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anuradha chauhan

Inspirational


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anuradha chauhan

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सबक जरूरी है

सबक जरूरी है

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विश्वजीत सिंह अपने परिवार के साथ दिल्ली में रहते थे। उनके परिवार में दो बेटे एक बेटी और पत्नी मंजू थी। बहुत सुकून भरी जिंदगी थी।वह एक कामयाब दिल के डॉक्टर थे खुद का हॉस्पिटल खोल रखा था साथ ही एक बड़ा सा बंगला बना रखा था। मंजू भी डॉक्टर थी।लक्ष्मी जी की विशेष कृपा प्राप्त थी ।


मंजू भगवान ने हमें बहुत कुछ दे दिया बस यह बच्चे भी हमारी तरह डॉक्टर बन जाए तो हमारे इस सपने को और भी विस्तार देकर हमारा नाम रोशन करेंगे।विश्वजीत ओर मंजू दोनों ही अपने बच्चों को अपनी तरह एक कामयाब डॉक्टर बनाना चाहते थे पर बच्चों के सपने कुछ और ही थे।


"नहीं पापा...! यह डॉक्टरी हमारे बस की नहीं,यह भी कोई ज़िंदगी है पहले किताबों में घुसे रहो फिर मरीजों में..!जब इमरजेंसी आए तो न दिन का पता न रात का, नहीं मुझे तो आसमान में उड़ान भरनी है" रमन बोला।


"मेरा सपना इंजीनियरिंग का है पापा..!" विपुल बोला।


"मैं तो मॉडल बनने के लिए पैदा हुई हूँ,देखना एक दिन टॉप मॉडल बनूँगी पापा" रूही बोली।


"जैसी तुम लोगों की मर्जी..!अब तुम लोग बड़े जो हो गए हो, करो अपने मन की।" विश्वजीत ने बच्चों पर जबरन अपने सपने नहीं थोपे। एक बेटा पायलट बन गया दूसरे ने इंजीनियरिंग कर अपनी राह पकड़ ली।


मंजू ने बेटी को बहुत समझाया। बेटा रूही यह चकाचौंध की ज़िंदगी में सुकून नहीं है,कोई और राह चुन लो और अपनी ज़िंदगी को ठहराव दो,मॉडलिंग की जिद छोड़ दो बेटा।


"नहीं माँ मैं खाना छोड़ सकती हूँ पर मॉडल बनने का शौक नहीं!!बस अब मेरे पीछे मत पड़े रहो..!" रूही तो फैशन की दीवानी थी तो वह माँ बाप की मर्जी के खिलाफ जाकर मॉडल बन गई और फिर एक दिन अपनी मर्जी से शादी कर विदेश में जाकर रहने लगी।


पति-पत्नी ने भी हालात से समझौता कर लिया।सत्तर का दशक तक पहुँचते-पहुँचते विश्वजीत और मंजू पर उम्र हावी होने लगी और मेहनत करने की क्षमता भी कम होने लगी थी।


"सुनो जी हॉस्पिटल किराए पर उठा दीजिए और हम दोनों हफ्ते में तीन दिन शाम के समय ही मरीजों को देख लिया करेंगे,इस तरह शरीर को भी आराम मिलेगा और बच्चों के साथ समय बिताने का मौका भी, पूरी जिंदगी मेहनत में गुजर गई,क्यों न अब बच्चों के साथ समय बिताया जाए?"


"सही कहा मंजू! मुझे तुम्हारा निर्णय पसंद आया!"


उन्होंने हॉस्पिटल दूसरे डॉक्टरों को किराए पर चलाने के लिए दे दिया। दोनों ने अपनी बची-खुची ज़िंदगी बच्चों के साथ घर पर बिताने निश्चय कर लिया। विश्वजीत की बहुएं रईस घरों की बेटियों थीं और दोनों ही अच्छे पदों पर कार्यरत थी। 


घर के काम के लिए नौकर चाकर लगे थे।दोनों पति-पत्नी डॉक्टरी छोड़ कर पोते-पोतियों के साथ घर पर अपना समय बिताने लगे।


जब तक दोनों अपने कामों में व्यस्त थे सब कुछ अच्छा चल रहा था।अब माँ बाप का पूरे-पूरे दिन घर पर रहना बहुओं को अखरने लगा था।बस यहीं से परिवार में छुट-पुट कलह की आवाज़ें उठने लगी।


"दीदी आपको नहीं लगता मॉम-डैड बच्चों को हमसे दूर कर रहे हैं?हम ऑफिस से आते हैं फिर भी बच्चों को कोई फर्क नहीं पड़ता पहले कैसे दौड़कर आते थे।"


"हम्म सही कहा अब दो घड़ी आराम से बैठो तो बहू कैसी रही दिनचर्या? क्या क्या किया आज? अब यह भी कोई बात है?आजादी से साँस लेना मुश्किल हो गई है।"


विश्वजीत ओर मंजू सब सुनकर भी शांति से सब अनदेखी कर रहे थे। उन्होंने धीरे-धीरे बच्चों और बहुओं से दूरी बना ली और अपने कमरे में सिमट गए।


मंजू मन ही मन दुखी होती पर खुश रहने का दिखावा करती रहती। एक दिन दिल के दौरे से मंजू विश्वजीत को हमेशा के लिए अकेला छोड़ इस दुनिया से विदा हो जाती है 


मंजू के जाने के बाद अपना अकेलापन दूर करने के लिए विश्वजीत रोज सुबह-शाम बगीचे में पहुंच कर अपनी उम्र के बुजुर्गो के साथ वक्त बिताने लगे। घर पर पिता की जिम्मेदारी कौन उठाएगा इस बात को लेकर दोनों भाइयों में अक्सर झगड़े होने लगे। 


"भैया यह ठीक नहीं है..!आपको पहले पता था कि निशा के मायके में शादी है और हमें वहाँ जाना जरूरी है फिर भी आपने विदेश घूमने का प्रोग्राम बना लिया। दोनों चले जाएंगे तो पापा के साथ कौन रहेगा?" विपुल बोला।


"अरे तो हम अपनी छुट्टी खराब कर दें? पिताजी मेरे अकेले की जिम्मेदारी हैं क्या? पिछली बार भी तुम लोग बिना बताए घूमने चलें गए। हमें मजबूरी में टिकट कैंसिल कराने पड़े।" रमन गुस्से में बोला।

"ए घूमने चलें गए।"

"तो चले जाओ ना..! वैसे भी नौकर-चाकर हैं तो? फिर हम क्यों अपने शौक छोड़ें? विपुल बोला।

आप दोनों बेकार ही झगड़ा कर रहे हो..!डैड को बोलो अब प्रॉपर्टी का बंटवारा कर दें, उसके बाद उन्हें वृद्धाश्रम में भेज देते हैं वैसे भी घर पर रहते हैं तो कमरे में बंद रहेंगे या बाहर हमउम्र के लोगों के साथ! इससे तो बेहतर है कि वो उनकी ज़िंदगी जिएं हम हमारी..क्यों भाभी?" निशा की बात का सबने समर्थन किया।

रात को खाना खाने के बाद विश्वजीत से रमन ने जो कहा वो सुनकर विश्वजीत की आँखों में नमी तैरने लगी‌। उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उनके बच्चे उनके साथ ऐसा व्यवहार करेंगे।उस समय उन्होंने ज़्यादा कुछ तो नहीं कहा बस इतना बोले..! ठीक है जैसी तुम लोगों की मर्जी, मुझे एक महीने का समय दो फिर मैं अपना निर्णय बताता हूँ।

उस दिन से विश्वजीत रोज सुबह नाश्ता कर घर से निकल जाते ओर रात को लौट कर आते थे। उन्होंने घर पर खाना खाना बंद कर दिया,किसी के किसी भी सवाल पर जबाव दिए बगैर अपने कमरे में चले जाते थे।

एक महीना पूरा हो गया।विश्वजीत ने रात खाने के वक्त बेटों और बहुओं को सुबह दस बजे नाश्ते की टेबल पर मिलने को कहा।कल सुबह ठीक दस बजे सब यहीं मिलना मुझे वसीयत की घोषणा करनी है सो वक्त पर मौजूद रहना इतना कह कर वह सोने के लिए अपने कमरे में चले गए।

"बधाई हो भैया..!फायनली पापा ने चुप्पी तोड़ी। मुझे तो लग रहा था कि उन्होंने हमारी बातों को हवा में उड़ा दिया।"

"सही कहा विपुल मुझे भी यही फीलिंग आ रही थी।चलो देर से ही सही पर उन्होंने फैसला तो लिया।" मुझसे तो अब सुबह होने का इंतज़ार करना भी मुश्किल हो रहा है।"चलो सुबह जल्दी उठना है गुड नाईट"बच्चे वसीयत के सुनहरे सपनों में खो गए कि कल किसके हिस्से में क्या आने वाला है।

सुबह का वक्त सब वक्त से पहले हाज़िर थे।सबकी निगाहें विश्वजीत के कमरे की और थी। सबके चेहरों पर खुशी की झलक दिखाई दे रही थी।वकील साहब के आगमन के साथ ही इंतज़ार की घड़ियाँ खत्म हो गई। "भैया वकील साहब..!" विपुल ने इशारा किया।

"हम्म चुप बैठे रहो..!आइए अंदर आइए रमन ने आगे बढ़कर कहा।जया वकील साहब के लिए चाय बना कर लाओ!"

"नहीं उसकी कोई जरूरत नहीं है मैं घर से चाय-नाश्ता करके आ रहा हूँ, तुम लोग मेरे लिए तकलीफ़ मत करो".. वकील साहब बोले।

दस बजने में पाँच मिनट बाकी थे।यह पापा भी..! इतनी देर क्यों लगा रहे हैं..? विश्वजीत के आने में देरी से विपुल मन ही मन बड़बड़ा रहा था।

थोड़ी देर में विश्वजीत भी आ गए।"आ गए वकील बाबू..! कुछ चाय पानी मँगाऊँ..?या पहले वसीयत का कार्य हो जाए..?"

"पहले यह काम हो जाए विश्वजीत अंकल फिर देखते हैं! पापा ने आपको घर भी बुलाया है।" वकील सुमेर विश्वजीत के दोस्त का बेटा था।

वसीयत में क्या लिखा गया उसकी घोषणा होने लगी,फिर वकील साहब के एक-एक शब्द के साथ बेटे और बहुओं के पैरों के नीचे से जमीन सरकने लगी। 

घोषणा इस प्रकार थी विश्वजीत सिंह ने पूरे होशो-हवास में अपनी चल-अचल संपत्ति का आधा हिस्सा वृद्धाश्रम चलाने वाली संस्था को दान में दे दिया है और इस घर को खाली करने का तुम लोगों के पास एक महीने का वक्त है एक महीने बाद संस्था यहाँ वृद्धाश्रम चालू करेगी।

विश्वजीत अपने दोनों बेटों से बोले "तुम लोग यही चाहते थे ना..? मैं अपनी संपत्ति का बंटवारा करके वृद्धाश्रम में जाकर रहूँ..? तो लो मैंने तुम लोगों की इच्छा पूरी कर दी।अब मैं वृद्धाश्रम में रहूँगा पर कहीं और नहीं…! वृद्धाश्रम तो खुद मेरे पास मेरे घर में रहेगा।"

हॉस्पिटल से आने वाले किराए से इन लोगों का मुफ्त में इलाज होगा।अब मैं मेरी दुनिया में खुश और तुम तुम्हारी दुनिया में..!बस में कुछ और नहीं बोलूँगा, तुम जैसी औलाद के लिए यह सबक जरूरी है। जाओ और अपने जाने की तैयारी करो..!"



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