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Ajeet Kumar

Horror


3.8  

Ajeet Kumar

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भालुमुंह- एक रोमांचक यात्रा

भालुमुंह- एक रोमांचक यात्रा

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मेरा मुँह अब घाव की तरह रिस रहा था । लोगो ने सही कहा था मेरा मुँह भालू जैसा हो जायेगा । भालुमुंह । शुरू में तो मुझे विश्वास नहीं हुआ था, पर अब कोई शक न रह गया था । मैं आईने में अपना मुँह देख रहा था । जबड़े से लेकर नाक के ऊपरी हिस्से का काला हिस्सा अब ऊपर की तरफ निकल रहा था । इस घाव से कोई द्रव्य तो नहीं निकलता पर ऐसे लगता जैसे मेरा मुँह गल रहा हो । दोनों गाले काफी उभर आयी थी । कान बड़े और खड़े लगते थे । मुँह अब और सख्त हो गया था । दांते तो जैसे लगती मुझे राक्षस दांत मिल गया हो । मैं कठोर चीजे आराम से चबा डालता ।

मुझे देखता तो कोई भी अनजान आदमी डर जाता । बच्चे मुझ से दूर भागते । बड़े भी मुझे देखते तो आशंकित हो उठते । अपने गाँव के साथ साथ मैं दूसरे गाँवों में चर्चा का विषय बन गया था । वो भी आंतकित थे । मुझे गांव से बाहर जाने से मुखिया से सर्वसम्मति से मना कर दिया था । भालुमुंह वाला आदमी मैं इलाके में पहला था । यूँ तो कई साल पहले कई सारे भालुमुँह हुए थे थे पर इधर के ५० सालो में मैं ही एक उदाहरण था ।

मेरी पत्नी सोनिया, जब मैं दर्द से चिल्लाने लगता तो वो वैद्य का दिया दवाई मेरे मुँह में लिप देती । मुझे क्षणिक ही सही पर आराम मिल जाता । रात में और हालत खराब हो जाती । इसलिए मेरे आसपास के कई लोग अपने घरो में न सो कर दूर पड़ोसियों के यहां सोने चले जाते थे । सोनिया शायद खुद को कोसती पर मेरे सामने सामान्य बनने की कोशिश करती । मेरा मन करता मैं कहीं भाग जाऊ पर मेरे जाते ही लोग सोनिया को लोग लूट लेते । बला की सुंदर थी सोनिया । जब मैंने उसे लाया था तो गाँव वाले जबरदस्ती उसे बाँटने के लिए मुझे धमकी देने लगे । मुखिया सबसे लालची था । उसने मुझे कई बार घुस देने की कोशिश करने लगे , फिर गाँव से बाहर करने की भी धमकी दी उसने , पर मैं भी अड़ गया था । मैं उसे कहीं नहीं जाने देता। मेरे जाते ही उसकी आबरू , ये घर सब लूट जाता ।

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पांच साल पहले की बात है । मैं नदी के उस पार वाली मैदान में दोस्तों के साथ क्रिकेट खेल रहा था । मैदान चारो तरफ से ऊँचे झाऊ ( एक प्रकार के पेड़ ) से घिरा था । मैंने एक जोर से शॉट मारा । सब लोगो को पता था गेंद अब मिलने वाला नहीं । तो वो लोग चले गए । मैंने और मेरा दोस्त विनय मैदान में ही रह गए । हम गेंद खोजने की कोशिश कर रहे थे । आधा घंटे के बाद भी वो हार मानकर बोला - 'यार अब नहीं मिलने वाला देख शाम होने वाला है । ' ।

' हाँ तू जा ! माँ खोज रही होगी तुम्हे , मेरा क्या है कोई खोजेगा थोड़ेगा मुझे '

' पागल ! चल न नदी का पूल गाँव वाले उठा देंगे फिर क्या करेगा '

' अरे तू जा न यार ! मैं आता हूँ पीछे से ' । २० साल का था तब मैं । जवानी के जोश में गुस्सा मेरी नाक पर रहता था ।

विनय चला गया । मैंने गेंद खोजने की व्यर्थ कोशिश की पर नहीं मिली । अब अँधेरा होने को था । मैं भी वापस चलने वाला था । मेरी अपनी मोटरसाइकिल थी । मैंने झाड़ियों के बीच से मोटरसाइकिल तेजी से भगाने लगा ।हवा सर सर कानो पड़ रही थी । 

झाड़ियां रह रह कर मुंह पर लगती थी । इधर डाकुओं का प्रकोप बढ़ गया था । रात में कभी भी गाँव वाले चैन से सो नहीं पाते थे । मुझे डाकुओ से डर नहीं था । बल्कि सियारो से डर था । दियारे में कभी कभी सियार झुण्ड में आकर लोगो का शिकार करते थे । कुछ महीने पहले ही मंगरु का बेटा खेत देखने आया था , फिर घर वापस नहीं आया । रात में उनकी हुंकार के बीच डाकुओ का डर गाँव के घुप्प अँधेरे में भय का ऐसा वातावरण कर देता कि लोग डर से पेशाब करने के लिए भी किसी को साथ ही लेकर निकलते ।

  मैं नदी तक पहुंचा तो वही हुआ जिसका डर था । गाँव वालो ने पूल हटा दिया था । लकड़ी का कच्चा पूल था लोगो ने एक हिस्से को लोहे की जंजीरो से बांध दिया । वो जंजीर खींचते तो पूल नदी में समाहित हो जाती । फिर सुबह लोग बड़ी मशक्त के बाद ही उसे उठा पाते । पर अब क्या । सबकुछ व्यर्थ था । विनय ने जरूर मेरे बारे में बोला होगा पर उनका डर उन्हें होश में रहने दे तब तो ।

मैंने सुना था नदी के इस पर कुछ आदिवासी आये थे । २ दर्जन लोग । कैसे निडर लोग थे क्या उन्हें नहीं पता पूरा इलाका डाकुओ के चंगुल में कैद था । पर आदिवासियों के बारे में कैसी कैसी बाते लोग करते थे । आदिवासियों का समूह आदमी खा जाते था । उनकी बाणों में इतना विष होता था कि किसी को लग जाता तो आदमी वही दम तोड़ देता ।

 दूसरा पूल ५० किलोमीटर दूर था । आने जाने में १०० किलोमीटर लगता । डाकुओ का डर अलग से था । मैंने रात उनके साथ ही बिताने की सोचने लगा । मैंने मोटरसाइकिल उधर ही घुमा ली । कोई ५ किलोमीटर पूर्व उनकी बस्ती था । पास गया तो देखा उन्होंने झाऊ और बबूल के पेड़ के बिच में एक बस्ती बना रखी थी । मोटरसाइकिल की आवाज सुनते ही वो मेरे चारो तरफ घिर गए । मै उन्हें कोई संकेत नहीं देने वाला था इसलिए इत्मीनान से मोटरसाइकिल लगाई और नदी की तरफ बढ़ गया । उन्होंने नदी के तटीय इलाके को साफ़ करके रहने लायक बना दिया था । शायद दूसरा समूह आने वाला था । उधर भी कुछ आदिवासी लेते और बैठे थे । मुझे देखते ही वो हलचल करने लगे । मैं भी हठा कठा नौजवान था । गर्म खून था । इन आदिवासियों से तो मैं डरने से रहा । मैं एक जगह बैठ गया । चांदनी रात थी । बालू काफी ठंडी थी तो मैंने मैंने सर का गमछा बिछा दिया और बांहो को तकिया बना कर लेट गया । आदिवासी भी अब शांत हो गए थे । मेरी आंखें लग गयी ।

किसी की बेचैन आवाज ने मुझे जगाया । एक परी सी सुंदर लड़की मेरे ठीक ऊपर खड़ी थी । रात के उस चांदनी में उसकी आँखें चमक रही थी । कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा था । इधर ऐसे सपने मुझे खूब आते थे । कारण था मेरी रखैल सोनम जिसे मैंने मेले से चुरा कर लाया था वो भाग गयी थी । उसके जाने से मेरी राते यूँ ही कटती थी । गाँव की लड़कियों पर मुँह मारने की कोशिश करता पर बेकार । कोई हाथ नहीं लगती  |

मेरी नींद तब खुली जब एक लड़की अब जोर जोर से मेरा हाथ खिंच रही थी । मैं उठ कर बैठ गया ।

' क्या बात है ' मैंने झुंझलाते हुए कहा । उसने अपनी व्यथा सुनाई । वो १०० किलोमीटर दूर किसी शहर से थी । रात में किसी काम से बाहर निकली थी, तो आदिवासियों का ये झुण्ड सड़क से गुजर रहा था । वो उत्सुकतावश उनके पास जाकर उन्हें देखने लगी । तभी एक आदिवासी से उसका मुँह बंदकर उसके माथे पर जोर से प्रहार किया । जब उसे होश आया तो वो यहां थी । तब से आदिवासी उसके साथ कुछ भी करता था । मुझसे उस अनजान आदिवासी पर गुस्सा आ रहा था । इतनी सुंदर लड़की प्यार करने लायक थी न कि जोर जबरदस्ती करने लायक । मैंने उसे शांत रहने के लिए कहा । रात के ११ बज रहे होंगे । मोटरसाइकिल से भागने का मतलब था सब लोग जाग जाते । पैदल भागकर डाकुओ या सियारो के हिस्से में आते । मैंने कई साल नदी में तैराकी की थी पर इस समय नदी अपने पूरे उफान में थी । गाँव के अच्छे अच्छे तैराको का भी कलेजा नहीं होता कि वो बिना सहारे नदी लाँघ पाते ।

तभी मेरी निगाहें नदी में तैरती एक वस्तु पर पड़ी । कहीं वो बड़ी टूयब तो नहीं । जिससे कई चरवाहे नदी पार करते और घास लादकर वापस ले जाते थे | कभी कभी ट्यूब दवाब में फट जाती तो कई नौसिखिये चरवाहे या तो डूब जाते या फिर दूसरी ट्यूब के सहारे किनारे तय करते । मैंने देर न करते हुए नदी की तरफ बढ़ा । लड़की को लगा होगा मैंने उसे छोड़कर भाग रहा था । पर उस लड़की को छोड़कर भला कौन भागेगा ।

मैं नदी में था । पानी अब कमर तक थी । धीरे धीरे ट्यूब मेरे पास आ रही थी । मैंने पीछे मुड़कर देखा लड़की अंचम्भित खड़ी थी । उसे अभी भी नहीं पता था मैं क्या कर रहा था । ट्यूब अब इतने पास थी कि मैं झपट कर उसे पकड़ना चाहता था । मेरे पानी में कदम बढ़ाया और अचानक मेरा पाँव सतज पर लगी ही नहीं । मैं निचे जाने लगा । मैं समझ गया क्या माजरा था । ये ढलान था । समतल सतह के बाद । मैंने एक हाथ मारा और नदी ने मुझे ऊपर फेंक दिया । ट्यूब अब हाथ में थी । पर ट्यूब कई जगहों से फटी थी । कुछ छेद होते तो मैं इस विशाल नदी को भी लड़की को लेकर पार कर जाता । पर अभी ऐसा सोचना भी बेकार था । मैं शायद उस पर चला भी जाऊ किसी तरह पर लड़की तो डूब ही जाती । साथ में क्या पता मुझे भी डूबा देती ।

पर इसी बीच अनहोनी होनी थी । लड़की को लगा मैं डूब गयी थी और वो जोर जोर से चिल्लाने लगी । एक आदिवासी अब लड़की के पास आ रहा था । लड़की मेरी तरफ नदी में भाग रही थी । क्या दैत्य जैसा शरीर था आदिवासी का । मुझे पहली बार डर लगा । इस डर ने मुझे नदी के किनारे पड़े एक बड़े पत्थर को उठाने पर मजबूर कर दिया । लड़की भागकर मेरे सीने से लिपट गयी । आदिवासी ठीक मेरे पास आकर खड़ा हो गया । मै लड़की को पीछे करके उससे लड़ने को तैयार हुआ । गाँव के अखाड़े से मैंने कई पैतरे सिख लिए थे । पर भीमकाय शरीर लिए इस दैत्य को मैं कैसा हरा पाता । वो मेरी तरफ झपटा और मेरे सर पर एक मुक्का जड़ दिया । मेरे आँखों के सामने बेहोशी छाने लगी । वो लड़की की तरफ बढ़ा और उसे एक जोरदार तमाचा जड़ दिया । जान बचाने का एक ही उपाय था और मैंने वही किया । मैंने पीछे से उस नकुली पत्थर से पूरी ताकत से उसपे प्रहार किया । मेरा निशाना बिलकुल सही पड़ा । उसकी खोपड़ी को छेदती वो पत्थर उसके मस्तिष्क में समा गयी । वो वही ढेर हो गया । बस्ती से अभी तक कोई शोर नहीं था । ये राहत की बात थी । पर परेशानी अभी ख़त्म नहीं हुई थी । एक और आदिवासी हमारी तरफ बढ़ रहा था । काफी पास आया तो शक्ल से अंदाजा लगा वो मरे हुए आदिवासी का भाई होगा । मेरे दिमाग में उसे ढेर करने का उपाय आ चूका था । इसलिए तो मैं अपने गाँव में मशहूर था । संकट के समय में मैं भक से उपाय ढूंढ लेता था । मैंने लड़की को आगे किया और उसके कानो में कुछ बोला । वो दौड़ी और उस आदिवासी से जाकर चिपक गयी । ये आदिवासी के लिए अप्रत्याशित था । मैंने उसे सोचने का मौका न देते हुए बिजली की गति से दौड़ते हुए उसके दोनों पैर पकड़कर बालू में खींच दिए । वो जमीन पर था । मैंने लड़की की ओढ़नी से उसका मुँह बांध दिया । वो हाथ पैर फेंक रहा था पर अफ़सोस वो मुझसे ज्यादा ताकतवर नहीं था । मैंने उसका हाथ पकड़कर उसे उठा लिया और लड़की को इशारा किया कि वो उसका पैर पकड़ ले । बस्ती और तट के बीच में एक बड़ा सा पत्थर था । जो कई तरह से सजाया हुआ था । वो जगह बस्ती से सुरक्षित दुरी पर भी था । हम उसे घसीटते वही ले गए । वही मैंने उसे उसी पत्थर पर लिटा दिया । अब भी वो जोर जोर से हाथ पैर चला रहा था । हमने उसे फिर से उठाया । उस बड़ी पत्थर के दोनों तरफ छोटे पत्थरो की सीढिया थी । हमने उसे कंधे तक उठाकर बड़े पत्थर पर इस तरह से छोड़ा कि उसका सर पत्थर के कोण पर पड़े । बस एक तेज आवाज हुई और उसका सर फट गया । उसके सर फटने की आवाज सियारो के हूँ हूँ में सुरक्षित छिप गयी थी उसके सर से तेज खून फेंकने लगा और पर अब वो होश में कहाँ था । उसने कुछ देर में वही दम तोड़ दिया ।

अब वहां रुकना सुरक्षित नहीं था । मोटरसाइकिल हमसे कुछ ही दूर पर थी । मैं लड़की का हाथ पकड़कर उधर बढ़ने लगा । तभी मुझे पैरो की एक आवाज सुनाई पड़ी । मैं जैसे ही मुड़ा मेरे चेहरे को निशाना करते हुए उसने मेरे ऊपर कुछ फेंका । वो १२ साल के उम्र का एक बच्चा था । उसकी भी शक्ल मरे हुए आदिवासी से हूबहू मिलती थी । उसने कोई कोई तरल चीज फेंकी थी । पड़ते ही मुझे चेहरे पर गजब की ठंठक महसूस हुई । मुझे डर और पसीने के बीच भी उसकी करनी पर हंसी आ गयी । वह फिर बस्ती की तरफ भागने लगा । मैं उसके पीछे दौड़ने लगा । बस्ती से ठीक पीछे मैंने उसे पकड़ लिया । उसे फिर खींचते हुए मोटरसाइकिल तक लाया । लड़की के चेहरे पर छिपे डर में साफ़ साफ़ लिखा था कि मैं उसको भी मार दूंगा । पर उसे ये सबूत देना चाहता था कि मेरे सीने में भी दिल था ! मैंने अपने शर्ट से उसका हाथ पैर कसकर उसे वहीं छोड़ दिया ।

हम फिर मोटरसाइकिल लेकर कुछ दूर तक पैदल ही चके । हाँ वो लड़की भी बिना कहे मेरे पीछे पीछे ही आ रही थी । कहाँ जाती बेचारी ! जब हम बस्ती से कुछ दूर हुए तो हम मोटरसाइकिल पर बैठ गए । मैंने फिर इतनी तेजी से मोटरसाइकिल भगाई कि न कोई सियार दिखा और न ही डाकू । सुबह मैं अपने घर पर था । लोग इकठ्टे हुए । मैं सारी रात कहाँ रहा । मैंने कुछ भी नहीं बताया । पर एक बूढ़ा आदमी न कैसे जाने मेरे चेहरे पर फेंके उस बच्चे की तरल चीज को पहचान गया था । 


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