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Bindiyarani Thakur

Classics


4.8  

Bindiyarani Thakur

Classics


बोझ

बोझ

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सुबह के साढ़े पाँच बजे हैं बिना किसी अलार्म के सबितादेवी उठी हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम किया और झाड़ू उठाकर आँगन बुहारने लगी। उनकी उम्र पचहत्तर के करीब होगी, ठीक से झुक भी नहीं पा रही हैं, काम पूरा करने में लगीं हैं, आँगन बहुत बड़ा है, उनके हाथ पाँव और कमरदुःख रहे हैं मगर अब पूरा किए बिना छोड़ भी नहीं सकतीं किसी प्रकार झाड़ू लगाकर चैैन की साँस लेते हुए बैठ जाती है।

मुँह से हाय राम निकल गया । मन ही मन कहती हैं अब  बरतन हो जाएँ फिर आराम से बैठ कर चाय पियूँगी। इतना कहकर कुएँ से पानी निकालती है और बड़़ी कठिनाई से बरतन साफ करती हैं इतना सब समाप्त करने में उन्हें बहुत समय लग जाता है और वह बैैठ कर बहू के इंतजार में लगीं हैं कि कब वह उठ कर आए और उन्हें चाय दे, बहुत देेर के बाद उनकी बहू उठ कर आई चारों तरफ देख कर तसल्ली करने के बाद कहती है अरे माँ आप कब उठीं, मेरी तो नींद ही अभी अभी खुली, आपको कितनी बार कहा है इतनी जल्दी मत उठिए लेकिन आप मेरी सुनती ही कहाँ हैं ? अच्छा ठीक है मैं चाय बना कर अभी लाई।

उनके घर में रोज यही होता है इस उम्र में भी सबिता देेवी को हर रोज इतना काम करने के बाद ही उनकी बहू चाय नाश्ता देती है, अगर किसी रोज यही सब काम बहू को करना पड़ा तो उस दिन घर पर चाय ही नहीं बनती और बहू का मुँह फुलाए रहती है । बेटियां माँ को अपने यहाँ ले जाना चाहती हैं पर वे बेेेटे के मोह में इतना सबकुछ सहकर भी वहीं हैं।  

बेटा कुछ नहीं जानता ऐसी बात भी नहीं पत्नी के आगे तो उसका मुुँह खुल ही नहीं पाता, बेचारी सबिता देवी इस उम्र में भी इतना सह रही हैं।

मैं उनके पड़ोस में रहती हूँ सबिता काकी से जब भी बात होती है वे अपने बेटे बहू की बड़ाई ही करतीं हैं पर सच्चाई मुझे मालूम है। मैं तो कभी कभी ये सोचती हूँ कि अगर किसी दिन उनकी तबियत खराब हो गई तो फिर क्या होगा? आज के  युग में संतान माता पिता को क्यों वह सम्मान नहीं दे रही है ये चिंता का विषय है।


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