मेरा दादी माँ

मेरा दादी माँ

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हम हिंदुस्तानियों के घर में दादा-दादी, नाना-नानियों के एक अहम भूमिका होते है। खास कर हमारा समाज और जीवन गांठ-बंधन परिवार के निम्ब पर खड़े हुए हैं। इस एक्सिबि साल हम उस गठबंधन से बिखर गए हैं फिर भी आज बहुत सारे परिवार में छुट्टियाँ होते ही गांव जाने की ख़्वाहिश रखते हैं, क्यों कि पूरा परिवार इक्कठा होकर मिल जुलके जो मस्ती और प्रेम आपस मे बांटते हैं वो कोई आउटिंग से कहीं ज्यादा सुंदर लगताहै। मज़ा और प्रेम तब गहरे लगते हैं अगर दादा-दादी या नाना-नानी मौजूद हो। बच्चे पहुंचते ही उनके जो आनंद और बच्चों के ख़ातिर दौड़ दौड़ कर सबकुछ जुटाना और दिलवाने में जो अपनापन झलक रहता है, आधुनिक शहरी फ्लैट जीवन में वो सोच से बाहर है ।

मुझे याद है- जब पापा अपना खुद का धंधा पानी के लिए परेशान हो रहे थे, नौकरी छोड़ शहर में अपना बिजनेस शुरु करना चाहते थे, तब मामा-पापा आपस में भीड़ जाते थे। मम्मी नौकरी छोड़ने के खिलाफ और पापा पैसों के लिए अपने असूल के साथ सलीस ना करने की ठान, बस दादी माँ एक चुटकी में हल कर दी थी। एक पुराने बक्से से अपनी जमा पूँजी को बेटे के हाथ मे देकर शहर में अपना व्यापार करने की जो साहस और विश्वास दिखाई, आज कल माँ -बाप में ऐसा विश्वास बहुत कम है। पापा शहर चल गये तो दादी ममी को भी उनके संग भेज दी इसीलिए की उनके बेटे अकेला ना हो जाये। दौड़ धूप की जिंदगी में कोई अपना हो जो साथ दें। फिर पापा-ममा शहर चल गये मुझे दादी के हवाले करके। मैं सोच रहा था- खुद बूढ़ी औरत जो किसी के सहारे ढूंढ ना चाहिए, वो मेरा सहारा बनने को ठान ली है। पापा-ममा ट्रैन पे चल गये। दादी अपनी आँसू चुपके से पोछ रही थी।

कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं- जैसे मेरे और दादी के। इस रिश्ते को क्या नाम दूँ। बेहद मुश्किल होगा। पर सच्चाई ये है कि हमारा आपसी रिश्ता बहुत गहरा था। दादी मेरी माँ -दोस्त-साथी-टीचर-खिलौना सब थीं। उसके अंदर में ऐसे एक प्रेम को अनुभव कर रहा था, जो मैं बोल नहीं सकता। इसके बाजू या गोद में होते वक्त मुझे लग रहा था की में ऐसे एक छाँव के नीचे हूँ जिसके नीचे सिर्फ शांति और ठंडक ही है। सुकून ही सुकून मिलता है।

सूरज के उजाला बिखरने से पहले दादी उठ जाती थीं। फिर मशीन से बी फुर्ती वो अपना काम करती थी। इस उम्र में इतनी फुर्तीले, ना देखे तो विश्वास नहीं आएगा। घर का काम निपटाने के बाद वो मेरे स्कूल बैग को सजाते थे। मेरे किताब, पेंसिल,रबर वगैर सही तरह बैग में रखने के बाद मेरे लिए खाना बनती थीं । खाना बनाते समय वो कुछ भजन गाती थीं। उनका सुर इतना सुरीला और मीठा था मैं बस आँख मूंद कर सुन रहा था। खाना इतना खुशबूदार की

नें शेज से छलांग मार कर उसके पास हाज़िर हो जाता था और उसकी नज़र चुरा कर खाना झपट लेने की कोशिश करता था। तो वो हँसकर कहती- नटखट पापा की तरह मुझे उल्लू बनाकर खाना ले जाना चाहता है। पहले जा मुंह हाथ साफ करके नहा धोके भगवान को प्रणाम करके आ, फिर गरमा गरम खाना खायेगा। मैं दादी की गले में झूल जाता था। दादी मुझे तैयार कर साथ में स्कूल ले कर चलती थीं। मुझे मास्टर जी के हवाले करके वो मंदिर जाया करती थीं। वहां से लौटकर वो मुंह पे पानी लेते थे। भगवान के ऊपर उनका अटल विश्वास मेरे समझ से बाहर था। कुछ भी हो उनके मुंह में प्रार्थना और एक बात- करनेवाला वो। रखेगा तो वो, मारेगा तो वो । फिर स्कूल छुट्टी के समय वो गेट के बाहर खड़े रहती थीं। मैं आते ही उनका हाथ पकड़ वापिस घर लौटते थे। उस वक्त और सुबह आते वक्त दादी कुछ रोटी के टुकड़े साथ में लाया करते थे जो आते-जाते वक्त आवारा कुत्तों को खिलाते हैं। वे कुत्ते भी आगे पीछे ब्रिगेड की तरह दौड़ते थे। कुछ लोग दादी को कुत्तों को ममी जा रही है कहकर उसे चिढ़ाते थे। मुझे बहुत गुस्सा आता था। पर दादी हँस देती। पशु और चिड़ियों से भी दादी की बहुल लगाव था।

फिर शाम को वो मेरी मास्टर बन जाती थीं। खुद पढ़ी लिखी नहीं, पर उनके अंदर जो विश्वास था और सुनकर समझ लेने की गजब की शक्ति थी उसका मैं कायल था। दादी के पास पढ़ते वक्त मुझे महसूस होता जैसे में सबकुछ आराम से समझ जाता हूँ । कुछ समझ से बाहर है तो दादी को देखते ही सब हाल हो जाता था। सच कहूं तो दादी मेरे अंदर की प्रेरणा थे। पढ़ाई के बाद खाकर सोने के लिए चलते थे। दादी बहुत साड़ी कहानियां सुनाती थीं। राजरानी,परियों, भगवान, रामायण, महाभरत, इतिहास, वीर गाथा सबकुछ होता था उनकी कहानी में। वो कहानी मेरे अंदर ऐसे समा गये थे की सपने में वो सब मेरे साथ बात करते थे। कहानी सुनते सुनते मैं उनके गले पे हाथ डाल कर कब सो जाता था मुझे भी मालूम नहीं।

फिर कुछ सालों के बाद पापा हमे शहर बुला लिये। शहर के संस्कार और रहन सहन बिल्कुल उल्टा था। यहां मेरे और दादी के कमरे अलग हो गए। पढ़ाई, खाना, समय जज़्ब बदल गए। बस यही हमारे बीच एक फासला ला दिया। ऐसा फासला की हम दूर दूर हो गए। आहिस्ता आहिस्ता दादी चुप होती चली गयी। मैं भी स्कूल, स्कूल से कॉलेज-कॉलेज से यूनिवर्सिटी चढ़ते चढ़ते उनसे दूर हो गया। जिस दादी ने मुझे उठाने से लेकर तैयारी, खाना पढ़ाई फिर गोद मे लेकर सुलाया करती थी, आज बहुत कम हमारी भेंट हुआ करती है। पापा अपने व्यापार में डूबे हुए थे। ममी अपने काम और फिर समाज सेवा में उलझ रहा करती थी । ले दे कर एक बूढ़ी औरत जिसे साथी और साथ की बेहद जरुरत थी वो अकेली अपने आप में बंद हो गयी ।

तीन साल यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के बाद मैं घर लौटा वो भी साथ में प्रोफेसर की नौकरी पक्का करके तो पापा-ममा के समेत रिश्तेदार ख़ुशी से झूम उठे। मैं दादी मां को ढूंढती निगाहों में ढूंढने लगा तो ममा इशारे में घर के पीछे है बताया। मैं घर की पीछे आया तो देखा चबूतरे के ऊपर बैठ वो क़बूतरों को खाना खिला रही है और कोई भजन अपने आप गया रही है। मैंने उनके पैर छुए, तो एक ठंडी नज़र में मुझे देखी, फिर हाथ से मेरे माथे को छू कर अपने काम में व्यस्त हो गयी।

लेकिन शाम कुछ और था। कुछ अलग था। दादी ने आडोस -पड़ोस को बुला कर एक पूजा का आयोजन की। खुद दौड़ दौड़ कर सब कि। सब प्रसाद खाकर जाने के बाद बस हम चार लोग रह गये। ममी ने उन्हें बैठने को कहा। पर उन्होंने सुना नहीं। खुद रसोई पे जाकर एक थाली में खीर और पराठा लेकर आई। वही पराठे, वही खीर, जो दादी मुझे गाँव में खिलाया करती थी। मैं बचपन को याद करता हुआ मुंह खोल दिया। दादी ने एक बड़ा टुकड़ा खीर में डाल कर मुझे खिला दिया। खिलाते वक्त उनकी बदन में जो प्यार और अपनापन निकल रहा था, वो मैं बोल नही सकता। ऐसा एक प्रेम शायद यसोदा ने श्रीकृष्ण को भी नहीं दिया होगा।

फिर उनके खाने के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा मेरे सफल हो कर लौटने के ख़ातिर उन्होने व्रत रखा था। आज उपवास करके उसे खत्म कर रही है। मुझे लगा खुद को कुर्बान करके अपने संतान और नाती के लिए सब कुछ न्यौछावर कर दिया है । प्रेम और भक्ति से मेरा सर झुक गया। उन्होंने मुझे उठाकर मेरे सर को चूमा। फिर पानी मांगी। मैं पानी का ग्लास ले कर आया। दादी ने पानी मुझे पिलाने को कहा। मैं कुछ समझा नहीं। उनके कहने के मुताबिक उन्हें पानी पिलाने लगा। दो घूंट के बाद तीसरा घूंट लेते वक्त एक जोर की हिक्का आयी। हम कुछ समझने से पहले मेरे ही दोनों हाथ पर वो झूल गयी। उनके प्राण पखेरू हमेशा के लिए उड गए । सब रोने लगे।

दादी का अंतिम संस्कार करने के बाद हम घर में फिर से अपने रोजमर्रा की जिंदगी में उलझ गये। लेकिन हम सब ने महसूस किया की दादी होते समय जो सुकून -शांति-और अपनापन घर में था अब कहीं नजर नहीं आते हैं। पापा मायूस हो कर बोले मैं अनाथ हो गया। मैं बस देख रहा था और सुन रहा था। एक लंबा सांस लेकर मैं अपने कमरे लौट आया। दादी की फोटो मेरे कमरे पे थी। मैं आँसू भरी आँखों में कहा- आज से हम सबके ऊपर जो बरगद की छाँव थी उसे भगवान ने काट दिया। हम अकेले हो गए। सबकुछ समझ लेने से पहले तुझे क्यों तेरे भगवान ले गए ? दादी हँस रही थी।



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