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anil garg

Crime Thriller

4  

anil garg

Crime Thriller

बदमाश कंपनी-4

बदमाश कंपनी-4

14 mins
358

फूलचंद यादव इस वक़्त उसी मकान का दरवाजा खटखटा रहा था जिस मकान में मस्ती और उसके साथियों ने अपना डेरा जमाया हुआ था। दरवाजा मस्ती ने खोला था क्योंकि इस तक वही होश में था...नशेड़ी गोगी और गंजेडी नाटा कब का अपनी पिनक में लुढ़क चुके थे। दरवाजा खोलते ही मस्ती की नजर पुलिसिये यादव पर पड़ी तो उसने असमंजस से उसकी तरफ देखा।

"साहब कल ही तो अपन कोतवाली में हाजिरी लगा कर आया था...आपको किसी ने बताया नहीं क्या" मस्ती ने उलझन भरें स्वर में यादव को बोला।

"मैं तेरे लिए नही आया...वो चरसी को मेरे पास भेज..साले पर चर्बी कुछ ज्यादा ही चढ़ गई है..अब पुलिसियो की ही जेब पर हाथ साफ करने लगा....वो भी कोतवाली के नए साहब का ही माल उड़ा डाला...निकाल उसे बाहर कहाँ छुपा है वो हरामी" यादव अब तक मस्ती को एकतरफ धकेल कर मकान के अंदर घुस चुका था।

"वो तो अभी तक वापिस नहीं आया साहब...पड़ा होगा कहीं पर चरस के नशे में बेहोश होकर" मस्ती ने यादव के पीछे आते हुए बोला।

"कोई बात नहीं... उसे तो मैं रात भर में ही पाताल से भी ढूंढ निकालूंगा..लेकिन तुम लोग तो किसी नई फिराक में नहीं हो ना...कोई भी हरकत मत करना...नया साहब बहुत कड़क है...इस मकान में भी रहना दुश्वार कर देगा तुम लोगों का" यादव बोलते हुए पूरे मकान में अब तक घूम चुका था। लेकिन चरसी उसे कही नजर नहीं आया था...अलबत्ता नशेड़ी और गंजेडी जरूर दीन दुनिया से बेखबर एक तरफ पड़े हुए मिल गए थे।

"सुन मस्ती..अगर चरसी यहाँ आ जाये तो उसे लेकर कोतवाली आ जाना..उसने हमारे साहब का अस्सी हजार का मोबाइल उड़ाया है...साहब उसे बख्शने के मूड में कतई नहीं है...अगर उसे मोबाइल के साथ लेकर नहीं आया तो पता है ना कि गेहूँ के साथ साथ कभी कभी घुन भी पिस जाता है" यादव ने उसे पुलिसया हूल दी।

"साहब आपने बोल दिया है तो अपन उसे बरोबर लेकर आएगा" मस्ती ने जान छुड़ाने के उद्देश्य से उसे बोला। वैसे भी मस्ती के लिए उस हूल का कोई मतलब नहीं था। पुलिस की हद जहाँ तक थी उन हदों से मस्ती कई बार गुजर चुका था। यादव ने एक बार गहरी नजरो से उसे देखा और फिर मकान से बाहर आ गया। कुछ ही पलों में उस पुलिसिये की बाइक का इंजिन गरजा और धीरे धीरे उस बाइक की आवाज मस्ती के कानों से दूर होती चली गई।

                              ************

यादव कुछ ही आगे गया था कि उसकी बाइक में लगा वायरलेस सेट बज उठा। सेट पर ऑपरेटर सिनेमा रोड पर किसी आदमी के लावरिस हालत में पड़े होने की खबर दे रहा था। यादव ने अब अपनी बाइक को सिनेमा रोड की ओर ही दौड़ा दिया। वो भी चरसी की उम्मीद में एक नजर उस आदमी पर डाल लेना चाहता था। वहां से कोई दस मिनट में यादव सिनेमा रोड पर पहुंच चुका था। इस वक़्त वहां बेहोश पड़े चरसी के आसपास लोगों की भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी। यादव ने जैसे ही अपनी बाइक वहां रोकी तो भीड़ अपने आप वहां से छंटने लगी। पुलिसियो कि वर्दी का डर ही इतना है अपने देश में ...की लोग पुलिस के लफड़ो से दूर रहने में ही भलाई समझते है। बाइक से उतरकर यादव आगे बढ़ा। अब तक चरसी पर उसकी नजर पड़ चुकी थी..और उसकी नौकरी पर छाए संकट के बादल अब उस भीड़ की तरह से ही उसे छटते हुए नजर आने लगे थे। यादव ने उसे हिलाया डुलाया...लेकिन चरसी के ऊपर कोई असर नहीं हुआ।

"साला कहीं हमेशा के लिए तो नहीं लुढ़क गया" ये बोलकर उसने चरसी की नाक के आगे अपने हाथ की हथेली को लगाया। नाक से उसकी सांसों की गर्मी बदस्तूर निकल रही थी। ये देखकर यादव ने राहत की सांस ली। अब उसने खड़े होकर अपने आसपास नजर डाली। उसने सामने से आते हुए एक ऑटो वाले को हाथ दिया। ऑटो वाला मरता क्या न करता वाले अंदाज में रुककर परेशान नजरों से यादव की ओर देखने लगा।

"इसे उठाकर ऑटो में डालो और पास के अस्पताल में लेकर चलो..ये आदमी बेहोश है" यादव ने काफी नम्र स्वर में ऑटो वाले से बोला।

"अरे साहब! पुराना चरसी है ये...सब जानते है इसको...ज्यादा चरस पीकर बेहोश हो गया होगा...पड़ा रहने दो इसे यही पर..सुबह तक खुद होश में आ जायेगा साहब" ऑटो वाला भी चरसी को पहले से ही जानता था।

"मैं भी जानता हूँ ये चरसी है...ज्यादा उपदेश मत दे...इसे डाल और अस्पताल चल..इस वक़्त ये कानून का मुजरिम है...इसलिए कानून का फर्ज है इसकी सेहत की देखभाल करना...सालो इंसानियत नाम की चीज़ नहीं रही तुम ऑटो वालो में" यादव ने उस ऑटो वाले को बुरी तरह से हड़का दिया था। बेचारा मन ही मन कुनमुनाता हुआ चरसी की ओर बढ़ गया।

"अब हाथ तो लगवाओ इस सत्तर किलो के आदमी में ..या अब इसे उठाऊ भी अकेला ही....सारी इंसानियत का ठेका हम ऑटो वालों ने ही लिया हुआ है...कुछ फर्ज पुलिस वालों का भी बनता है साहब" ऑटो वाले ने तपे हुए स्वर में कहा। यादव ने उसे आग्नेय नेत्रों से देखा..फिर उसने आसपास नजर दौड़ाई..लेकिन भीड़ अब तक वहाँ से नौ दो ग्यारह हो चुकी थी। मजबूरी में यादव ने ही ऑटो वाले के साथ मिलकर चरसी को ऑटो में डाला और फिर ऑटो वाले को अस्पताल की तरफ रवाना किया और खुद अपनी बाइक पर उसके पीछे हो लिया।

                             ***********

फरजाना के पांव इस वक़्त जमीन पर नहीं थे..वो अंधेरी गलियों से होते हुए अपनी खोली की तरफ तेजी से बढ़ी जा रही थी। उस गली में भी घनघोर अंधेरा था। तभी दो हाथों ने उसे दबोचा और दूसरे दो हाथों ने उसके पाँव को पकड़ा और उसे लगभग घसीटते हुए एक मकान में लेकर जाने लगे।

"सालो! करने का इतना भूत सवार है तो आराम से ले चलो न ये क्या जानवरों की तरह से घसीट रहे हो" फरजाना आराम से उन दोनों को बोला।

"तू तो साली कोई चालू आइटम लग रही है..कही धंधे से आ रही है क्या" एक बन्दे ने अब उसके पाँव छोड़कर उसे खड़ी करते हुए बोला।

"सालो मैं ही मिली थी क्या तुम लोगों को लूटने के लिये...अपने पराए को तो पहचान लिया करो हरमाइयो" फरजाना अब तक उन दोनों को पहचान चुकी थीं।

"ओए नौशाद ये तो अपनी फरजाना है बे" एक बन्दे ने दूसरे बन्दे को नाम से पुकारा।

"हाँ सुल्तान भाई...साला सारी मेहनत बेकार गई" ये बोलकर वे दोनों फरजाना को छोड़कर एक तरफ खड़े हो गए।

"क्यों बे हरामियों अब इन हरकतों पर उतर आए की राह चलती लड़की पर भी हाथ डालने लगे" फरजाना ने उन दोनों की ओर देखकर कहा।

"अरे यार !दो दिन से बिल्कुल सूखा पड़ा हुआ है...कोई शिकार लपेटे में नहीं आया है...अब तुझे पकड़ा तो अब तेरा क्या अचार डाले...चल अब तू निकल यहां से पहले ही दिमाग का दही हो रखा है" सुल्तान ने खिन्न स्वर में फरजाना को बोला।

"जा रही हूँ ..तुम कंगलों के पास रुककर भी अपने को क्या मिलना है...साला आज अपना भी किस्मत खराब ही है...पहले वो फुकरा चरसी टकराया और अब तुम...या अल्लाह उठा ले इस दुनिया से...अरे मुझे नहीं रे...इन फुकरो और कंगलों को उठा ले" तभी फरजाना ने अपने दोनों हाथ उठाकर फरियाद की।

"भाग साली यहां से..नहीं तो तू ही इस दुनिया से उठ जाएगी" ये बोलकर नौशाद उसकी ओर लपका....लेकिन फरजाना उससे भी तेज रकम थी वो बिजली की गति से वहां से दौड़ पड़ी।

"इस साली धंधे वाली लौंडिया के पास इतना महंगे वाला मोबाइल कहा से आया नौशाद भाई" तभी सुल्तान ने अपनी जेब से फरजाना वाला मोबाइल निकालते हुए बोला।

"औए तूने फरजाना को ही सेन्धी लगा दी...साले सात घर तो डायन भी छोड़ देती है" नौशाद ने सुल्तान को डपटने वाले अंदाज में बोला।

"अरे!जब उसे पकड़ा था...तब कहाँ पता था कि वो फरजाना थी...मैंने तो पकड़ते ही हाथ साफ कर दिया था...लेकिन इसके पास इतना महंगा मोबाइल...इसने किसकी वाट लगा दी यार" सुल्तान ने हैरानगी भरे स्वर में कहा।

"लेकिन यार!अ ब तो पता चल गया है ना कि वो फरजाना का माल है...अब उसको वापिस कर दे...कितनी बार अपने साथ फोकट में भी सोई है..जबकि उस बेचारी को बस यही एक धन्धा है" नौशाद ने रहमदिली दिखाते हुए कहा।

"वो कोई बेचारी नहीं है मेरे भाई...बेचारा तो वो है जिसे इसने काटा है...ये लाख रु से कम का मोबाइल नहीं है...सोच कितना मोटा बकरा फँसाया होगा इसने" सुल्तान के दिमाग के घोड़े इस वक़्त अलग ही दिशा में दौड़ रहे थे।

"तेरे दिमाग में कोई और ही खिचड़ी पक रही है क्या...क्या करना चाहता है तू...कुछ मुझे भी बता दे" ये बोलकर उसने सुल्तान की ओर सवालिया निगाहों से देखा।

"अभी कुछ नहीं सोचा..पहले सोचने दे..फिर तुझे भी बता दूँगा" ये बोलकर सुल्तान फिर से किसी गहरी सोच में डूब गया।

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"जनाब! जिसने आपका मोबाइल उड़ाया था..वो तो मुझे बेहोशी की हालत में एक जगह पड़ा हुआ मिल गया है...और इस वक़्त उसे मैंने एक हॉस्पिटल में एडमिट करवाया हुआ है...लेकिन उसके पास आपका मोबाइल तो मुझे नजर नहीं आ रहा है" यादव अपने साहब राज मल्होत्रा को रिपोर्ट देता हुआ बोला।

"कौन से हॉस्पिटल में है...मुझे बताओ...मैं वही आ रहा हूँ" इंस्पेक्टर राज ने संक्षिप्त स्वर में बोला।

"साहब एक ही सरकारी अस्पताल है ये मैन बाजार से थोड़ा पहले....उसी के इमरजेंसी वार्ड में हूँ...आप आ जाइए...मैं आपको वार्ड के बाहर ही मिलूंगा" यादव ने अब ये सोच कर राहत की सांस ली थी कि अब साहब जाने और साहब का काम..मैंने तो एक ही रात में चोर को पकड़कर साहब के हवाले कर दिया।

कोई आधा घँटे के भीतर ही इन्स्पेक्टर राज अस्पताल में यादव के पास पहुंच कर उस चरसी की भी शिनाख्त कर चुका था कि उसका मोबाइल उड़ाने वाला यही चरसी था। लेकिन अभी तक बेहोशी के आलम में होने के कारण अभी तक न यादव उससे कोई पूछताछ कर सका था और राज मल्होत्रा का तो फिर सवाल ही नहीं उठता था।

"कहां मिला तुम्हें ये" राज ने यादव की ओर देखकर पूछा।

"सिनेमा रोड पर बेहोश पड़ा था..वायरलेस पर एक लावारिस आदमी के बेहोश पड़े होने का मैसेज सुनने के बाद मैं वहां पहुंचा था तो इसे वहां पड़ा हुआ पाया था" यादव एक एक शब्द सम्हल कर बोल रहा था।

"तुम्हें कैसे पता चला कि मेरा मोबाइल चुराने वाला यही चरसी है" राज मल्होत्रा इस वक़्त कुरेद कुरेद कर पूछ रहा था।

"जनाब! इतना तो पुलिस को खबर रहती ही है कि कौन बदमाश अपनी किस कलाकारी के लिए जाना जाता है..ये चरसी पहले भी इन्हीं कारनामों के लिए कई बार पकड़ा जा चुका है..इन लोगों से तो पुलिस भी पक चुकी है साहब..कितनी बार इन्हें पकड़ कर अंदर डाले...अब तो कई बार तो इसे चेतावनी देकर छोड़ना पड़ता है" यादव ने बातों का शब्द जाल बिछाया।

"ठीक है इस बार इस साले पर इतने केस लगा दो की ये कभी जेल से बाहर ही न आने पाए"राज ने गुस्से भरे स्वर में कहा।

"ठीक है साहब...कोतवाली के जितने भी पेंडिंग केस है..सब में मुजरिम इसी को बनाकर सारे केस सुलझाने का दावा कर देते है...ये भी फिर कई सालों तक अंदर ही रहेगा जनाब" यादव ने एक कुटिल मुस्कान के साथ कहा।

"लेकिन इससे पहले मोबाइल के बारे में उगलवाओ...की इसने वो मोबाइल कहां पर बेचा है...जितने भी इलाके में चोरी का माल खरीदने बेचने में लगे हुए है..कल सभी को राउंडअप कर लो…मुझे हर हाल में अपना मोबाइल वापिस चाहिये" राज ने बेचैन स्वर में कहा।

"सर !आप मोबाइल को ट्रेसिंग पर लगा दीजिये न..उसकी लोकेशन तो हम ट्रेस कर ही सकते है"यादव ने अपने दिमाग के कुंडी दरवाजे खोलते हुए बोला।

"वो काम करने की मुझ में भी अक्ल है...फ़ोन लगातार बन्द आ रहा है..इसलिए लोकेशन ट्रेस नहीं हो पा रही है यादव" राज ने तपे हुए स्वर में बोला। यादव इन्स्पेक्टर राज का मूड भांप कर चुप्पी साध कर खड़ा हो गया।

"सर !आपके मरीज को होश आया गया है...आप उनसे मिल सकते है" नर्स के मुंह से ये बात सुनते ही उन दोनों के चेहरे की बांछे खिल उठी। उन दोनों के कदम तेजी से अंदर की ओर उठ चुके थे। अंदर चरसी अपने बेड पर लेटा हुआ सिर्फ छत की ओर लगातार घूरे जा रहा था।

"आ गए चरसी बेटा होश मे..इतनी चरस क्यो पीता है कि तुझे होश में लाने के लिये डॉक्टर लगाने पड़े" यादव ने अजीब से स्वर में चरसी को बोला। चरसी अभी भी लगातार छत को ही घूर रहा था...ऐसा लग रहा था मानो उसे दीन दुनिया की कोई खबर ही नहीं थी। यादव ने और राज ने एक दूसरे की ओर देखा।

"क्या हुआ !कुछ बोलता क्यों नहीं है" यादव उसे घूरता हुआ बोला।

"कौन हो तुम..ये कौन सी जगह है" चरसी ने लड़खड़ाई हुई आवाज में पूछा।

"बेटा हम पुलिस वाले है और ये अस्पताल है...तू ज्यादा चरस पीने की वजह से अपनी सुधबुध खोकर बेहोश हो गया था" यादव ही चरसी की बातों का जवाब दे रहा था...इंस्पेक्टर राज अभी तक खामोश खड़ा था।

"आज दोपहर में तुमने हमारे साहब की जेब से मोबाइल उड़ाया था...उस मोबाइल को तुमने किसको बेचा है" यादव इस बार गंभीर स्वर में बोला।

"पुलिस...अस्पताल...मोबाइल..ये क्या होता है" चरसी अनजान स्वर में बोला।

"लगता है बिना थर्ड डिग्री के इसे कुछ याद नहीं आने वाला है....पता करो इसे कब अस्पताल से छुट्टी मिलेगी..उसके बाद इसे सीधे कोतवाली लेकर आना..फिर इसे अच्छे से सब याद दिलवाएंगे" राज ने एक एक शब्द को चबा चबा कर बोला था।

"जी जनाब...मैं इसी के पास रुक रहा हूँ...जैसे ही इसे छुट्टी मिलती है...मैं आपको फोन करके बताता हूँ" यादव ने सावधान की मुद्रा में खड़े होकर इंस्पेक्टर राज को जवाब दिया। राज ने सहमति में अपने सिर को हिलाया और वहां से रुखसत हो गया। यादव भी बेड के पास पड़े एक स्टील के स्टूल पर विराजमान हो गया।

                                  ********

सुबह जब मस्ती सोकर उठा तो नशेड़ी गंजेडी दोनों ही अभी तक नींद की आगोश में थे। रात को चरसी वापिस नही लौटा था। मस्ती की आदत थी रोजाना उठने के बाद पूरे बाजार का एक चक्कर लगा कर आने की। मस्ती अपने सुबह के कार्यों से निबट कर अभी दरवाजा खोलकर बाहर निकला ही था कि छप्पन टिकली उसे दूर से ही आता हुआ नजर आया। कल्लन उर्फ छप्पन टिकली को इतनी सुबह सुबह आते हुए मस्ती की आंखें सोच से सिकुड़ चुकी थी।

"क्या हुआ आज सुबह सुबह क्यों अपना मनहूस थोबड़ा दिखाने चला आया" मस्ती ने उसे देखते ही उसके साथ चककल्स की।

"तुम्हें कुछ ख़बर भी है कि तेरे साथी क्या क्या गुल खिलाते घूम रहे है..मुझे तो मेरी सारी प्लानिंग फेल होती हुई नजर आ रही है" कल्लन ने मस्ती से रुष्ट स्वर में बोला।

"क्या हुआ...एक चिलगौजे को छोड़कर सभी लोग अंदर ही सोए पड़े है" मस्ती ने परेशान स्वर में बोला।

"वो चिलगोजा ही इस वक़्त पुलिस के हत्थे चढ़ा हुआ है...कोतवाली का जो नया इंस्पेक्टर आया है..पट्ठे ने उसी का मोबाइल उड़ा डाला...अब कोतवाली में उसका हवाई जहाज बनाने की तैयारी चल रही है..तुम जानते हो न पुलिस बन्दे को हवाई जहाज कैसे बनाती है...कही ऐसा न हो कि मार खाते ही जो किया है वो तो बक ही देगा..और जो करने वाले हो उसके बारे में भी न बक दे"कल्लन की चिंता वाजिब थी।

"चिलगोजा पुलिस की मार से तो नहीं टूटने वाला है...साले ने जिंदगी में रोटियां कम खाई है और पुलिस की मार ज्यादा खाई है"मस्ती ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा।

"देख मस्ती !मुझे तेरे ऊपर तो पूरा भरोसा है..मगर तेरे पंटर लोगों पर नहीं है..साला कोई बेवड़ा है कोई गंजेडी कोई चरसी..पता नहीं कब कौन क्या खुरापात कर डाले...नहीं यार..मुझे ऐसे लोगों के साथ काम नहीं करना है...या तो तू अपने बन्दे बदल..या फिर इस काम को तू भूल जा" कल्लन ने दो टूक बोलकर मस्ती की तरफ देखा।

"सुनो कल्लन मियां...ये काम तो अगर इस शहर में कोई करेगा तो वो सिर्फ हम लोग ही करेंगे..अगर तुमने किसी और से करवाने की सोची तो हम उसी को लूट लेंगे...उस हालत में सोच ले..तेरे पास सिर्फ हाथ मलने के अलावा कोई और काम नहीं रहेगा" मस्ती ने उसे हिंदी में समझाया।

"फिर अपनी फौज को बदल ना बाप...जब इतना बड़ा काम सामने हो करने के लिए....फिर कौन ऐसे चिंदीचोरी करके पुलिस के हत्थे चढ़ता है"कल्लन की बात सोलह आने सच थी।

लेकिन ये लोग भी क्या करते ...अपना नशा पानी का शौक पूरा करने के लिए इन्हें ये चिन्दी चोरी करनी पड़ती थी। मस्ती भी अभी जेल से छूटकर आया था। इसलिए उसके पास भी कड़की का आलम था।

"चल मैं देखता हूँ...इन लोगों की हरकतों पर कंट्रोल करता हूँ..लेकिन अब अगर चरसी अंदर हो गया है तो या तो किसी और आदमी का इंतजाम करना पड़ेगा..या फिर तीन आदमियो के साथ ही काम करना पड़ेगा"मस्ती कुछ सोचता हुआ बोला।

"तीन आदमियों से कुछ नहीं होने वाला...आज आज में कोई भरोसे का आदमी ढूंढ लो...नहीं तो बहुत बड़ा लफड़ा हो जाएगा" कल्लन ने मस्ती को बोला।

"ठीक है! तुम निकलो अभी...मुझे एक बार चरसी से मिलकर उसके बारे में पता करना पड़ेगा कि उसके बाहर आने के कोई चांस है या नहीं" ये बोलकर मस्ती कल्लन को वही छोड़कर बाजार की तरफ बढ़ गया। कल्लन बस उसे जाते हुए देखता रह गया।

                               ************

मस्ती अभी कोतवाली के गेट पर पहुंचा ही था कि यादव उसे कोतवाली से बाहर की तरफ आता हुआ दिखाई दिया। यादव की नजर भी उसके ऊपर पड़ चुकी थी। यादव ने अपनी बाइक के ब्रेक उसके पास पहुंचते ही खुद ही लगा दिये।

"तेरे पास ही जा रहा था...अच्छा हुआ तू यही मिल गया..तेरे यार ने अपनी याददाश्त गुम होने का ड्रामा किया हुआ है...इससे पहले की हम अपने तौर तरीकों से उसकी याददाश्त वापस लाये..उसे समझा लो एक बार..कही ऐसा न हो की वो पुलिस की मार सह न पाए और उसका बोलोराम हो जाये...क्योंकि साहब बहुत गुस्से में है"यादव ने मस्ती को बिना पूछे ही सब कुछ बता दिया था।

"मैं मिल सकता हूँ उससे एक बार..मैं समझा कर देखता हूँ उसे..या मैं उससे मोबाइल का पता लगाकर आप लोगों को बताता हूँ" मस्ती ने यादव की ओर देखकर बोला।

"ठीक है..तुम पता करके बता दो...नहीं तो तुम्हारे यार की जान की खैर नहीं है..पूरे अस्सी हजार का मोबाइल है साहब का...इसलिए भूल नहीं पा रहे हैं" यादव ने मस्ती को बोला।

"ले चलो मुझे उसके पास...लेकिन मुझे उससे अकेले में बात करनी होंगी...तभी वो मुझे खुलकर कुछ बता पायेगा" मस्ती ने यादव को बोला।

"ठीक है...वो सामने वाली लॉकअप में ही है..चलो मैं उसके पास भेजकर मैं आ जाता हूँ" ये बोलकर यादव ने अपनी बाइक को वापस कोतवाली के अहाते में खड़ी कर दी। मस्ती अब यादव के साथ लॉकअप की तरफ बढ़ गया था।


 क्रमशः



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