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Kunda Shamkuwar

Abstract Inspirational

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Kunda Shamkuwar

Abstract Inspirational

बगीचा

बगीचा

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आज माली के हाथ की कैंची बड़ी तेजी से चल रही थी।मैं ऑफिस के लिए लेट हो रही थी। जल्दी जल्दी में मैं उसके लिए जरूरी इंस्ट्रक्शन देकर आगे निकल गयी।

शाम को घर आकर देखा तो बगीचे का हुलिया बिलकुल बदला हुआ था।माली ने बड़े ही करीने से और खूबसूरती से सारे पौधों को तराशा था।कल तक जो बगीचा बेतरतीब सा लग रहा था,आज वह बड़ा ही सँवरा सँवरा सा लग रहा था।माली को बुलाकर उसके काम की तारीफ़ करते हुए मैं कहने लगी, "आज तो सारे बगीचे की शक्ल ही बदल दी तुमने।ये लो कुछ रुपये,तुम्हारा इनाम।तुम्हारी तनख्वाह से अलग है, रख लो इन्हे।माली ने बड़े ही सकुचाते हुए रुपये रख लिए।मैंने उसे पूछा, "चाय वगैरह ले ली है न ?" उसने हामी भरी औऱ फिर कहने लगा, "बाकी के काम हो गए है मैडम,अब मैं चलता हूँ।" बगीचे को देखकर मैं अपने आप में ही खुश हो रही थी।  

अचानक उन पेड़ो की तरफ देखते हुए मुझे लगा, की ये पेड़ जो बड़े सँवरे सँवरे से दिख रहे है, एक्चुअली में उदास सी हँसी हँस रहे है।मेरे मन में खयाल आया, माली जो बड़ी सफ़ाई से पेड़ों को अपनी तेज कैंची से तेज हाथों से काट रहा होगा, उस समय उन पेड़ों को कितना दर्द हो रहा होगा।लगा की जैसे सारे पेड़ उदास आँखों से मुझ से सवाल कर रहे है की हमारी कोई ग़लती तो बता दे जिसकी सजा आज हमें मिली है।"

 

मेरे पास पेड़ों के उन मासूम सवाल का कोई जवाब नहीं था।मैं उनसे नज़रे चुरा कर कही और देखने की नाकाम कोशिश करने लगी लेकिन बगीचे में हर तरफ करीने से कटे हुए सजे सँवरे से पेड़ दिखाई दे रहे थे....


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