"बच्चाचोर"
"बच्चाचोर"
“आईये सर, चाय पीकर आते हैं”, प्रतिदिन की भांति सहकर्मियों के उस आग्रह को मैं टाल न सका। “गुप्ता जी, सर के लिए एक स्पेशल चाय, और...बना दो यार हमारे लिए भी, क्यों सर ?” “हाँ भाई हाँ, सभी के लिए!” मैंने मुस्कराकर उनके उत्साह को कम नहीं होने दिया। “और बताईए पांडे जी, क्या सूचना है आज की?” “क्या बताएं, गर्मी के मारे किसी काम में मन नहीं लग रहा है”, पांडे जी ने झुंझलाते हुए पसीना पोंछा और खीझ भरी मुस्कान के साथ वार्ता को संछिप्त करने का प्रयास करने लगे, वो जानते थे कि ये बस शुरुआत थी, उनकी "मौज" लेने की। पर बाकी कहाँ मानने वाले थे, सो पांडे जी ने हार मानकर अपनी दन्तव्यूह की शोभा बढ़ाने पर ध्यान केन्द्रित किया, यही तो सभी चाहते थे, उन्हें मानो खिलौना मिल गया था, हा-हा, हो-हो के समवेत स्वर से गुप्ता जी के टपरे का माहौल रसमय हो चला था; यह कोई नयी बात नहीं थी, रोज का किस्सा था, इसी बहाने लोग तरोताज़ा हो जाते थे।
पर आज कुछ नया होने वाला था, लोग कुछ नए की अपेक्षा भी पाले हुए रहते थे, रोज – रोज की उबाऊ कार्यशैली बिना किसी चुहलबाजी के स्फूर्तिविहीन ही लगती थी। चाय बन ही रही थी कि अचानक एक महिला मैले कुचैले से वस्त्र धारण किये सामने से आती हुयी दिखी। वो हमारी ओर ही आ रही थी। उसकी गोद में एक शिशु भी था, जोर जोर से रोता हुआ। महिला को अपनी ओर आते देख मानो सभी के होंठ चिपक से गए, सब एक दूसरे की ओर ऐसे देखने लगे मानो अपने आप को छुपाने का प्रयास कर रहे हों। हर कोई अनभिज्ञ दिखना चाहता था, ये अनभिज्ञता एक दूसरे के प्रति ये जताने की थी कि भाई मैं तो इस महिला को बिलकुल नहीं जानता, और उस महिला के प्रति भी कि हम एक दूसरे को नहीं जानते। वस्तुतः सभी एक ओर तो इस बात से संशयित थे कि कहीं उन्हें “गलत” न समझ लिया जाये, और दूसरे यह कि अमुक महिला उन्हीं से कुछ मांग न बैठे। कोई भी उस ओर मुंह उठाकर देखना नहीं चाहता था।
तभी गोद में बैठा शिशु और जोर से रोने लगा, उसके रूदन का स्वर महिला के हमारी ओर आने के साथ ही और मुखर होता जा रहा था। महिला चाय की दुकान के समीप पहुंची ही थी कि अचानक सब के सब खड़े हो गए, एकाध को छोड़कर। “कुछ दे दो भैया”, महिला के उद्देश्य के प्रकटीकरण ने जैसे मूक-बधिर समूह में प्राण फूंक दिए। एक सज्जन ने तुरंत ही उसे झिड़का, भगाया कहें तो गलत न होगा। महिला फिर भी उसी याचक भाव से डटी रही। इस बार गुप्ता जी के परिपक्व बोलों ने उसे प्रस्थान हेतु विवश ही कर दिया। मुझसे देखा न गया, “अरे यार, कुछ दे क्यों नहीं देते ?" “अरे साहब, इनका रोज का यही काम है”, गुप्ता जी बड़े निश्चिंत भाव से बोले। मेरी बात उस महिला के कानों में पड़ी शायद, और उसे पुनः याचना हेतु प्रस्तुत कर लायी। शिशु, जो जार जार रोये जा रहा था, की दृष्टि मुझ पर पड़ी और मेरी उस पर, कैसा सुन्दर मुखड़ा, बड़ी बड़ी आँखें; वो एक प्यारी बच्ची थी, भाग्यहीन! किसी धनवान के घर जन्मी होती, तो धूप में चिल्ला रही होती ? पालने में पंखे, ए सी की हवा में होती, खिलौनों से घिरी होती, या फिर वातानुकूलित चौपहिये में हाट घूम रही होती, सुंदर – स्वच्छ वस्त्रों में गुड़िया बनी इधर उधर दौड़ रही होती ! हाय रे भाग्य, कितना निर्मम है तू !!
“क्या चाहिए ?”, अचानक एक स्वर ने मुझे चैतन्य किया। किसी ने शायद मेरी आँखों में उस बच्ची के प्रति भावांशों को पढ़ लिया था।
“दूध दे दीजिये बच्ची के लिए, बस”, महिला का याचना की पराकाष्ठा को छूता स्वर ! “गुप्ता जी बच्ची को दूध दे दीजिये और इन्हें ब्रेड, बिस्कुट...”, दुकान में उपलब्ध देय के साधनों को दृष्टिगोचर करते हुए मैंने कहा, आदेश सा दिया। बच्ची अब नहीं रो रही थी। वो भूखी थी ! ये सिलसिला तीन - चार दिनों तक चलता रहा। मैं किसी कार्य से दो दिनों के लिए अवकाश पर चला गया।
दो दिनों बाद हम पुन: चाय की चुस्कियों और समूह की चिरपरिचित चुहलबाजी की पुनरावृत्ति हेतु गुप्ता जी के टपरे पर एकत्र हुए। “गुप्ता जी, सर के लिए एक स्पेशल चाय, और बना दो यार हमारे लिए भी, क्यों सर ?” “और बताईए पांडे जी, क्या सूचना है आज की?” “क्या बताएं, गर्मी के मारे किसी काम में मन नहीं लग रहा है”, फिर वही हो-हो, हा-हा !
कुछ समय पश्चात् मुझे उस महिला और बच्ची का स्मरण हो आया, “आज वो बच्ची नहीं आई ?” “कौन ?” “अरे वो एक महिला के साथ नहीं आती थी, आई थी क्या ?” “अरे छोडिये साहब, इन लोगों का यही काम है, और भी पता नहीं क्या क्या....."
किसी ने कहा, “बच्चाचोर लगती थी, यही सब तो हो रहा है आजकल, तभी नहीं दिखाई दी !"
मुझे सहसा विश्वास नहीं हुआ; ज़रूर गुप्ता जी के परिपक्व बोलों ने उसे राह दिखाई होगी या हमारे विनोदप्रिय समूह ने, या उस व्यक्ति की अनुपस्थिति ने जिसकी उपस्थिति में उसकी याचना व्यर्थ नहीं जाती थी ? बच्चाचोर ??
....निशान्त मिश्र
