बीवी के अरमान
बीवी के अरमान
शालू...... ओ........शालू ....... कहां मर गई।
जी साहब.... आई... अभी..... आई
क्या हुआ साहब आपने .....मुझे .....बुलाया... शालू ने कहा।
ये क्या है ....शालू ? ये कैसा खाना है? आज तक तूने मुझे कभी अच्छा खाना तक न खिलाया।
अब क्या कमी रह गई साहब .......मंद आवाज में शालू ने पूछा।
क्या कमी रह गई ? अरे तुम्हारे खाने में अच्छा होता ही क्या है... जो कमियां गिनाऊं। देखो .....देखो ...इस दाल को इसमें... नमक.. कम डाला है और इस सब्जी में ....इसमें नमक ...ज्यादा कर दिया है। क्या खाऊं ? कैसे पेट भरूं ? आज तक कभी तुमसे कोई काम ठीक ढंग से नहीं हो पाया।
अजी साहब.... मेरे प्यारे साहब.... बस इतनी सी बात... लाओ ...अपने हाथों से मैं आपको खाना खिला दूं। इस सब्जी को इस दाल में साथ मिलाकर के खिलाती हूं ...नमक बिल्कुल सही हो जाएगा। यह लो मेरे प्यारे साहब ...लो इस कौर को खाकर देखो ....फिर बताना मुझे कि ....नमक किस में ज्यादा और किस में कम है।.....शालू ने अपने हाथ से एक कौर बनाकर साहब को खिलाने के लिए जैसे ही अपना हाथ आगे बढ़ाया साहब ने उसका हाथ झटक दिया।
क्या ....खाऊं? मैं कोई दूध पीता बच्चा हूं जो तुम्हारे हाथों से खाना खाउं। ...तुम क्या किचन क्वीन हो ...जो तुम्हारी उंगलियां चाटू। आज तक तुम मुझे कोई खुशी ना दे सकी। मैं तो उस घड़ी को कोसता हूं जब मैंने तुमसे शादी की। साहब ने खाने की थाली को अपने आगे से हटाया और बड़बड़ाते हुए अपने ऑफिस की ओर निकल गए।
बेचारी शालू मन ही मन रो कर रह गई। अपने हाथ में रोटी का कौर और बिखरी थाली को एकटक बैठे देखती रही। पता नहीं मुझे क्या हो गया है? क्यों इनको खुशियां नहीं दे पाती ? लेकिन मैं करूं भी तो क्या ? अब तो मेरी किस्मत में सिर्फ साहब के ताने ही रह गए हैं। मैं कितना भी अच्छा करूं ....यह हमेशा मेरी कमी निकाल ही लेते हैं। लेकिन क्या सारी कमी मुझमें ही है साहब। कहते हैं .....मैं कभी इनको खुशियां ना दे पाई.... पर मैं क्या करूं साहब, डॉक्टर ने मेरी सारी रिपोर्ट नॉर्मल बताइ। कमी तो आप में थी। लेकिन मैंने तो कभी आपसे शिकायत नहीं की। घर में कोई बच्चा ना हुआ तो क्या ? ...मैं आपको छोड़ दूं ...भला मैं ऐसा कैसे कर सकती हूं। लोग सात जन्म के साथ की बात करते हैं लेकिन मैं...... मैं ...एक ही जन्म में आपका साथ छोड़ दूं। सिर्फ इसलिए कि आप में कमी है! एक बच्चे के लिए मन तो मेरा भी बहुत करता है साहब , ...लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण तो मेरे लिए आप हैं। मैं आपका मन दुखाना नहीं चाहती साहब। भले ही आप अपनी कमी को छिपाने के लिए मुझे ठुकराते रहे। मैं जानती हूं ...आप अपनी कमी छुपाने के लिए, उससे मेरा ध्यान हटाने के लिए , मेरे साथ ऐसा व्यवहार करते हैं।... पर साहब आप मुझे कभी नहीं समझ पाएंगे.... कभी नहीं। हम औरतें ...अपने अरमानों को अपने आदमी के लिए मार लेती हैं, और मर्द अपनी मर्दानगी के लिए हमें मरता हुआ भी नहीं देखना चाहता।
अचानक शालू का दिवास्वप्न टूटा! उसने थाली को उठाया अपने हाथ धोए और फर्श को साफ कर दिया। वह सोचने लगी..... हम औरतों की तो किस्मत भगवान ने उसी दिन ही बिगाड़ दी थी ..जब हमें अपने मां बाप के घर लड़की के रूप में पैदा किया था। हम औरतों को तो मां-बाप के घर में ही घुट घुट कर अपने अरमान को मारना सिखा दिया जाता है , तो ससुराल और समाज से क्या शिकवा ? हम तो पैदा ही शोषण के लिए होती हैं ? जहां ...जिसके साथ.... रहे शोषण ही होगा ? दो-चार दिन... झूठा प्रेम और फिर छल, नफरत , गाली। इसमें आपका कोई दोष नहीं है साहब.... यह तो जमाने का दस्तूर है! औरतें... चरणों की दासी.. होती है ना साहब ? लेकिन आप लोग भूल जाते हैं कि पैरों में पहनने वाली जूती जब टाइट होती है तो पैरों में काटकर छाला बना देती है और अपार दर्द पैदा कर देती है। यहां तक कि अच्छा भला आदमी काटने वाली नई जूती के साथ ठीक से चल भी नहीं पाता। उसे सही करने के लिए कोई लोहे की कील या कठोर टुकड़ों की नहीं नरम रुई की जरूरत होती है। पता नहीं.... यह समाज कब समझेगा कि निर्जीव जूता को जब नरम रूई की जरूरत होती है तब वह पैरों को सुख देती है। तो हम जैसी जीवित स्त्रियों को.... आपके नरम स्पर्श और प्रेम की जरूरत होती है। तभी हम आपको सुख दे पाएंगे आप पर निछावर हो पाएंगे।
