" बिन फेरे हम तेरे "
" बिन फेरे हम तेरे "
अस्पताल के बेड पर आखरी कुछ सांसों का इंतजार करता आलोक अपने जीवन के उन पलों को याद कर रहा था जो उसे कुछ क्षणों के लिए सुकून दे जाती थी । जिंदगी और मौत से जंग लड़ता आलोक कैंसर के अंतिम स्टेज पर आ चुका था । मां बाप को बचपन में खोने के बाद उसकी एक मात्र दोस्त थी तो सिर्फ एक जो उसे दिलों जान से चाहती थी.. वो थी उसकी " मीरा ".........!!
रॉन्ग फोन कॉल के माध्यम से खामोशी से शुरू हुआ प्यार आज शायद सदा के लिए खामोशी में दफन होने वाला था क्योंकि मीरा के माता पिता कभी नही चाहते थे आलोक को क्योंकि वो अनाथ , साधारण नौकरीपेशा करने वाला एक मामूली रहन सहन वाला इंसान था , इसलिए कल उसकी शादी किसी एनआरएआई के साथ हो रही थी । जो उसे सदा के लिए इस जमीं से और आलोक से दूर ले जाने वाला था । एक नई दुनिया में जहां वो और मीरा ही थी ।
शायद ये भगवान की ही मर्जी थी इसलिए आलोक इस दुनिया से ही जा रहा था पर इनके खामोश दिलों की धड़कन सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे के लिए ही धड़कती थी जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता था । अस्पताल की बेड पर अर्धमृताशन्न की अवस्था में पड़ा आलोक की जुबां पर एक ही नाम था " मीरा " । सिर्फ एक आखरी बार उससे मिलना चाहता था ।
उसे छू कर महसूस करना चाहता था पर बेबसी देखिए ना तो आलोक उसके पास जा सकता था और ना मीरा आ सकती थी इसलिए तो एक आखिरी बार फोन की घंटी बजी और आलोक के दिल की धड़कन जोर जोर से धड़कने लगी । शरीर से निर्बल आलोक मोबाइल को अपने कांपती हाथों से उठाता है और आवाज में थोड़ी ताकत भरकर कहता है " हैलो मीरा........मीरा......?"
आलोक मीरा मीरा आवाज लगा रहा था और मीरा मौन होकर उसे सुन रही थी.....!! कुछ पल यूं ही दोनों तरफ खामोशी छाई रही सिर्फ सांसों की हलचल सुनाई दे रही थी एक दूसरे को.....!!
फिर आलोक अपनी आवाज में दम भरते हुए कहता है....."क्या आज भी बस खामोशी से सुनती रहोगी जैसा पहली दफा तुम मुझे सुन रही थी या आज आखिरी बार जाने से पहले कुछ कहोगी.....!! मीरा तुम सुन रही हो ना......"
मीरा की सिर्फ हूं.......की आवाज आती है........।
फिर आलोक अपने दिल की बात मीरा के सामने रखता है......"मीरा आज हम दोनों की विदाई हो रही है तो भी तुम कुछ नहीं कहोगी । देखो कल तुम्हारी भी विदाई हैं और हमारे प्यार की भी विदाई हैं तो भी कुछ नही बोलोगी....!!"
खुद की लाचारी और महबूबा की जुदाई में आलोक की आंखों से सहस्र मोती बहने लगे......!! और कुछ पल के लिए फिर से शांति छा जाती है ।
कुछ पल आलोक की आवाज न सुनकर कर मीरा जुदाई की दर्द से कहराती हुई कहती है " आलोक आज मैं सिर्फ और सिर्फ तुम्हें महसूस करना चाहती हूं । ये जो कुछ मिनटों का पल हैं उसे मैं अपने दामन में समेट लेना चाहती हूं । तुम्हारी लफ्जों में सिर्फ और सिर्फ मेरा ही नाम सुनना चाहती हूं.......तुम कहते रहो आलोक....भगवान के लिए आज चुप ना होना नही तो मैं जीते जी मर जाऊंगी......
हम दूर भले हैं एक दूसरे से पर दिल तो एक हैं जो धड़कती है एक साथ......!!"
"मैं ये शादी नही करना चाहती आलोक...। तुम सिर्फ एक बार कह दो " आ जाओ मेरे पास..... मैं भागकर आ जाऊंगी आलोक.....प्लीज एक बार कह दो आलोक.....! मैं तुम्हारी बिनसुहागन विधवा बनने को भी तैयार हूं आलोक । जितने दिन भी तुम्हारे पास हैं मैं उसी पल को समेट लूंगी अपने पूरे जीवन के लिए आलोक पर मैं तुम्हारी बनना चाहूंगी......".कहते कहते मीरा बेसुध होने लगती है । उसके होठ कांपने लगते है । आवाज की घिग्गी बंध जाती है ।
जिसे सुनकर आलोक भी रो देता है फिर खुद को संभालते हुए कहता है " ऐसे कैसे मैं तुम्हे मौत के हाथों बांध दूं मीरा "? मैं इतना खुदगर्ज नही जो अपने प्रेम की खातिर तुम्हारी जिंदगी दांव पर लगा दूं । मैं आज हूं पर कल नही रहूंगा मीरा और फिर इतनी बड़ी दुनिया में मैं अकेले कैसे छोड़ सकता हूं । नही मीरा मैं नहीं कर सकता ऐसा...... मैं तो मर ही रहा हूं पर तुम्हें तिल तिल कर मेरे साथ मरते नहीं देख सकता मीरा....... नहीं देख सकता.......!!"
"ठीक है आलोक यदि तुम्हें यही मंजूर है तो यही सही । पर तुम भी सुन लो आलोक भले ही मेरी शादी किसी अजनवी के साथ हो रही है पर प्यार तो मैं आजीवन तुमसे ही करूंगी । एनआरआई दूल्हा चुनकर मेरे पापा को अपने निर्णय पर भले ही गर्व हो की उन्होंने मुझे तुमसे दूर करने में कामयाब हो गए पर मैं इस जन्म क्या....? जन्म जन्म के लिए तुम्हारी हूं आलोक । तुमसे मुझे कोई अलग नहीं कर सकता यहां तक कि ऊपरवाला भी नहीं.....!!"
"ऊपरवाला तो हमें अलग करने की तैयारी भी कर चुका है मीरा"........कहते कहते आलोक की सांसें उखड़ने लगती है । उसकी धड़कने तेज हो जाती है.....फिर भी वो तकिए के सहारे मोबाइल कान के पास रख मीरा की आवाज सुन रहा था और मीरा आलोक की उखरी सांसों को सुन बैचेन हो रही थी ।
"तुम्हें कसम है आलोक तुम मुझे अकेले छोड़कर ऐसे नही जा सकते.....।। तुम्हें मेरी खातिर जीना होगा । मौत को हराकर आना होगा आलोक......"मीरा की आंसुओं की धार और नाक की सुरसुराहट आलोक को लाचार कर रही थी । वो चाह कर भी कुछ बोल नहीं पा रहा था बस मीरा की सांसों की हलचल सुन पा रहा था । मीरा भी कुछ पल आलोक की उखरती सांसों को महसूस करती है और फिर सब शांत हो जाता है । बिलकुल शांत....आलोक की सांसें बंद हो चुकी थी । आलोक अपने प्राण त्याग चुका था ।
खामोशी ने मीरा की सांसों को भी अपना शिकार बना लिया था । मीरा भी खड़े खड़े गिर जाती है और उसके प्राण बेरुख हो जाते है । दोनों की आंखें खुली की खुली रह जाती है शायद एक दूसरे को देखने की चाह बाकी रह गई थी । दोनों के अटूट प्रेम ने भगवान के आसन को भी हिला दिया था तभी तो दो जिस्म होते हुए भी एक जान थे । भगवान भी उसे अलग नहीं कर पाएं और दोनों एक साथ दुनिया को अलविदा कह दिया था ।

