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Rabindra Mishra

Classics


3  

Rabindra Mishra

Classics


बस एक झूठ

बस एक झूठ

13 mins 139 13 mins 139

बिलकुल अंतिमक्षण या ना के बराबर स्थिति पहुंचतेही लोग मरीज को लेकर दिखाने या सलाह लेने के लिए उनके पास आते हें। लोगोकि इस आदत पे अक्क्सर बो झल्लाकर बरश पड़ते हें – ‘ एक दिन पहले क्यौन नेहीं लाये, क्या पेशानी था?’ कारण बिलकुल साफ – दिखने का शुल्क पाचीस रुपया। उससे ज्यादा समस्या ये हे की लोग डा॰रमण को दिखाना या सलाह लेने की हालत को जितना हो सके टालना चाहते हें कारण डा॰रमण का प्रबेश मतलब अपसगुन या दिल थाम लेने बाले स्थिति का सामना करना। एकबार मंजर पे बो दाखिला लिया मतलब अच्छा हो या बुरा –तुरंत फैसला सुनाते हे। कोई झुटा-तससली या सच्चाई को छुपाकर उम्मीद दिलाना ना तो उनका आदत हे या उनसे बेसा बरताब का उम्मीद आप कर सकते हो। दरअसल लंबे समयसे अभ्यास और तजुर्र्बा उनके अंदर बेसा एक क्षमता भरदीया हे जिसके बदौलत आगे क्या होगा उन्हें मालूम हो जाता हे। इसीलिए उनका “बचन” या बात किममती और लोग बिलकुल एहेमियात देते हें। सच बोले- डा।॰रमण का हर एक बात एक साधारण डाक्टर का नेहें बल्कि एक न्यायाधीश का अंतिम फेसला माने जाते हें – इसीलिए की उसके बोहि बात पर मरीज का जीना या मारना टिक्का रहता हे। ये सब डा॰ रमण को ना तो कभी परेशान किया ना भाबुक। कुछ झूट-मुट का तसल्ली, खुस करने या आशा दिलानेबाली बात कहने से किसिका जान बच जाएगा, बो दलील को बो कभी नेहीं मानते। उन्हें मालूम की कुदरत कुछ समय के बाद सच्चाई को सामने ले आयेगा और लीखा हुआ पगडंडी पर ही आगे निकाल जाएगा। तो झूट-मुट का तसल्ली का फ़एदा क्या? लेकिन मरीज पे अगर उन्हें हल्का सा या सूच्याग्र उम्मीद नज़र आ जाता हे तो उशिख्यन कोर्ट उत्तरके बो मरीज की सेबा पे लग जाते हें। दो-घंटे या दो-दिन , कितना समय लगेगा बो सोचते नेही, लेकिन जरूर मरीज का जीबन “यमराज” कि हात से पुरस्कार हेतु छिन कर ले आते हें।  

शोते हुए मरीज के पाश खडेहुए उसे लगरहा था काश उह्ने इस वक्त कोई झुटा ही सही लेकिन तसल्ली भारी दो बात की होती तो कुछ पल के लिए कमसेकम इस घुटन और मानसिक दबाब से मुक्त सांश ले सकते। माथे से निकलरहे पानी को रुमाल से पोछते हुए फिर मरीज के पास चौकी पे बेठते उसे करुणा भरी नज़र से देखने लगे। बिस्तर पे उसका इस दुनिया में सबसे एहेम और जान से प्यारा दोस्त “गोपाल” बेसुध पड़ा हुआ हे। उससे अपना नज़र हट लिया।  

यादों की दर्पण में सीनेमा की तरह बो बीतेहुए लम्हे फिर से उजागर होगई। बालवाड़ी से लेकर आजतक- पूरे चलिशसाल[40-years] यह रिस्ता एसे ही चली आ रहिहे , ना कोई थकान ना कोई रुकाबाट। तालमेल और आपस में प्यार इतना गहरा हे की उसमे कभी फूंन्ट की गुंजाइश ही नेहिं। हाँ, समय की मांग और काम की उलझन में अभी पहले जेसा बराबर मिलनेहिं पा-रहेहें, फिरभि फुर्सत मिलते ही प्राय ‘इतबार’ में गोपाल उनका क्लीनिक में चलेआते हें। क्लीनिक का एक खास कोने पे पड़ा हुआ चौकी में बेठे धीरज के साथ उसका इंतज़ार कर रहे थे ताबतक, जब उसका काम खतम हो। काम से मुक्त गोपाल की होंठ पे उसके लिए बो प्यारभरा मुस्कान से बो सब थकान तुरंत भूल जातेथे। फिर दोनों दोस्त पास की कोई अच्छा होटल में खाना खाने के बाद हल में सिनेमा का मज़ा जरूर लेते। फिर कोई पब्लिक-पार्क या बेसि जगह बैठ घर से लेकर कामकाज की बातों में तल्लीन हो-जाते थे। दोनों की आपसी-समझ और दोस्ती प्यार-की-डोर में ऐसे मजबूत होगया हे की किसी भी हालत या समय की मांग उसे प्रभाबित कर नेही पाया।बलकि समय के साथ-साथ उनका दोस्ती सभी के लिए एक “उत्कृस्ट-दोस्ती” का मिसाल कायम किया हे।    

इसी डाक्टरी-पेशा की झिंझट और पुरा-दिन फंशे-रहना से बो अनुमान लगानेहिं पाये थे की तीन-महीने से गोपाल के साथ भेट नेहिं हुआ हे या बो क्लीनिक नेहिं आयाहे। पर एकदम भीड़-भाड़बाले बो दिन क्लीनिक के कोने में बैठे हुए गोपाल की बड़े-बेटे को देखकर उसे गोपाल क्लीनिक ना आनेकी एहेसास तो हुआ पर मरीजों के बीच उलझा हुआ बो उससे बात कर नेही पाया।लगभग एकघनता या ज्यादा समय के बाद अपरेसन-रूम को जाते वक़्त कुछपल ठेर पूछा-“ तुम्हारा यहाँ क्या जरूरत पडगाए श्रीमान ?”   

बिलकुल घबराहट और सरमाते हुए जबाब दिया- ‘माँ यहाँ मुझे भेजे हें ‘

में तुम्हार क्या सेवा कर सकता हूँ ?

‘ पापा का तबीयत गंभीर हे ‘ बहुत धीरे उन्होने जबाब दिया। 

( ३ (

अपरेशन दीबस हेतु सब काम निपटाते ३ बजगाया। वहाँ से सीधा लली-एक्सटेनसन पे गोपाल का घर। बंधु-पत्नी उसे सीधा गोपाल शोया हुआ बेड के पास लेगई। बेड में गोपाल एसे पड़ा था जैसे गहरा नींद में सोया हुआ हे। कुच्छ-पल उसे निहारने के पश्चात उसका बीबी से पूछे – कब से एसा पड़ा हुआ हे?

लगभग डेढ़-महिना होगया।

ट्रीटमेंट कौन कर रहा हे ?

रस्ते का अगला हिस्से में रहता एक डाक्टर। हर तीन-दिन में एकबार आकार देखभाल के साथ-साथ जरूरत मेडेसीन दे रहे थे। 

क्या नाम हे उस महाशय का? जो भी नाम बंधु-पत्नी लिए, बेसा नाम कभी सुना हो, नेहीं लगा। शायद उसे नेहीं मालूम। फिर गोपाल की पत्नी से कहा – हमारा दोस्ती और रिश्ता के बारे में सब को मालूम। बो सहाब अगर मेरे को बताते, तो अच्छा होता। पर आप ने क्यौन इस हालत के बारे में बताए नेहीं ?

आप काम में इतना उलझे हुए रहते हो की और उलझन में डालना मुनासिब नेहीं समझी – दुखियारी सुर में बंधु-पत्नी बोले।। 

पूछ-ताछ में और समय गबाने को मुनासिब नेही समझे। तुरंत कोर्ट उतारकर अपना डाक्टरीझोला[bag] से इंजेकसन ट्यूब और सुई निकालके पानी मे उबाल ने लगे। बंधु-पत्नी घर का एक कोने में खड़ी असमझ नजर से देख रहिथी। सायद बो कुछ पुछने बाली थी, परंतु उससे पहले डाक्टर ने कहा- ‘कृपिया, अभी कुछ पूछो मत, मुझे काम करने दो’। फिर माँ के पास खड़े बच्चों के ऊपर नज़र डालते कहा- बड़े को थोड़ा-बहुत सहयोग के लिए छोड़ बाकि सबको यहाँ से दुसरे और ले-जाइए ‘। फिर मरीज को बिसोधित इंजेकसन में दबाई देनेके बाद पास पडि कुर्सी पे बैठकर उसे अपलक देर् तक देखते रहे। मरीज बेसा ही बेसुध पड़ा हुयाथा। इंजेकसन के बाद भी कोई बदलाब या बिलक्षण नेहीं। डाक्टर के बदन में पसीना। थकाबट से आँख बंद हो जा रहा था। बंधु-पत्नी यह सब देखते हुए पुछी- “एक कप काफी बना दूँ ?”  

सीधा क्लीनिक से यहाँ आने कि बजह दोपहर का खाना नसीब नेहीं हुआ था,इसीलिए भूक लग तो रहा था पर ऊपर से कहा- “ नेहीं “। फिर एकबार मरीज को निरीक्षण करने के बाद खड़े होते ही बंधु-पत्नी से बोले – में तुरंत लौट के आ रहा हूँ। मेरे लौट आने तक उसे एसे ही शोने देना,किसी हालत में भी परेशान मत करना।“ फिर पलट जबाब शुने बिना कार में बेठकर चलेगये। करीब पंद्रह मिनिट के बाद एक नर्स , पुरुष सहायक और कुछ डाक्टरी समान के साथ लौट आए। सामने बंन्धु-पत्नी को देख कर धीरे पर बजनदार आबाज में बोले- ‘में तत्काल उसके शरीर में एक अपरेशन करुंगा। अपरेसन का नाम शुनते ही मरीज कि बीबी खुद को संभल नेही पाई। परेशानी और दर के मारे पुछे-

क्यौन.......क्यौन डाक्टर ?

जल्द आपको इसका जवाब दूंगा, लेकिन अभी नेहीं। बड़े बेटे को छोड़ बाकी आप सब दूसरे कमरे में चले जाईए। जब में बुलाऊंगा, तब आएंगे, जल्द ......”। डॉक्टर का ऐसा बर्ताब और आचरण से बंधु-पत्नी घबरा गए शायद। बहुत-ज्यादा परेशानियाँ और डरबाना दबाब के तहत वोहिं फार्स पर लुड़क गए। डॉक्टर के साथ आया नर्स तुरंत उसे उठाके पास बाले कमरे में ले गयी। 

शाम आठ बजे के करीबन मरीज थोड़ा आँख खोलने के साथ बिस्तर के ऊपर हलचल हुए। यह देखकर उनका सहायक खुसी के मारे उछल पड़े और डाक्टर को उछसित आबाज में उच्छे सुर से बोले- ‘सार, बो खतरे से बाहर, देखिये ना आँख खोलने के साथ बिस्तर पर इधर-उधर हो रहे हें...........। डाक्टर कुछ पल के लिए एक्टट नज़र में निहारने के बाद बिलकुल धीरे कन-फूसी आबाज में कहा- “ में भी उसे बिलकुल तंदरुस्तदेखना चाहता हूँ , पर उसका दिल..........” 

पलूस का रफ्तार में उन्नति के साथ साथ नरमाल हो रहा हे सार।  

‘ठीक हे...ठीक हे। लेकिन बो झूठा गति और बदलाब के ऊपर भरोषा करोमत। एसे ही केस में बो सब बिलकुल मामूली बात’….जबाब देने के साथ डाक्टर ने फिर एक बार शोते हुए मरीज को कुछ समय तक टोटल ते रहे। तत-उपरांत सोचने बाले अंदाज में बोले – एसा ही हालत अगर कल शाम आठ बजे तक कायम रहेगा, तो आनेबला चलिश साल तक और कोई परेशानी नेहीं होगा। पर... में शंका में हूँ कि इस दो रात में हम कुछ भी अप्रत्याशित हादसा को सामना करेंगे।  

सहायक को वापस हसपाताल भेजकर खुद मरीज के पाश कुर्सी पे बैठ गए। रात ग्यारह बजराहा था। मरीज ने आँख खोलने के साथ जिगरीदोस्त को पास बैठे देखते ही एक छोटा सा मुस्कान होंठो पे फ़ेल गया। हालत में थोड़ा सा सुधार के साथ बो कुछ तरल खाना भी लिया। यह देखकर घर के सभी सदाशयों के बीच खुसी और उस्छाह लौटाने के साथ साभिने डाक्टर के चरो-तरफ घूमते हुए अपना सुक्रिया अदा करने लगे। पर डाक्टर का ध्यान ना तो उस-तरफ था या बो कुछ शुन रहे थे। बस दोस्त के पास बैठे हुए एक्टट उसे निहार रहे थे। उसका इसतरह के रोगी को झांकना और रहस्यमय बर्ताब गोपाल के बीबी को अखरा रहा था। चुप्पी तोड़ने के बासते उन्होने बोली –

क्या बो अब खतरे से बाहर हे?

बगेर उन्हें देखे डाक्टर ने भारी-आबाज में जबाब दिया – “ हर चलिशमिनिट अंतराल पे दो-दो चमच ब्रांडी और ग्लूकोज देते रहिए। कुछ समय के बाद बो अपना काम दिखाएँगे। 

गोपाल की बीबी को बिलकुल अ-सयम लगरही थी। बीबी के नाते अपना सोहर का हालत और स्थिति उसे बिलकुल मालूम होना चाहिए। पर डाक्टर साहब साफ तोर पर कुछ बता ही नेहीं रहे हें। मरीज के पाश बो उसे कुछ पूछ भी नेही पा रही हे। बो खुद को और रोक नेही पाई। रसोईघर खिड़की से अंगूठी ईशारे पे डाक्टर को बुलाई। डाक्टर उठकर आते ही बेचैन महिला बोली-

बो अब कैसे हें ? उनका हालत .......... 

होंठों के ऊपर अपना अंगूठा रख कर चुप-रहेने का इसरा करते हुए डाक्टर ने गंभीर आबाज में बोले- “ इतना ज्यादा उस्छाह दिखाने का समय आया नेहीं। सही समय आने से सबकुछ बताऊंगा। बहतर होगा अभी कुछ मत पूछिए। यह सुनते ही बंधु-पत्नी की आंखे दर के मारे फैले गयी। दोनों हात जोड़े प्रार्थना भरी आबाज में काही-

डाक्टर साहब, मुझे सच बताइये 

में इस मसल पर कुछ ना बोलू तो सबसे अच्छा होगा- कहते डाक्टर फिर अपना कुर्सी के पास लौट गए। बंधु-पत्नी डाक्टर के इस रबए पर फुट-फुट रो-पड़ी जो सुनशान कमरे की चरो और तुरंत फेलगाया। उस आबाज से मरीज घबराहट और हड़बड़ी में उठगए फिर जिस दिशा से रोने की आबाज आ रहा था उस तरफ देखने की कोशिस की। डाक्टर यह देखते हुए रसोईघर की खिड़की को ज़ोर से बंद कारदिया जेसे कोई आबाज ना आबे।  

डाक्टर कुर्सी के पस लौट ते ही घबराया हुआ गोपाल चुपपीसी आबाज में पूछा- “ उधर कोई रो रहा है क्या ? डाक्टर बोले- ‘यह सब लफड़े से तेरे को कोई लैन-देन नेहिं, तुम बिलकुल शांत और चुप रहो ‘। फिर मरीज का “नाड़ी” का गति को परखने लगे। घबराहट और ऊत्तेजीत होने से नाड़ी का गति ज्यादा हो गया था। चुप रहने से बिपरित गोपाल फिर एकबार बोले- 

सच-सच बता में जिंन्दा रहूँगा या जा रहा हूँ ? कुछ बी छुपना मत ....... 

ईस तरह का सबाल से बो नाराज़ होने के साथ साथ कटु बचन मुहू पर चले आ रहेथे। पर सबकुछ अपने अंदर दबाके मरीज के पास बैठ गए। एसा हालत ना पहेले कभी बो साम्ना किया था या तजरूबा। एक तरफ जिगरी-दोस्त, दूसरा और उसका स्वभाब। झुटा तसल्ली देना उसका आदत से बाहर, इसीलिए तो लोग उसके कहे हुए बात को आँख मूँद कर मानने के साथ मोल देते हें। फिर बो क्या करें? इस दुबिधा से बचने ल\के लिए बो अपना आँख चुराने की कोशिश की। पर गोपाल धीरे अंगीठे में टटोल ते हुए उसके हात पकड़ कर कन-फूसी आबाज में बोले- 

में और कितने समय का मेहमान हूँ , यह जानना बेहद जरूरी हे। उस हिसाब से तयार किया मेरे “ऊईल” पे दस्तखत करूंगा। साथ में गबही के तोर पर तू भी दस्तखत करदेना।  

‘ओह, तुम एसे बेकार की बात करके खुद को उत्तेजित कर रहे हो। बहतर होगा एकदम चुप हो जाओ’।बही बात को बार बार दोहराने से उसे लगा की बो अपना बेवकूफी दिखा रहा हे। दबाब से भरा हुआ डक्टर का मन और सोच खुद को कहा- ‘कितना अच्छा होता ...येसब छोडकार कहीं और चले जाने से ........ना कोई आसपास होते ना कोई सबाल या जबाब .........कांसे कम सकूँ तो मिलता’....... मरीज ने फिर उसके हात को पकड़के फुले हुए सांश में बोले-

यह मेरा खुस-नसिब हे की इस घड़ी में तू मेरे पाश बैठे हुए हो रामू। तेरे हर एक-एक बात पर मेरा अटल बिस्वास हे। इस हालत में मेरे सब संपत्ति को यूं अन-सुलझा छोड़ कर चलेजाना नेहिं चाहता हूँ। अगर मुझे कुछ भी हो गया तो मेरे बीबी-बच्चे रास्ते पे आ-जाएंगे। सुबया और उसके साथी के बारे में तुझे तो सब मालूम हे। इसलिए देर होने से पहले सबकुछ साफ-सुतरा करके जाना पसंद करूंगा। कीपया मुझे साफ-साफ बता तो में दस्तखत करदूंगा। रामू प्लीज़................   

डाक्टर अपने आप को कहा- ‘अभी”। लेकिन परेशान दोस्त को कुछ बता नेही पाए। इस कसमाकाश से बचने के लिए बो बाहर आ-कर रखे हुए अपने गाड़ी की सामने बाला सीट पर बैठ गए। पर दोस्त का पूछा हुआ सबाल उसका पीछा नेहीं छोड़ रहा था। बल्कि कानों में गूंज रहा था। हात में पहनेहुए घड़ी देखा, रात का ग्यारह बज रहा था। उसका अंदर की डाक्टर आबाज दी- “अगर ‘ऊईल’ दस्तखत करना हे तो अभी से दो घंटे के अंदर होना चाहिए, अन्यथा कभी नेही। इस नाजुक हालत के लिए बो कभी जीमेदार नेहीं हो पाएगा। लेकिन बो गीध सूबेया और गोपाल की पूरा घर का हालत उसे मालूम हे। बो क्या कर सकते हें ?’     एक हात में जिगरी-दोस्त का जान और उसके पूरे परिबार, दूसरा और खुद का असूल-मानसम्मान-और काम करने की तरीका। मरीज का हालत और अपना अनुभब को मानते हुए अगर “हाँ” करेंगे मतलब मरीज के मृत्यु-परवाने पर मोहर लगा रहे हें जो गोपाल की बची-खुची बचने की उम्मीद पर पानी फेर देगा, और अगर सच्चाई को छुपा ता हे तो खुद के असूल और प्रतिषठा पर........... तिलमिला गए डाक्टर इस कसमाकाश और दबाब से। गाड़ी से उतार कर फिर मरीज के पास आ गए। मरीज उसे एकदम उम्मीद भरा नज़रों से देख ते रहे। डाक्टर के अंदर का आबाज कहा- अगर मेरे एक ही ‘झूठ’ से मरीज का जान बच जाता हे तो में कोई भी अपमान या निन्दा को नेही डरता हूँ या मर नेही जाऊंगा। मेरे एक ही बात पर एक जान टीके हुए हें। बो समझ रहे थे की जिंदेगी में पहली बार बो असूल से हटकर झूठा अभिनया कर रहे हें। सच्चाई को छुपाने के लिए उम्मीद का मरहम लगा रहे हें। डाक्टर ने खुद को तयार किया। अपने हर शब्द पर जनभुझ कर ज़ोर डाल कर कहा- “ शुन गोपाल, अभी बो ‘ऊईल’ के बारे में सोचना या फिकर करने की जरूरीनेही। हालत तुम्हारा आहिस्ता-आहिस्ता अच्छा हो रहा हे। दिल का सेहत भी ठीक हो रहा हे ............। दोस्त की होंठो पे ये बात सुनते ही मुरझा हुया गोपाल की बदन में एक चमक लौट आया। तनाब रहित खिले हुए लफाज में कहा-

यह तू कह रहा हे ! तेरे मुहूँ से निकल्ला हे मतलब यह बिलकुल सच्च हे।

डाक्टर ने कहा- बिलकुल सही। हर मिनिट पे तेरे सेहत में बदलाब आ-रहा हे। तुम अच्छा हो रहे हो। मेरे बात मानो, किसी भी हालत में उत्तेजित ना-होकर आराम से गहरे नींद मे शो जाओ। में कल सुभा फिर आकर चेक करूंगा। गोपाल आभारी नज़र से कुछ पल देखने के बाद गहरे नींद में शोगए। डाक्टर दरबाजे को आहिस्ता बंद करके अपना गाड़ी के पाश लौट आए।   

आधी रात गोपाल के घर से अपना घर लौटते वक़्त रास्ते में अपना क्लीनिक में थोड़ा रुकगाए। सहायक को बुला कर कहा- “ बो लली-एक्स्टेन्सन बाला केस, कभी भी खतम हो सकता हे। हार्ट ट्यूब साथ लेके वहाँ चले जाओ। अंतिमक्षण में ज्यादा तकलीफ होगा तो ट्यूब लगा के छती के अपर दबाते रहना, बाकी जो होगा..........कुइक। जल्द वहाँ पहुँच जाओ।

अगला सुभा दश बजे डा॰ रमण गोपाल के घर आ-पहुंचे। पहुँचते ही गाड़ी से सीधा गोपाल के पाश दौड़ पड़े। ताबतक मरीज उठगाए थे और एकदम चंगा और सतेज लगरहे थे। सहायक हार्टबिट और नाड़ी सही चलने का सूचित किया। पर कुछ भी जबाब दिये बिना खुद स्टेथो चिपका के हार्टबिट परख ने लगे।फिर एकदम खुस होकर गोपाल की बीबी को कहा- “ इतना निराश और मायूष मत हो। यह तुम्हारा सोहर और मेरे दोस्त नबे साल तक जिएगा। जाओ...घरमै खुसी मनाओ।

 फिर वापसी रास्ते में सहायक अबिश्वास भरा शब्द में बोला- क्या सचमुच बो इतने सालटक जिएंगे सार? में बाजी मारता हूँ, बो नबे शाल तक जिएगा, क्यौंकी मृत्यु को बिलकुल करीब से उन्होंने हराया हे। पर इतना खतरनाक दिल-की-दौरे से बो केसे बच गया, ये बात जीवन भर मेरे दिमाग में उलझता रहेगा ...गाड़ी चलाते चलाते डाक्टर ने उत्तर दिया।


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