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Kajal Manek

Tragedy Inspirational


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Kajal Manek

Tragedy Inspirational


अरेंज मैरिज

अरेंज मैरिज

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आज जैसे ही नीलम का आखिरी पेपर हुआ खुश होकर घर आई कहने लगी माँ मेरे सारे पेपर अच्छे गए, देखना कॉलेज में टॉप करूँगी।

नीलम के पिता को बेटी की शादी की चिंता थी उन्हें लग रहा था ग्रेजुएशन पूरा हो गया अब जल्द ही इसका विवाह करवा देना चाहिए। उन्होंने अपने दोस्त के बेटे अमित को पसन्द किया नीलम के लिए।


अगले ही दिन अमित और उसका परिवार घर आ गए मिलने न कहने की कोई वजह ही नहीं थी। अमित अच्छा दिखता था अच्छा कमाता था तो भरे पूरे सम्पन्न परिवार में अपनी लाडली बिटिया का ब्याह कर माता पिता खुश हुए।


नीलम भी खुश थी कि उसके माता पिता की पसन्द से विवाह हो रहा है तो ठीक है। उसने विवाह के उपरांत अमित को ही अपनी दुनिया बना लिया, उसके लिए सजती सँवरती पर कभी कभी अमित बहुत आक्रामक हो जाया करता था नीलम समझ नहीं पाती की ऐसा क्यों? विवाह के बाद जब वह आक्रामक हुआ था तो नीलम को लगा कि ऐसा पहली बार है शायद इसलिये।


लेकिन अब वह उसकी आदत बनती जा रही थी। नीलम की मर्जी के बिना उसके शरीर को नोंचना ये रोज का कार्यक्रम बन चुका था। नीलम जो खुशियों के सपने लेकर आई थी उसे हैवानियत के अलावा कुछ न मिलता जब भी कोशिश करती प्रेम से बात हो सहजता से सब कुछ हो पर वैसा कुछ होता नहीं था।


नीलम ने तंग आकर फैसला लिया तलाक का पर घरवालों रिश्तेदारों और ससुराल वालों के डर से किसी से कह न सकी।

फिर उसने अपनी दोस्त मीरा को बताया कि यह सब अब सहन नहीं होता। 

मीरा ने उसे समझाया कि अरेंज मैरिज में लड़का कैसा हो ये तो परिवार वाले तय करते हैं तुमने अरेंज मैरिज करी पर लड़के को अपने स्तर पर जाना तक नहीं नीलम किस दुनिया में रह रही हो तुम चलो मेरे साथ।


अरेंज मैरिज के नाम पर इस रेप को सहन मत करो बल्कि अलग हो जाओ इस सबसे ताकि अपनी ज़िंदगी जी सको। तुम्हें भी प्यार करने का हक़ है, तुम्हें भी अपनी ज़िन्दगी में खुश रहने का हक़ है, तुम्हें हक़ है कि तुम न बोल सको, नीलम ज़िंदगी बहुत खूबसूरत है हो सकता है आगे तुम्हें कोई मिले जो तुम्हारा सच्चा हमसफ़र हो।


सुनकर नीलम उठ खड़ी हुई अब उसे डर नहीं था कि रिश्तेदार क्या कहेंगे ससुराल वाले क्या सोचेंगे वो बस इस बंधन से मुक्त होकर अपने लिये जीना चाहती थी खुलकर सांस लेना चाहती थी वही उसने किया और चल पड़ी अपनी खुद की बनाई राह पर जहां उसे भी खुश रहने का हक़ था।


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