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Laxmi Yadav

Tragedy


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Laxmi Yadav

Tragedy


बोझ

बोझ

2 mins 36 2 mins 36

पूरा गाँव आज बहुत खुश हैं और प्रतिक्षा कर रहा हैं डॉक्टर की टीम का।गाँव मे नया अस्पताल बना हैं ' संजीवनी '। उसी अस्पताल के लिए शहर से डा आ रहे हैं। डॉक्टर किरण तो विदेश से आ रहे हैं। सभी लोगों को डॉक्टर किरण के बारे मे बहुत उत्सुकता थी। स्वागत करने सबसे आगे थे हार लिए गाँव के नवयुवक डा नकुल। लेकिन गाववाले तब आश्चर्य चकित हो गए जब उन्होंने पच्चीस साल की तरुनी डॉक्टर किरण को देखा। खैर, औरते बहुत खुश थी। वे डॉक्टर किरण का बहुत सम्मान करती थी। डॉक्टर नकुल ने गौर किया फुर्सत के क्षणों मे किरण पुराने बरगद के पेड़ के चबूतरे पर अकेले घंटों बैठी रहती।

एक दिन असाध्य रोग से पीड़ित राम प्रसाद को उनके बेटे अस्पताल मे छोड़कर चले गए। ठीक होने पर भी बोझ कहकर ले जाने को तैयार ही नही हुए। किरण ने उनकी रहने की व्यवस्था सरकारी आवास मे ही करवा दी। खुद ही देखभाल करती थी। एक दिन नकुल ने दराज मे एक तस्वीर देखी। जिसमे राम प्रसाद जी अपने दोनों बेटों के साथ थे पर उसमे एक लड़की भी थी। उस लड़की के बारे मे पूछने पर डॉक्टर किरण निस्तेज भाव से बोली वो लड़की मै हूँ। उस वक़्त मैं पिता के लिए बोझ थी इसलिए चंद पैसों के लालच मे मुझे बेच दिया था। बचपन की धुंधली यादों मे सिर्फ बरगद का पेड़ ही नज़र आता था...। पर तक़दीर देखो जिन बेटों को बुढापे का सहारा समझ रहे थे उन्हीं बेटों ने उन्हे आज बोझ समझकर घर से निकाल दिया। 



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