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Nivish kumar Singh

Abstract


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Nivish kumar Singh

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बाबा भुईया पूजा

बाबा भुईया पूजा

5 mins 240 5 mins 240

भुईया बाबा का पूजा  दो दिनों मे संपन्न होता हैं तीसरे दिन भगत कि विदाई होती हैं, इस पूजा कि शुरुआत नेवतन (ईश्वर को नेवता/अवाहन) से होता हैं। नेवतन रविवार,मंगलवार, या गुरुवार को रात्रि मे दिया जाता हैं, भगत और मानर (मनरिया) पहले गाँव-ग्राम के सीमा को पूजते हैं उसके बाद पूजा करता यजमान के घर पर पूजा होती जिसमे भगत अगली सुबह सभी ईश्वर को आने का नेवता देते हैं, मानर के ढोलक  से अद्भुत आवाज़ निकलती हैं जो किसी भी वर्ग के (उम्र) इंसानों को आंतरिक रूप से यह महसूस कराती हैं कि अबके अब वो बच्चों कि तरह झूमने, कुदने लगे,, 

अगली सुबह यानी सोमवार, बुधवार, शुक्रवार को सभी लोग (पुरुष) खड़ी (जो सरसो से निकलता हैं) स्नान कर भगत के साथ ग्राम देवता (माँ काली,जोगी बाबा,ब्रहम बाबा इत्यादि) को पूजने के लिए निकालते हैं वहा से लौटने के बाद पूजा की शुरुआत होती हैं ईश्वर को विजे (बुलाया) दिया जाता हैं। 

जब भगत अपना झुंझुना वाला पैंट पहनते हैं तो इसे देखने के लिए बच्चे, बड़े सभी मे काफी उत्सुकता होती हैं, इसे पहनने के बाद भगत कुदते हैं तथा मानर लोगो को हँसाता हैं, अपना अदाकारी दिखलाते हैं। 

कई पूजन मे तो भगत अपने जादू से सामान बरसाते हैं मैंने अबतक एक बार ही ऐसे होते देखा हैं भगत मिट्टी का एक खाली घड़ा लिए मंत्र का उच्चारण करते हैं उसके बाद उसी घड़ा से काफी चीज निकालते हैं जैसे- चाकलेट, सेब, संतरा, फोटो, गुटका, फूल इत्यादि। 

पूजा का अंत सूर्य देव को समर्पित छठ गीत के साथ उन्हें अरग देते हुए होता हैं, फिर यजमान का मनौती उतारा जाता हैं उसके बाद लोगों मे गुड़, दूध से बने खीर, घी मे सना लिट्टी (सत्तू के बिना) का प्रसाद वितरण किया जाता हैं। 

इसमें भी भगत द्वारा बिना चीनी के बनाये खीर का स्वाद अलग होता हैं जिसे ग्रहण करने पर मन को बहुत आनंद मिलता हैं। 

 बचपन मे हम मे से बहुत से लोगों ने इस पूजा को देखने के बाद अपनी चंचलता मन से भगत और मानर का नकल किये होंगे। 

तीसरे दिन भगत के विदाई से पूर्व भगत लोगो को खोईछा देते हैं (आशीर्वाद स्वरूप चावल,केला इत्यादि) 

उसके बाद फिर सब उसी जगह पहुँचते हैं गाँव,ग्राम के सीमा पर जहाँ रात्रि का प्रथम पूजन हुआ था,, 

अनादिकाल से तिरहुत ऋषि मुनियों, तपस्वियों, वीरों, ज्ञानियों की भूमि रही हैं, यहां सभी जातियों की अलग - अलग लोकदेवताओं की पूजा होती हैं, उन्ही में से एक हैं "भुइयां बाबा" इनकी काल 14 शताब्दी बताई गई हैं, इनकी पूजा में मुख्य रूप से तीन व्यक्ति की पूजा होती है "बाबा बसावन, बाबा बख्तौर, मां गहिल", बाबा बसावन वैशाली जिला के लंगा बसौली ग्राम के थे, इनका वास्तविक नाम बसावन खिरहर था और बाबा बख्तौर तिरहुत के उत्तरी भाग कोई गढ़िया रसलपुरबके थे,इनका वास्तविक नाम आंसिक बख्तौर और इनके पिताजी का नाम पुरन राउत मां कोयला थी। बाबा बसावन और बाबा बख्तौर परम मित्र थे, उसी युग में नारी महथि डेहुरी दरबार के राजा "दलेल सिंह"था जो अत्यंत क्रूर और निर्दई था,जो राज्य के सभी नागरिकों पर बहुत अत्याचार करता था,राजा दलेल सिंह एक लाख मुशहर जाति के लोगों का नरसंहार करने का कठोर फैसला किया हुआ था, बाबा भुइयां क्रूर दलेल सिंह के प्रकोप से राज्य के सभी नागरिकों का रक्षा किए थे और राजा से युद्ध करके 52 कोश के गोरिया वन पर विजय प्राप्त किए थे और समाज को शोषण से मुक्त कराए थे।

इस पूजा में मनारिया द्वारा कहे गए कथा (गायन शैली) अनुसार माता कोईला ने अपने विवाह के समय अपनी कुलदेवी गहिल मां(शक्ति) को अपने आंचल में ले कर अपनी ससुराल आ गई थी,जिनसे उनके भाई "बदल सिंह" अत्यंत क्रोध में थे।

मामा बदल सिंह अपनी कुलदेवी को मनाने के लिए अपने घर में एक बहुत बड़ी अनुष्ठान किए थे, समस्त गढ़िया ने निमंत्रण दे दिए थे लेकिन अपनी बहन को इससे वंचित रखे थे,जब बाबा बख्तौर बोरिया वन की चिकनी घाट पर अपनी भैंस चरा रहे थे तभी उनकी कान में मानर (क्षेत्रीय वाद्य यंत्र) की अनुराग सुनाई पड़ गई,जो नरहर नदी उनके मामा के घर "डिह सतौरा"में बज रही थी, उन्होंने अपने तंत्र साधना से यह पता कर लिया की यह अनुष्ठान उनके मामा के घर में हो रही है,जिससे वह अत्यंत क्रोधित हुए।

उन्होंने अपने घर आ कर अपनी मां से अनुमति मांगी अपने मामा के  घर पूजा देखने जाने के लिए, परंतु माता कोईला ने मना कर दिया यह कहकर कि बिना निमंत्रण तुम वहां मत जाओ, तुम्हारा आदर सम्मान नहीं होगा, परंतु बाबा बख्तौर अपने जिद्द पर अड़े रहे अंतिम में उनकी मां ने उन्हें अनुमति दे दिए और उन्हें पान और कुछ खाद्य सामग्री दे कर कहा कि वह तुम दूर बैठ कर पूजा देख लेना और इसे खा कर चले आना पूजा की प्रसाद ग्रहण नहीं करना।

जब उन्होंने अपने ननिहाल पूजा देखने पहुंचे तो वहां उनके मामा द्वारा उनका अपमान किया गया,जिसके क्रोध से बाबा बख्तौर ने पूजा भंग कर के वापस बोरिया वन घूम कर चले आए ।

तब उनके मामा बदल सिंह और नारी महथि के राजा दलेल सिंह ने तांत्रिक गुणों से उत्पन्न शेला बाघ और लुलिया बाघिन को भेज दिए बाबा बख्तौर का मार डालने केलिए बोरिया वन में बाबा बख्तौर उनके भैसों संग दोनों बाघ और बाघिन कि युद्ध हुआ जब भैंसो ने अपने सिंह से बाघों पर प्रहार करता तो उसका प्राभाव बाघों पर नहीं बल्कि बाबा बख्तौर पर पड़ता अंत में दोनों बाघ बाघिन ने बाबा बख्तौर को मार डाला, किसी सामान्य बाघ बाघिनों से उनकी मृत्यु असंभव थी क्योंकि बाबा बख्तौर के पास खुद 7 भैंसो की शक्ति थी,उनकी मृत्यु पश्चात उनकी स्त्री हीरा मोती को यह पता चल गया कि उनकी सुहाग अब इस भूलोक में नहीं हैं क्योंकि हीरा मोती स्वयं एक सत्यवती स्त्री थी।

इन्हें लोक देवता की ख्याति प्राप्त हुई सभी जातियों मान सम्मान प्राप्त हुआ, बाबा भुइयां समाज सुधारक गौ रक्षक पशु पालक थे, उनकी कथा की गायन शैली जो मनरिया द्वारा गाया जाता है उसका कोई और जोर नहीं हैं।।


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