम) आए हते..! बैलों को छोर(खोल) ले गए..! बिना बैलों के जिनके गले से पानी न उतरे..! छोड़ गए रे जानकी..!
हम रतिया को सोतई रह गए..!वे हमें छोड़कर सदा ही को सो गए।
सुरती की हालत देखकर जानकी के आँख से आँसू नहीं रुक रहे थे।
हरिया की दोउ बिटियाँ ससुराल से आ गई थी। उनके करुण क्रंदन से गाँव वालों का कलेजा फटा जा रहा था।
हरिया का बेटा अभी छोटा था।गाँव के बड़े-बुजुर्ग आपस में बात कर रहे थे।
पता नहीं कौन-सा दिन ऐसा आएगा..? जब हम लोगों की सुध ली जाएगी।
पिछले बरस बिरजू अपने दूधमुँहे बच्चों को छोड़ गया।अब यह हरिया।
हरिया का बाप भी ऐसे ही चला गया था। पुलिस ने लाश पोस्टमॉर्टम के लिए ले जाने के लिए हवलदार को आवाज लगाई।
गोविन्द लाश को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दो।भीतर से सुरती सनसनाती चली आई।
ओ दरोगा बाबू..!अब का बाकी बचो है..? जो तुम हमार आदमी की चीराफाड़ी करोगे। हाथ जोड़े तुमार..!
चले जाओ यहाँ से..! हमें हमाए हाल पे छोड देओ..! जेई किस्मत है हमारी..! पसीना बहाओ..फसल उगाओ..! करज में डूबो, मरो..! कोई सुध नहीं लेने वाला।
जाओ हमें हमार आदमी की अंतिम क्रिया तो शान्ति से करन दो। हमाओ तो बसंत ही उजड़ गओ रे।सुरती फिर विलाप करने लगी।
गाँव वाले भी सुरती का साथ देते हैं। पुलिस लौट जाती है, हरिया का अंतिम संस्कार करते समय बेटा फूट-फूटकर रो रहा था।
हरिया रजुआ को भी बेटे की तरह ही प्यार करता था। हरिया के जाने से रजुआ भी बहुत दुखी हो रहा था। उसके बाबा शहर गए थे।
बेटे का विवाह होना बाकी था। एक चिराग बुझा, कितने जीवन अंँधेरे में कर गया। सदियों से किसान खून-पसीना बहाकर सबका पेट भरते हैं। खुद अक्सर भूखे सो जाते हैं।
