Bindiyarani Thakur

Inspirational


4.8  

Bindiyarani Thakur

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अपना घर

अपना घर

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मौसम खराब है, बिजली कड़क रही है साथ ही जोरों की बरसात भी हो रही है, शैलजा एक हाथ में छतरी और कंधे पर बैग लटकाये लगभग दौड़ती सी चली जा रही है,बारिश इतनी तेज है कि उसके कपड़े भी छतरी के बाबजूद बुरी तरह से भीग चुके हैं। भीगते हुए वह अपने घर पहुँच ही जाती है। ताला खोलकर घर के अंदर प्रवेश करती है, उसकी भाग दौड़ को विराम मिल गया है। अब वह आराम से बाथरूम जाकर नहा-धोकर तरोताज़ा हो जाती है, ऑफ़िस की थकान भी उतर गयी।

अचानक से मन में विचार आया,"काश अभी कोई एक कप गर्मागर्म अदरक इलाइची वाली चाय पिला देता तो मज़ा आ जाता, साथ ही प्याज वाले पकौड़े ,आ, हा, हा, क्या बात है"! 

काश माँ यहाँ होती, मन में सीधे माँ का ही ख्याल आता है, पर माँ यहाँ कहाँ होंगी, वह तो अपने घर में हैं (मतलब शैलजा के पिता के घर) ।उसने लगे हाथ प्याज काट लिए, बेसन का घोल भी तैयार कर लिया और चाय भी बनने के लिए गैस पर रख दी।अब पकौड़े तलते हुए फिर से विचार मग्न हो रही है। 

अकेले रहना उसे भी कहाँ अच्छा लगता है लेकिन इस नौकरी के कारण दूसरे शहर में रहना मजबूरी ही है कभी-कभी मन उकता जाता है तो चली जाती है माँ-पापा से मिलने, पर रहना तो यहीं है ना।

कितनी बार माँ से कहती है कि यहीं आकर उसके साथ ही रहें लेकिन वो अपने घर के मोह से जुड़ी हैं,दो दिन होते ही वापस लौटने की बात करने लगती हैं। 

पकौड़े तले जा चुके हैं, चाय छानकर वह खिड़की के पास आ जाती है, तभी साहिल का फोन आ गया, वह कुछ देर बात करके फोन बंद कर रख देती है, साहिल उसका पति है, वह भी कभी-कभी छुट्टी लेकर आ जाता है तो समय अच्छा गुजर जाता है।

कई बार वह ज़िन्दगी के इस दिनचर्या से उब कर नौकरी छोड़ कर पति के संग ही रहने की बात भी सोचती है फिर हमेशा के लिए घर में कैद रहने का ख्याल भी उसे डरा जाता है। 

वैसे भी वह आरंभ से ही अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी और बचपन से ही मेहनती रही है, इस नौकरी के कारण जितना मान- सम्मान उसे मिला है ये सब खोना मूर्खता की बात होगी और साथ ही घर भी तो उसके स्वयं का है, घर के बाहर उसका नाम भी तो लिखा है, श्रीमती शैलजा मिश्रा। पिता या पति के घर पर ये नाम शायद ही वो लिखवाएँ।

बचपन में झगड़े के वक्त कितनी बार पिताजी को माँ से कहते सुना है जा अपने घर, लेकिन शैलजा से ये शब्द कभी भी कोई नहीं कहेगा। उसे इस छोटे से घर से बहुत प्यार है,बड़े ही प्यार से वह अपने घर को निहारती है, यही घर उसकी दुनिया है जिसे अपने परिश्रम के बलबूते पाया है ,जिसे आकर रहना है रहे लेकिन वह खुद कहीं भी नहीं जाएगी यह घर और नौकरी उसकी पहचान है और हर हाल में खुशी खुशी अपने घर में रहेगी !

शैलजा मन में विचारों के उथल-पुथल को झटकती हुई, आराम से अपने बिस्तर में सो जाती है।आने वाला कल यकीनन अच्छा होगा।



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